गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

मटर छीलते हुए

छीलते हुए मटर
गृहणियां बनाती हैं
योजनायें
कुछ छोटी, कुछ लम्बी
कुछ आज ही की तो कुछ वर्षों बाद की
पीढी दर पीढी घूम आती हैं
इस दौरान.

सोचती हैं
गृहस्थी के सीमित संसाधनों के
इष्टतम उपयोग के उपाय
पति से साथ
कई बार करती हैं
वाद परिवाद
रखती है अपनी बात

छीलते हुए मटर
फुर्सत में होती हैं
गृहणियां
कई छूटे काम
याद आ जाते हैं उन्हें
जैसे मंगवानी है शर्ट के बटन
खत्म होने वाला है खाने वाला सोडा
कई और भी कभी-कभी वाले काम
स्मृतियों में आते हैं

धूप में जब
छीला जाता है मटर
अलसा जाती है
दोपहर
फिर याद आती है
ससुराल गई बेटी
-जो होती तो बाँध देती केश
और बेटी से मिल आने की
बना ली जाती है योजना
इसी समय.

मटर छीलना
कई बार रासायनिक प्रक्रिया की तरह
काम करता है
उत्प्रेरक बन जाता है
देता है जन्म नए विचारों को
दार्शनिक बना देता है
बुद्ध सा चेहरा दिखता है
गृहणियों का शांत, क्लांत रहित
जबकि स्वयं को छीलती सा
करती हैं महसूस

कई बार तो
तनाव-मुक्त हो जाती हैं
गृहणियां
गुनगुनाती हैं
स्वयं में मुस्कुराती हैं
अपने आप से करती हैं बातें
छीलते छीलते मटर
जब याद आ जाती है
माँ, बाबूजी, बहन

गृहणियां
समय से
चुरा लेती हैं
थोडा समय
छीलते हुए मटर
खास अपने लिए .

46 टिप्‍पणियां:

  1. मटर के साथ महिला को जोड़कर छोटी-छोटी बातों से जीवन का क्या अर्क निकाला है अरूण जी ने... खुशी हुई |

    कई बार तो
    तनाव-मुक्त हो जाती हैं
    गृहणियां
    गुनगुनाती हैं
    स्वयं में मुस्कुराती हैं
    अपने आप से करती हैं बातें
    छीलते छीलते मटर
    जब याद आ जाती है
    माँ, बाबूजी, बहन

    उत्तर देंहटाएं
  2. कई बार तो
    तनाव-मुक्त हो जाती हैं
    गृहणियां
    गुनगुनाती हैं
    स्वयं में मुस्कुराती हैं
    अपने आप से करती हैं बातें
    छीलते छीलते मटर
    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति..... मटर छिलने के साथ साथ भी कितना कुछ गुजर जाता है.......... वाकई काबिले तारीफ .
    सृजन शिखर पर -- इंतजार

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  3. रोजमर्रा की आम जिन्दगी में घटने वाली घटनाओं को लेकर आपने सुन्दर स्रजन किया है!
    आज के चर्चा मंच पर भी आपकी इस पोस्ट की चर्चा है!

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  4. आपकी कविता जातीय पहचान रखती हैं। ताज़ा बिम्बों-प्रतीकों-संकेतों से युक्त आपकी भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं, जीवन की तहों में झांकने वाली आंख है।

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  5. एकदम साधारण उपमानों के साथ असाधारण आख्यान का सृजन प्रभावित करता है .

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  6. मटर छीलना
    कई बार रासायनिक प्रक्रिया की तरह
    काम करता है
    उत्प्रेरक बन जाता है
    देता है जन्म नए विचारों को
    दार्शनिक बना देता है
    बुद्ध सा चेहरा दिखता है
    गृहणियों का शांत, क्लांत रहित
    जबकि स्वयं को छीलती सा
    करती हैं महसूस
    kya suksh drishtikon hai

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  7. मटर छिलते समय कोमल रोष दिखाती हैं गृहणियां
    जब छिले मटर पर टूट पड़ते हैं बच्चे और पति

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  8. अलग हैं वे गृहणियां यहाँ तो खुद ही अल्लसुबह मटर की छीमियाँ छीलनी पड़ती हैं तब जाकर बन पाती है घुघुरी ! (पूर्वांचल का एक प्रिय नाश्ता )

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  9. मटर छिलते हुए स्त्रियां क्या क्या सोच सकती हैं उनका सटीक वर्णन किया है ..अच्छी अभिव्यक्ति

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  10. बहुत सटीक चित्रण किया है मटर छीलते हुए स्त्रियों के क्रियाकलापों का...अनूठी रचना.

