बुधवार, 8 दिसंबर 2010

कोरियर ब्यॉय

मिल जाता है
अक्सर ही
दफ्तर की
सीढ़ियों में
चढ़ते उतरते
हाथ में नीला सा बैग लिए
जिस पर छपा है उसकी कंपनी का
बड़ा सा 'लोगो'
कंपनी के कारपोरेट रंग का
यूनिफार्म पहने
स्मार्ट सा कोरियर ब्यॉय

दस मंजिल तक
चढ़ जाता है वह
किस्तों में
हाँफते हुए
भागते हुए
एक दफ्तर से
दूसरे दफ्तर
बांटते पैकेट
लिफाफे
जिसे गारंटी से डिलीवर करना होता है
दोपहर बारह बजे से पहले
कंपनी की कारपोरेट नीति और
प्रीमियम सेवा के लिए
प्रीमियम दाम के बदले

लगता है
कभी कभी
मुझे खेतों के बैल
बंधुआ मजूर सा
वह स्मार्ट सा
कोरियर ब्यॉय
जिसे नहीं पता कि
न्यूनतम मजदूरी क्या है
इस मेट्रो शहर में .

10 टिप्‍पणियां:

  1. यकीनन स्मार्ट सा वह कोरियर ब्वाय जब घर पहुँचता होगा तो सारी स्मार्टनेस काफूर हो जाती होगी.

    बखूबी और बहुत सुन्दरता से आपने अत्यंत करीबी दृष्टि की रचना रची है

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  2. बहुत सही लिखा है .सच ही स्मार्ट बंधुआ मजूर सा ही लगता है .
    बेहतरीन अभिव्यक्ति.

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  3. ऐसा लगता है जैसे आपने बहुत ध्यान से देखा है और तब रचा है इस रचना को……………जहां आम इन्सान की नज़र नही जाती वही आप होते हैं………सजीव चित्रण्।

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  4. लगता है
    कभी कभी
    मुझे खेतों के बैल
    बंधुआ मजूर सा
    वह स्मार्ट सा
    कोरियर ब्यॉय
    जिसे नहीं पता कि
    न्यूनतम मजदूरी क्या है
    इस मेट्रो शहर में


    aapne sahi kaha ...sirf roop badla hai ..samasya nahi .

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  5. ab har din ..har baat kavita me dhalne lagi hai ,
    lekhni kuchh yoon chalne lagi hai ..
    syahi ka safar jajbaaton se karne lagee hai ...

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  6. सभी किसी न किसी तरह से कोरियर ब्वॉय ही हैं आज एक रोटी की गोलाई के चक्कर में.

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  7. वाह... कोरियर वाले को ही पोस्ट कर दिया आपने तो...
    बहुत सुन्दर रचना... हमेशा की तरह...

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  8. na sirf corrier boy arun sir...balki salesman..ya ye adhe ghante men aapke ghar seva muhaiiyaa karane wale restaurent...sabke yahaan kaam karne wale ka yahi haal hai..bahut achhi nazm hai.. :)

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