रविवार, 5 दिसंबर 2010

लिख नहीं पाया कुछ तुम्हारे लिए

प्रिये 
आज दूर हो तुम लेकिन 
लिख नहीं पाया 
तुम्हारे लिए कुछ भी 

हर पल/ हर क्षण लगा
साथ बैठी हो तुम
मेरे कंधे पर
रख लिया है 
तुमने अपना सिर
तुम्हारे केश 
मेरे शर्ट की बटन से उलझ गए हैं
दिन भर मैं
सुलझाता रहा
तुम्हारे केश 
शब्द गए उलझ !

एक बार तो ऐसा लगा
मानो मेरे कानो में 
कुछ कह रही हो तुम
और तुम्हारी उंगलिया
मेरे महीनो से नही कटे बाल को
सहेज रही हो तुम
जैसे सहेजती हो तुम
अपना आँचल
अपनी किताबें
किताबों में पड़ी कुछ चिट्ठियाँ 
सूखे फूल 
पढता रहा फिर से
तुम्हारी किताबों में पड़ी पुरानी चिट्ठियों को और
सूखे फूलों को देखते देखते
सूरज उड़ गया
लगा कर पंख
धूप भी लौट गई
अपने घोसलें में
शब्द नहीं लौटे मेरे पास
साथ जो गए तुम्हारे 

लगा ही नहीं कि 
दूर हो तुम मुझे से किसी भी पल 
और लिखी जाए तुम्हारे लिए
कोई कविता. 

20 टिप्‍पणियां:

  1. किताबों में पड़ी कुछ चिट्ठियाँ
    सूखे फूल
    पढता रहा फिर से
    तुम्हारी किताबों में पड़ी पुरानी चिट्ठियों को और
    सूखे फूलों को देखते देखते
    अब चिट्ठियां कविताओ में ही जिंदा रह गई हैं ...अच्छी रचना

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  2. काफी भावुक हो गया ये पढ़कर... आपकी ज्यादातर कवितायेँ सेंटी कर देती हैं...

    पहचान कौन चित्र पहेली को अभी भी विजेता का इंतज़ार ...

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  3. लगा ही नहीं कि
    दूर हो तुम मुझे से किसी भी पल
    और लिखी जाए तुम्हारे लिए
    कोई कविता.

    यही अहसास तो जीवन्त रखता है भावो को……………………देखा कविता फिर भी लिखी गयी……………………बस यही तो होता है ना चाहते हुये भी ………सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  4. चलिए, लिख गई एक अच्‍छी-खासी कविता.

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  5. सूखे फूलों को देखते देखते
    सूरज उड़ गया
    लगा कर पंख
    धूप भी लौट गई
    अपने घोसलें में
    शब्द नहीं लौटे मेरे पास
    साथ जो गए तुम्हारे
    बहुत सुंदर भावनात्मक अभिव्यक्ति .....एकदम दिल को छु जाने वाली पंक्तियाँ ...शुक्रिया

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  6. 5/10

    अच्छी और नाजुक कविता
    आखिरी पंक्तियों की तासीर गहरी है.

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  7. कोमल मन की सुंदर भावनाओं की उत्तम अभिव्यक्ति। कई बार न कहते हुए भी हम बहुत कुछ कह जाते हैं, इसी तरह नहीं लिखते हुए भी ...!

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  8. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है। बधाई।

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  9. सब कुछ तो लिख ही दिया अरुण जी!! और सादगी देखिये कि कहते हैं कुछ भी नहीं लिख पाया...हाँ एक बात और! अगर सचमुच नहीं ही लिखा है अब तक कुछ भी,तो प्लीज़ कुछ न लिखिए.. कई बार लिख देने से शब्द मर जाते हैं,न लिखा तो अमर हो जाते हैं... धरती के कागज़ पर,जमुना किनारे,संगमरमर से लिखी कविता देखी है न आपने!!!

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  10. कुछ न कहो, कुछ भी ना कहो, क्या कहना है??? क्या सुनना है??? सबको पता है. हमको भी.....

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  11. pyaar kee is anubhuti ko hum mahsoos kar sakte , shabd shabd milkar bhi use kah nahin paate

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  12. बहुत ही कोमल और प्यारी अनुभूति ....सुन्दर शब्दों से सजाया है

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  13. भावुक कर देने वाली रचना ....... सुन्दर भावाभिव्यक्ति .....

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  14. दिन भर मैं
    सुलझाता रहा
    तुम्हारे केश
    शब्द गए उलझ !

    लगता है केश सुलझते ही शब्द भी सुलझ गये हैं और एक अच्छी कविता बन गयी। बेहतरीन अभिव्यक्ति--- बधाई।

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  15. कोमल भाव की रचना
    शायद लिख पाने के लिये दूरी आवश्यक है

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  16. कविता में भावनाएं स्वयं मुखरित हो रही हैं !
    अच्छी प्रस्तुति!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  17. एक बार तो ऐसा लगा
    मानो मेरे कानो में
    कुछ कह रही हो तुम
    और तुम्हारी उंगलिया
    मेरे महीनो से नही कटे बाल को
    सहेज रही हो तुम
    जैसे सहेजती हो तुम
    दिल को छु जाने वाली पंक्तियाँ .

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  18. आज दूर हो तुम लेकिन
    kaha ho door man se mahsoosta hu tumhe ,karta hu bate ....ginta hu har ek pal tumhare sanidhdhya ka.....lekin fir bhi door ho tum....

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