गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

विज्ञापन बनाते हुए


वातानुकूलित
सम्मेलन कक्ष में
बनायी जाती है रणनीति
कैसे छला जाना है
संवेदनाओं को
व्यापक रूप से,
कहा जाता है
उसे 'ब्रीफ'


पहुंचना
होता है
हर घर की जेब तक
कहा जाता है
छूना है
दिलों को


करनी है
संबंधों की बात
दिखानी है
रिश्तों की अहमियत
वास्तव में
लक्ष्य है
इस फेस्टिव सीज़न
जमा पूंजी में सेंध


संस्कृति
और परम्पराएं
तो बस साधन हैं
साध्य है
असीम विस्तार
नए बाज़ार
नए एम ओ यू
कुछ विलय
कुछ अधिग्रहण


विज्ञापन बनाते हुए 
करने  होते  हैं 
कई कई समझौते
हर बार स्वयं से

31 टिप्‍पणियां:

  1. मुक्त छंद मे आपकी संवेदना मुखरित है.

    "विज्ञापन बनाते हुए
    करने होते हैं
    कई कई समझौते
    हर बार स्वयं से .......... "

    धन्यवाद !!

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  2. भाई वाकई, सचाई से रूबरू करवाती हुई, शानदार रचना. साधुवाद स्वीकार करें.

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  3. sir!!! ek baar firm aapne puri sachchai ko sabdo me peerote hue...kavita bana daali,...:)


    hats offf!

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  4. एक कड़वी सच्‍चाई है कि विज्ञापन बनाते हुए करने होते हैं कई कई समझौते हर बार स्वयं से ..........।
    उनका दर्द भी देखें जिन्‍हें इन विज्ञापनों की पृष्‍ठभूमि तैयार करनी होती, यह जानते हुए कि, एक और नाली तैयार हो रही है पैसा बहाने के लिये। आजाद भारत के 60 से अधिक वर्षों में कितना ही पैसा मुखौटे तैयार करने में बह गया?

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  5. बड़ा सच व्यक्त किया आपने। किस प्रकार भावनायें उभार कर माल बेचा जाये।

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  6. बहुत पेना और सटीक कटाक्ष इन रचनाओं के माध्यम से.

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  7. अरुण जी,

    विज्ञापन बनाते हुए
    करने होते हैं
    कई कई समझौते
    हर बार स्वयं से

    इमानदारी से स्वयं को संबोधित की गई कविता

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  8. पहुंचना
    होता है
    हर घर की जेब तक
    कहा जाता है
    छूना है
    दिलों को
    karara vyangya

    उत्तर देंहटाएं
  9. अरुण जी,
    आपने आज विज्ञापन के यथार्थ से परिचय करा दिया !
    आभार ,
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  10. हर क्षणिका आज के सच से रूबरू करवाती हुयी। बाजार वाद और दिखावे ने सभी संवेदनायें लील ली है। धन्यवाद इस सच को दिखाने के लिये।

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  11. सच्चाई को निर्ममता से उजागर करती आपकी इस रचना की जितनी प्रशंशा की जाए कम है...बधाई स्वीकारें..

    नीरज

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  12. एक यात्रा उस १५ से १८ सेकण्ड के कोमर्शियल की, जो इस अल्पावधि में सिर्फ माल ही नहीं बेचते, बेच डालते हैं कुछ रिश्ते की कोमल छुवन, कुछ बच्चों की मासूम मुस्कान, कुछ जीवन की कडवी सच्चाइयां और बहुत सारा झूठ!!
    कम से कम आपकी यह ईमानदार अभिव्यक्ति को हम आपकी वास्तविक अभिव्यक्ति मानें, न की अभिव्यक्तियों का विज्ञापन!!
    :)

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  13. सूक्ष्म अवलोकन ...बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  14. सच को उजागर करती आपकी ये रचनायें बहुत सुन्दर हैं।बधाई स्वीकारें।

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  15. अपनी ही दुनिया की पोल
    अरुण मत खोल
    ऐसे बोल
    मत बोल
    रहने दे कुछ लकीरें लंबी, आरी, तिरछी और बाक़ी सब गोल।

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  16. एकदम खरी -खरी कह डाली .बधाई अरुणजी .

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  17. sab kuchh jaante bujhte hue bhi insan yahi kar rahaa hai , aapne badi safaaee se ise shabd de diye hain ...

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  18. विज्ञापन बनाते हुए
    करने होते हैं
    कई कई समझौते
    हर बार स्वयं से

    ईमानदारी वाली अभिव्यक्ति . good

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  19. कई बार लगता है ना ..कहां गलत जगह फस गए ..दिल हर बार बगावत करता है जो कर रहे है वो सही नहीं है पर दिमाग कहता है दिल की सुनोगे तो भूखे मरोगे

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  20. यदि आप अच्छे चिट्ठों की नवीनतम प्रविष्टियों की सूचना पाना चाहते हैं तो हिंदीब्लॉगजगत पर क्लिक करें. वहां हिंदी के लगभग 200 अच्छे ब्लौग देखने को मिलेंगे. यह अपनी तरह का एकमात्र ऐग्रीगेटर है.

    आपका अच्छा ब्लौग भी वहां शामिल है.

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  21. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  22. संस्कृति
    और परम्पराएं
    तो बस साधन हैं
    साध्य है
    असीम विस्तार
    नए बाज़ार
    नए एम ओ यू
    कुछ विलय
    कुछ अधिग्रहण


    क्या बात है ..अच्छी बात कही आपने

    उत्तर देंहटाएं
  23. करनी है
    संबंधों की बात
    दिखानी है
    रिश्तों की अहमियत
    वास्तव में
    लक्ष्य है
    इस फेस्टिव सीज़न
    जमा पूंजी में सेंध

    विज्ञापन जगत के खोखलेपन को उजागर करती एक उत्कृष्ट व्यंग्य रचना।

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  24. करनी है
    संबंधों की बात
    दिखानी है
    रिश्तों की अहमियत
    वास्तव में
    लक्ष्य है
    इस फेस्टिव सीज़न
    जमा पूंजी में सेंध
    ...कमाल की बात कही है

    उत्तर देंहटाएं
  25. विज्ञापन बनाते हुए
    करने होते हैं
    कई कई समझौते
    हर बार स्वयं से
    स्वयं से किया हुआ समझौता शायद सालता बहुत है

    उत्तर देंहटाएं
  26. वातानुकूलित
    सम्मेलन कक्ष में
    बनायी जाती है रणनीति
    कैसे छला जाना है
    संवेदनाओं को
    व्यापक रूप से, sateek sachchai hai ye....yahi to ho raha hai...

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  27. आदरणीय अरुण जी
    नमस्कार
    सब कुछ सामने ला दिया आपने ....बहुत शुक्रिया आपका ...शब्दों पर आपकी गहरी पकड़ भाव को ग्राह्य बनाती है

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