मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

छोटे अखबारों के मार्केटिंग एक्जक्यूटिव

बाज़ार की चकाचौंध
मीडिया की बाढ़ के बीच
निकलते हैं
छोटे अखबार
देश भर से
स्थानीय भाषाओँ में
पूरी प्रतिबद्धता के साथ
या कहिये
अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबद्धता के साथ

इनके मार्केटिंग एक्जक्यूटिव  
होते हैं कस्बाई विश्वविद्यालयों से
शुरू हुए नए जनसंचार पाठ्यक्रम में
मीडिया की रणनीति और राजनीति की शिक्षा लिए
दुनिया खरीद लेने /या बेच देने  का जज्बा लिए
लेते हैं लोहा बाज़ार से
चेहरे पर सुदूर अवस्थित किसी स्टील प्लांट से
निकलने वाले इस्पात का तेज लिए
इनके भीतर होती है
अपरिमित ऊर्जा/सम्पदा
जैसे धरती के गर्भ में हैं
प्रचुर  संसाधन
अयस्कों  की भांति होते हैं
ये अनगढ़

जैसे जैसे
निखरती  है इनकी प्रतिभा
मीडिया बाज़ार  की
नज़र पड़ती हैं इनपर
और हैक कर लिए जाते हैं
बड़े अखबारों के
नए संस्करण के लिए
ठीक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के
एम ओ यू के तर्ज़ पर
संसाधनों के इष्टतम उपयोग
और निवेश के नाम पर

छोटे अखबार के
मार्केटिंग एक्जक्यूटिव 
ब्रांड बन कर उभरते हैं
और अस्त हो जाते हैं
रौशनी के अँधेरे में
मीडिया हाइरार्की की सीढी पर
लुढ़का दिए जाते हैं
थोड़े दिनों बाद

जारी रहती है
छोटे अखबार की प्रतिबद्धता
अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबद्धता
साथ ही, नए मार्केटिंग एक्जक्यूटिव  की खोज

31 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक रचना, जारी रहे प्रतिबद्धता !

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  2. अरुण जी,
    आपने छोटे अखबारों के हालात पर एकदम सटीक शब्द चित्र खींचा है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  3. आपकी कविताओं पर टिप्पणी के लिये मेरे शब्द मूक हो जाते हैं ।
    गूढ अर्थों से सजी बेजोड... रचना है

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  4. छोटे अखबारों के मार्केटिंग एक्जक्यूटिव ........सटीक चित्र खींचा है !

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  5. कविता मे माध्यम से कॉर्पोरेट जगत की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य कसा है आपने।
    व्यंग्य के लिए द्वंद्व और अंतर्विरोध का होना ज़रूरी है। दो मूल्यों की टकराहट, दो परस्पर विपरीत स्थितियों की प्रस्तुति से व्यंग्य उत्पन्न होता है। कविता का रूप या शिल्प ऐसा होना चाहिए कि यह द्वंद्व या अंतरविरोध सर्वाधिक तीव्रता से व्यक्त हो सके।
    आपकी यह कविता इस कसौटी पर अगर देखा जाए तो द्वंद्व और विद्रूप उभारने में सफल हुई है।

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  6. अरुण जी,
    आपने छोटे अखबारों के हालात पर एकदम सटीक शब्द चित्र खींचा है !

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  7. मेरे ख्याल से मनोज जी ने सब कह दिया उसके बाद कहने को बचा क्या है………वैसे एक नियम है ही संसार का ………हर बडी मछली छोटी मछली को निगल जाती है और ये उसी तर्ज़ पर संसार का चक्र चलता रह्ता है।

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  8. अरुण जी,

    आपकी आज की कविता मुझे मेरी कहानी लगी... ! धन्यवाद !!

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  9. अनूठे विषय तलाश करते हैं आप ... व्यवस्था पर कटाक्ष किया है इस रचना के माध्यम से ...

