मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

होली

हर दिन होली जल रही है
जलते अरमानों के संग
कैसी होली मानेगी उनकी
जिनके आँचल ना कोई उमगं

होली के रंग हैं फीके
उनसे पूछो जो खोये अपने
धुल धुसरित रंग हैं उनके
जिनकी आँखों के टूटे हैं सपने


लाल रंग लहू का होता
जा शरहद पर बहता है
नक्सालियों के खंजर से घायल
हरियाली कैसा जो बिंधता है

आसमान से गायब नीला
और समंदर भी है फीका
ज़हर झेलती नदियों से पूछो
क्यों उसके तट बाज़ार सजा

होली तो अब कमरों में बंद
कैसी चुनरी कैसी साड़ी
काम क्रोध मद के रंग से कैसे
खेले होली आज की नारी

3 टिप्‍पणियां:

  1. मंगलवार, २३ फरवरी २०१०
    होली

    हर दिन होली जल रही है
    जलते अरमानों के संग
    कैसी होली मानेगी उनकी
    जिनके आँचल ना कोई उमगं

    होली के रंग हैं फीके
    उनसे पूछो जो खोये अपने
    धुल धुसरित रंग हैं उनके
    जिनकी आँखों के टूटे हैं सपने
    bahut bhavnatmak rang hai aapki holi ka.

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  2. har baar yahi hota hai, aur sare rang fike ho jate hain aur paas me ek prashn karwaten leta hai.....
    happy holi

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