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  11. नित्य के घरेलू कार्यों में गहरे भाव ढूढ़ लाने की प्रतिभा प्रशंसनीय है।

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  12. वाह... इतना गहन अध्ययन वो भी मटर छीलने पर...
    बहुत कुछ सीखना है आपसे...

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  13. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  14. नमन है उन गृहणियों को जिनमें मेरी माँ और पत्नी, बहन और भाभियाँ शामिल हैं, जिनके लिए अपना कहने को बस यही मटर छीलने, स्वेटर बुनने, और धुप सेंकने का समय भर बचा है.. और इस समय में भी अपने लिए कम, अपने अपनों के बारे में ही सोचती है वह गृहिणी...
    एक नए और अनोखे बिम्ब के माध्यम से दिल के तारों को छुआ है आपने अरुण जी!

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  15. हे भगवान ! अरुण जी , आप कहाँ कहाँ घूम आते हैं अब तो आप स्त्रियों की सोच मे भी झाँकने लगे…………बहुत ही तेज़ नज़र है आपकी…………………बहुत ही सुन्दर कृति।

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  16. अब समझ आया कि मटर की मॉंग इतनी ज्‍यादह क्‍यूँ रहती है।
    हाथ तो थे व्‍यस्‍त लेकिन मन उड़ानें भर रहा था
    थाम कर वो वक्‍त दिल से दिल की बातें कर रहा था।

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  17. अरुण भाई, वाकई क्या विषय पकड़ा है और क्या आधार.......... भई वाह|
    हमारे ब्लॉग्स पर भी पधारें
    http://thalebaithe.blogspot.com
    http://samasyapoorti.blogspot.com

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  18. पढ़े लिखे लोग जिसे हासिये पर समझ कर केवल बातूनी पहाड़ बनाकर अज़गरी आंसूं बहाते देखे हैं इसी समाज में पिछड़े तबके में महिलाओं के दुःख दर्द में हाथ बटाते किसान भी देखे हैं.औरतों को मिलने वाले सम्मान में कभी कभी बड़ा गड़बड़ झाला लगता है.कविता में मटर छिलने के बहाने जो फुरसत महिलाओं को समाज ने बक्शी है ये उसे मिलने वाले हक़ का तिनकाभर लगता है भोर की चार-पांच से अँधेरे की दस तक घर-आँगन एक करती महिलाएं लैब अपने हक़ पर भी बराबरी में आएगी.....पता नहीं. ध्यान दिलाने के लिए एक बार फिर अरुण बाबू को थेंक यूं

    --
    सादर,

    माणिक;संस्कृतिकर्मी
    17,शिवलोक कालोनी,संगम मार्ग, चितौडगढ़ (राजस्थान)-312001
    Cell:-09460711896,
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  19. गृहणियां
    समय से
    चुरा लेती हैं
    थोडा समय
    छीलते हुए मटर
    खास अपने लिए .
    बस इसी तरह छिलके उधेडते हुये अपनी यादों को उधेडती है। एक छोटे से काम से बहुत सुन्दर कविता बन गयी मटरों के दानो की तरह ही शब्द हैं। बधाई।

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  20. वाह...क्या चित्र खींचा है आपने शब्दों से ,मध्यमवर्गीय वह स्त्री जिसके सरोकार और सपने घर सम्बन्ध और उसके सुख दुःख के इर्द गिर्द ही घिरे होते हैं, साकार हो सामने आ गयी और मन को छू भावुक कर गयी.....
    मन मोहक अद्वितीय रचना.. वाह !!!!

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  21. मटर छीलना
    कई बार रासायनिक प्रक्रिया की तरह
    काम करता है
    उत्प्रेरक बन जाता है
    देता है जन्म नए विचारों को
    दार्शनिक बना देता है
    बुद्ध सा चेहरा दिखता है
    गृहणियों का शांत, क्लांत रहित
    जबकि स्वयं को छीलती सा
    करती हैं महसूस

    बहुत ही कुशलता से मटर छिलती महिलाओं के मस्तिष्क में चलते विचारण कोसह्ब्द दिए हैं..दरअसल इस तरह एकाग्र होकर कोई भी काम करना एक मेंटल थेरेपी है..जिसका कविता में अच्छा उपयोग किया आपने.

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  22. ये तो हटकर है रचना..
    रोज़मर्रा में होने वाली बातों को बहुत सुन्दर शब्दों में पिरोया है..

    पर बड़े शहरों में तो गृहणियां ही कम होती जा रही हैं.. क्या वो ऐसी सोच और ऐसा समय कभी देख पाएंगी?

