सोमवार, 6 दिसंबर 2010

कल फिर आना प्रथम किरण के साथ

जाओ
घर भी अब
देखो सूरज
छिप गया है
कुहासे की चादर ओढ़
क्षितिज की ओट में
हरियाली भी
सो गई है
ओढ़ कर शीत का लिहाफ
ऐसे में
तुम्हारा देर तक
मेरे साथ रहना
ठीक नहीं

जाओ तुम
मैं भी चलता हूँ
कल ले आऊंगा मैं
कुछ फूल ओस के
भर कर अपनी मुट्ठी में
और सजा दूंगा
तुम्हारे केशों में
थोड़ी सी गीली धूप
ले आऊंगा तुम्हारे लिए
अपने गालों पर लगा लेना
गुलाबी हो जाओगी तुम
आज की तरह ही
या आज से भी अधिक

मसूर के फूल
नीले नीले से हैं
देखो सो रहे हैं कैसे
मानो आसमान सो रहा हो
ख़ामोशी से
सिहर उठते हैं
कभी कभी
हवा के झोंके से
डर कर
जैसे डर रहे हो हम तुम
किसी की आहट पर ,
दिन भर
चांदी सा झिलमिल करते
यह पोखरा भी
मौन हो गया है
बस कभी कभी
मछलियों के कूदने से
टूटता है इसका सन्नाटा
वैसे ही जैसे
धड़क उठती है
तुम्हारी साँसे
मेरे छूने भर से
सुस्ताने दो
खेतो और तालाबो को
लौट जाओ तुम
अपने घर

फिर लौट आयी तुम !
चलो जाओ भी
देखो परिंदों का दल भी
लौट आया है
अपने अपने घोंसले में
जुगनू फैला रहे हैं
अपने  पंख
तैयार हैं
दिखाने को तुम्हे रास्ता
साथ हो लेना इनके
ऊपर चाँद भी होगा
छोड़ आएगा तुम्हारे
ओसारे तक
डरना नहीं
मैं तो परछाई की तरह
रहूंगा  ही साथ साथ

जाओ तुम
कल फिर आना
प्रथम किरण  के साथ

21 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमी के भावो और प्रेमिका से विछोह को बहुत ही खूबसूरती से पिरोया है…………गज़ब की कल्पनाशीलता है………गीली धूप ,मसूर के नीले फूल और ओस के फूल का बिम्ब बहुत ही सुन्दर बन पडा है । अब तक की एक बहुत ही सुन्दर अहसासों मे भीगी रचना दिल को छू गयी। प्रेमी के मनोभावों का बहुत ही खूबसूरती से चित्रण किया है।

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  2. बहुत रूमानी कविता है यह. कवि के भाव प्राकृतिक उपादानों से पुष्ट हो संप्रेषित हो रहे हैं. प्रणय बेला में भी कवि का मन युगीन भय से आशंकित है. सूफियाना दृष्टिकोण से देखें तो आत्मा-परमात्मा के मिलन में भौतिक अवरोधों का कवि ने सफलतापूर्वक चित्रण किया है. मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं अपितु हर्ष है कि अरुणजी की कवितायें अब बिम्बों के आवरण चीरने लगी है.... ! क्लासिक कविता के लिए धन्यवाद !!!

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  3. sir, it is my frst visit on ur blog, but im feeling a classiness in ur thoughts......kinda difference which nvr seen before......
    @karan mei aapse purntah sahmat hoo.

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  4. फिर लौट आयी तुम !
    चलो जाओ भी
    देखो परिंदों का दल भी
    लौट आया है
    अपने अपने घोंसले में
    जुगनू फैला रहे हैं
    अपना पंख
    तैयार हैं

    सुंदर कल्पनाशीलता है
    कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी

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  5. प्रेमानुभूति और मौसम जाड़े का,सही कहा ना

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  6. इसमें चित्रात्मकता है। आपने बिम्बों से इसे सजाया है। चाक्षुष बिम्ब का सुंदर तथा सधा हुआ प्रयोग। बिम्ब पारम्परिक ही नहीं नवीन भी। इस कविता की अलग मुद्रा है, अलग तरह का लय, और अद्भुत मुग्ध करने वाली, विस्मयकारी कविता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    विचार-प्रायश्चित

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  7. बहुत रूमानी है ...बहुत बहुत बहुत रूमानी है ... एक एक ईमेज कई सौ मेगा पिक्सेल के कैमरा से खींची लग रही है ..इतनी साफ़ दिख रही है इस नज़्म में ....

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  8. मसूर के फूल
    नीले नीले से हैं
    देखो सो रहे हैं कैसे
    मानो आसमान सो रहा हो
    ख़ामोशी से
    बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण,गज़ब की कल्पनाशीलता. लोगों को साफ दिख रहा है पर मुझे तो सब गड़बड़ ही लग रहा है.माज़रा क्या है ?

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  9. लौट लौट हम आयेंगे,
    आशा नित्य जगायेंगे।

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  10. अरुण जी!! आज तो अपने रूमानियत को चाँद की ऊँचाईयों तक पहुँचा दिया... मुझे लगा कि मैं ब्लैक एण्ड व्हाइट युग की कोई रोमांटिक फ़िल्म देख रहा हूँ या किसी कंवास पर बनाचित्र जिसमें आपने रंगों की जगह शब्दों को बिठाया है!!

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  11. सुन्दर भावों से सजाया है आपने कविता को.

    आपका साधुवाद.

    आपके अपने ब्लॉग पर आपका सदैव स्वागत रहेगा.
    http://arvindjangid.blogspot.com/

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  12. जाओ तुम
    कल फिर आना
    प्रथम प्रभात के साथ

    हे चित्रकार
    अपनी भावनाओं को सुंदर रंगों में रंग है तुमने.
    ये रंग ही तो हैं
    जो बिखेर दिए तुम कविता में.

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  13. सुन्दर दिखती कविता वास्तव में सतही है.. गंभीर बिम्ब का सर्वथा आभाव है.. प्रकृति पर सुमित्रानंदन पन्त को हिंदी में और अंग्रेजी में वर्डस्वर्थ, शेल्ली, फ्रोस्ट, आर्नोल्ड आदि को पढ़ें अरुण सर ..

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  14. komal bhavnavon ko kalpana ke par dekar kya chitrkavy racha hai aapki sughar lekhni ne !
    isme do ray nahi..kavita hriday se nikli hai.
    bahut sundar!

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  15. अरे वाह बेहद रोमानी कविता ...हम तो अक्सर इसी मूड में रहते है मज़ा आ गया ..मान मनुहार पढ़ कर

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  16. जाओ तुम
    मैं भी चलता हूँ
    कल ले आऊंगा मैं
    कुछ फूल ओस के
    भर कर अपनी मुट्ठी में
    और सजा दूंगा
    तुम्हारे केशों में


    अरुण जी, आज भी निशब्द हूँ.. छन्दमुक्त रचनाओं में जो भाव पिरोते है क़ाबिले-तारीफ़ है....रचना बहुत सुंदर बन पड़ी है...बधाई स्वीकार करे...

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  17. फिर लौट आयी तुम ! kitni madhurta hai is ulahne me,jane ko kahna,jane dene ka man na hona,aur laut aane par anjani ashanka ke chalte ye meetha sa ulahna.....man ki har uljhan ko vyakt kar gayee ye panktiyan.....

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  18. सुंदर भावों से सजी प्रेम में डूबी अभिव्यक्ति .....

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