शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

आग

आग
जलाती ही नहीं
पकातीभी है.

आग
नस्त नहीं करता
सृजन भी करताहै

पसीनों की
आग से
लहलहाते
हैं खेत

ज्ञान की आग से
रोशन होती हैं
पीदियाँ

आग
जिजीविषा है
जिज्ञासा है
जूनून है
जरुरी है


आग
जीवन में
रिश्तों में


जो होगी
अपनों के बीच
आग
कुछ नया जन्म लेगा
अवश्य ही !

3 टिप्‍पणियां:

  1. आग ना हो तो आरम्भ नहीं.......विध्वंस भी आग से ही

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  2. आग
    जीवन में
    रिश्तों में....
    jiwan mein aag garamjoshi aur rishto mein jiwantta ki parichayak hai. sunder bhav

    जो होगी
    अपनों के बीच
    आग
    कुछ नया जन्म लेगा
    अवश्य ही ! ....
    apno ke beech jo aag hai uski garmi mein sheetalta bhi ho tabhi kuch achha janam le payega.

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  3. आग ने आदिम जाती को इंसानी डगर के साथ-साथ विकास के रस्ते पर भी डाला. आदि भी आग,अंत भी आग.आग. के लक्शानात्मक प्रयोग ने आपकी कविता को आग की शीतलता प्रदान कर दी है.ऐसा ही लिखते रहे.

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