    उत्तर देंहटाएं
  23. मटर छीलना
    कई बार रासायनिक प्रक्रिया की तरह
    काम करता है
    उत्प्रेरक बन जाता है
    देता है जन्म नए विचारों को
    दार्शनिक बना देता है
    बुद्ध सा चेहरा दिखता है
    गृहणियों का शांत, क्लांत रहित
    जबकि स्वयं को छीलती सा
    करती हैं महसूस

    एक श्रेष्ठ कविता।
    मटर और जीवन दर्शन...आपकी सोच अद्भुत है।
    बधाई स्वीकार करें।

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  24. ek dum se gaon kee yaad aa gayi..jab dadi amma, mummy aur bua log sath men matar chheela kartee theen .... aur tarah tarah ke mamlon par baat hoti thi... aur hum chheele hue matar men hath mar ke bhagte the ..aur pakde jane par pita karte the... bahut bareek nigah daalti hai nazm matar chheelne kee ghatna par...

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  25. मटर के बहाने स्त्री मन को बखूबी पढ़ा है आपने .....
    आपकी कलम कुछ नवीनतम सोच के साथ चलती है ...
    जो आपकी प्रतिभा को उकेरती है ....
    निर्मल गुप्त जी की बात से सहमत हूँ .....

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  26. ab to me bhi jab matar chheelungi kam se kam aapki ye kavita to jaroor yaad aa hi jayegi.
    :):):) pura nari-vigyan padha lagta hai.

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  27. waise to aajkal mattar bhi chhile hue packed milne lge hain.....isliye grihniyon ne sochna kam kar diya hai...:P

    par sir aapka har post lajabab kar deta hai....

    lagta hai kuchh sochne ke liye mujhe bhi mattar chhilna hoga..:)

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  28. गृहणियां
    समय से
    चुरा लेती हैं
    थोडा समय
    छीलते हुए मटर
    खास अपने लिए .
    मटर का छीलना और फिर अपने लिये समय चुरा लेना. सारा का सारा परिवेश समेट लिया है आपने
    बहुत सुन्दर

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  29. अरुण, गजब का ओब्जर्वेशन है, बेहद खूबसूरत | अगर चिटठा चर्चा से लिंक न मिला होता तो शायद ये कहीं दबे हुए सफ्हे टाइप हो जाती |


    हमारे देश के लोगों को इन्तेलेक्चुअलिस्म के तिलिस्म से फुर्सत नहीं है, वे यहाँ कमेन्ट करने नहीं आयेंगे | आयेंगे भी, तो उंह... ये भी कोई कविता है, कहकर निकल लेंगे |

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  30. बहुत अच्छी कविता।

    ..जिन्हें छीलने के लिए इतना मटर नहीं मिलता वे सस्ते ऊन के एक गोले से स्वेटर बुनते हुए भी चुरा लेती हैं समय, खास अपने लिए।

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  31. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  32. याद आ गया जब छोटे थे, मटर छीलने में सहयोग दिया करते थे... और माँ, चाची वगैरह के योजना बनाने के दौरान छीलने से ज्यादा मटर खा जाया करते थे :)
    कोरिया में क्रिसमस

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  33. क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
    आशीषमय उजास से
    आलोकित हो जीवन की हर दिशा
    क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
    जीवन का हर पथ.

    आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

    सादर
    डोरोथी

    उत्तर देंहटाएं
  34. .

    आपकी कविता पढ़ती जा रही थी , और मन में वैसे ही वैसे विचार आ रहे थे, भूली यादें ताजा हो रही थीं। सामानों की लिस्ट बन रही थी और किससे-किससे मिलना है , तय हो रहा था।

    आरुण जी , बहुत सुन्दर रचना है ये।
    आभार।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  35. bahut achhi rachna, grihaniyon ko bahut dhyan se padha hai ya shayad bachpan mein ma ke sang ki yaad gai thi shayad aapko. rachna bahut achhi hai.

    shubhkamnayen

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  36. थे कभी एक से अधिक अवसर / यादों में डुबकी लगाने के / आपस में बतियाने के / गृहणियों के पास
    है अब बस / मटर का छीलना / पास उनके / एक-एक कर छूट गए हैं / सभी कौशल / बुनना, बीनना, बेलना आदि जैसे
    मॉल मोबाइल और टीवी मनोरंजन सहायक बन उभरे हैं।
    जिनके रसोई का बजट मँहगाई बिगाड़ देती है वहाँ ही बचा है ये कौशल अन्यथा
    'सफल मटर' ने इस सुख को भी छीनने की सुपारी ले रखी है।

    अरुण जी आपकी रचना बेहद पसंद आयी।

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