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  10. प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया competition मीडिया में भी बहुत ज़ियादा हो गया है.पत्रकारिता में डिग्री लेकर आये new entrants को शुरू में बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है. इसलिए शुरू में वो छोटे अखबारों मे ही absorb हो पाते हैं. उनका performance उनके नाम कद और confidence को २-३ साल में अच्छा खासा बढ़ा देता है,बशर्ते की वो मेहनती हों, तब उस २-३ साल के तजुर्बे के साथ उन्हें बड़े अखबार या electronic मीडिया में entry मिल पाती है.इस नज़रिए से भी छोटे अखबारों का योगदान सराहनीय कहा जायेगा क्योंकि वो पौध को बड़ा करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं.
    इस विषय से जुड़ी आपकी कविता सार्थक है.

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  11. बहुत ही सच्चाई बयां करती हुई कविता...... जैसे हर छोटी चीज बड़े को पाने का बस सहारा हो....

    .

    सृजन शिखर पर " हम सबके नाम एक शहीद की कविता "

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  12. ऐसे सपाट विषय पर घुमावदार कविता बहुत फब रही है.

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  13. हॉं,
    मैं एक भूतपूर्व स्‍थानीय अखबार हूँ,
    आखिरी बार कब छपा था याद नहीं,
    याद है तो
    सहेजे हुए कुछ पीतवर्ण पन्‍नों पर
    ट्रेडल मशीन की दाब
    जिस दाब की धुँधली सी याद कहती है,
    मैनें शायद कुछ सच कहा था,
    उसके बाद बहुत कुछ हुआ,
    खैर तुम्‍हें उससे क्‍या लेना देना,
    तुम बड़े अखबार हो
    तुममें मुझ जैसे कई अस्तित्‍व खो चुके अखबार समाये हैं
    तुम अखबार नहीं वाद हो।

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  14. अरुण जी,
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  15. अरुण जी!
    इसके आगे वह काली स्याही से चलकर, आर्क लाईट का सफर तय करते हुए एक ऐसी मंजिल पर पहुंचता है जहां उसकी मुलाक़ात सात समंदर पार बैठी किसी राडिया से होती है और उसकी दुनिया बदल जाती है.
    जो इस मुकाम तक नहीं पहुँच पाते वो ब्लॉग लिखते नज़र आते हैं. कई लोगों को देखा है मैंने अरुण जी... बहुत फ्रस्ट्रेशन है उनके अंदर!!
    एक बार फिर बहुत ही पैनी नज़र!!

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  16. जैसे जैसे
    निखरती है इनकी प्रतिभा
    मीडिया बाज़ार की
    नज़र पड़ती हैं इनपर
    और हैक कर लिए जाते हैं
    ... bahut sundar ... behatreen rachanaa !!!

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  17. कार्यक्षेत्र का पहिया तो यही घुमाते हैं।

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  18. एक खास कार्यक्षेत्र का जीवंत चित्रण .... बहुत उम्दा

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  19. इसे गद्य में लिखा जाय तो गद्यकाव्य सा लगे।

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  20. बहुत सटीक चित्रण...बेहतरीन.

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  21. अखबारों और मीडिया के साथ अधिक उजागर है यह सामाजिक प्रक्रिया.

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  22. ek baar fir se aapne anchhuye soch ko chhuya..........dekha sir aap kya ho..........:)
    meri saari wishes aapke liye
    aap bahut aage jaoge sir...:)

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  23. कितना सही अपने....!!!!

    एकदम सत्य...यही है आज का कटु सत्य...

    प्रादेशिक समाचारपत्रों की विश्वसनीयता के सामने ये मुझे हास्यास्पद लगते हैं...

    सत्य है, जज्बे वाला पत्रकार चकाचौंध में गम हो दल्लाल बन जाता है...

    इस सटीक सार्थक उद्वेलित करने वाले रचना के लिए आपका बहुत बहुत आभार ...

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