गुरुवार, 6 जनवरी 2011

माएं जानती हैं रैपर का मनोविज्ञान

विज्ञापन के प्रभाव से
जो आती है
छद्म मुस्कान
मासूम बच्चों के चेहरे पर
नहीं खोना चाहती हैं माएं


बनाती हैं संतुलन
बजट और  बाज़ार के बीच
रैपर के मनोविज्ञान की 

अदृश्य किन्तु मज़बूत डोरी से


मध्य वर्ग का 
मध्यम मार्ग अपनाती हुई 
कई माएं
खरीद लाती हैं कभी कभी 

ब्रांडेड महंगी चीज़ें
जैसे बिस्कुट, खाद्य सामग्रियां

चमकीले रैपरों में
जाकर बाहर अपने बजट से 


संभाल  कर रखती हैं
उन रैपरों को
महीनों तक
क्योंकि फिर से
भरना होता है उनमें 
तथाकथित लोकल वस्तुएं
और लडती हैं 

बाज़ार से
पूरी चालाकी से 


रैपर के मनोविज्ञान से 
कई बार हारता है बाज़ार
क्योंकि माएं 
जानती हैं अब भी
अपने बच्चों का मनोविज्ञान

29 टिप्‍पणियां:

  1. क्योंकि माएं
    जानती हैं अब भी
    अपने बच्चों का मनोविज्ञान ...

    बेहतरीन प्रस्तुति।

    .

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  2. रैपर के मनोविज्ञान से
    कई बार हारता है बाज़ार
    क्योंकि माएं
    जानती हैं अब भी
    अपने बच्चों का मनोविज्ञान
    या शायद मजबूरन बाजार और बच्चों के मनोविज्ञान से समझौते करने पड़ते हैं .. शायद

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  3. क्योंकि माएं
    जानती हैं अब भी
    अपने बच्चों का मनोविज्ञान

    maayen to mayen
    yahan padh kar lag raha hai
    papa ko bhi pata hai...:D
    bahut khub sir!! aapki koi tulna nahi...

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  4. BAHUT KHOOB ARUN JI.....AAPKI KAVITAO KI BAAT HI NIRALI HOTI HAI.
    EKDUM ALAG VISYA PAR
    ..............BAHUT KHOOB..SIR JI.

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  5. बडा गहरा चिन्तन किया है…………………क्या किया जाये कभी कभी बच्चो कि जिद पूरी करने के लिये उन्हे पानी मे भी चांद दिखाना पड्ता है।

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  6. • इस कविता में बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के इस दौर में अधुनिकता और प्रगतिशीलता की नकल और चकाचौंध में किस तरह हमारी ज़िन्दगी घुट रही है प्रभावित हो रही है, उसे आपने दक्षता के साथ रेखांकित किया है। बिल्कुल नए सोच और नए सवालों के साथ समाज की मौज़ूदा जटिलता को उजागर कर आपने सोचने पर विवश कर दिया है।

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  7. बहुत से सीख लिया करते हैं मां से रैपर का मनोविज्ञान.

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  8. बहुत ही सूक्ष्म अवलोकन, उतना ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण।

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  9. अरुण जी बहुत अच्छी प्रस्तुति ले कर आये हैं आप.इसे पढ़ कर मुझे याद आया की मैंने एक बार मेरी IGNOU की student को रिसर्च के लिए यही टोपिक दिया था "Effect of media on eating habits of adolscents from middle income group" " Nutrition & health education" के paper में

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  10. अरुण , लाजवाब कर देते हो यार तुम |

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  11. बड़ी सूक्षमता से माँ की कशमकश और अपने बच्चे के चहरे पर मुस्कान देखने की कोशिश को बयाँ किया है ...
    बढ़िया अभिव्यक्ति

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  12. मां और बच्चे के बीच जो एक bond होता है और जो उन का मनोविज्ञान होता है उस की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति है

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  13. रैपर के मनोविज्ञान से
    कई बार हारता है बाज़ार
    क्योंकि माएं
    जानती हैं अब भी
    अपने बच्चों का मनोविज्ञान
    sukshm adhyayan

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. संभाल कर रखती हैं
    उन रैपरों को
    महीनों तक
    क्योंकि फिर से
    भरना होता है उनमें
    तथाकथित लोकल वस्तुएं
    और लडती हैं
    बाज़ार से
    पूरी चालाकी से

    इन पंक्तियों में दिखती है माँ की संवेदना,बच्चों से लगाव और घरेलू बजट से जूझते रहने की लगातार कोशिश भी. good communication.

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  16. मॉं ने कोशिश की
    सदा बच्‍चों को दूर रखे
    वाद से, विवाद से
    और हो सके तो पूँजीवाद से।
    लेकिन, बच्‍चे
    अक्‍सर पड़ गये भारी
    और मॉं ने अनमने भाव से
    पूँजीवाद की आरती उतारी।

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  17. आपकी विशेषता है कि आप हर बार हमारे बीच से ही एक ऐसा काव्य-विषय उठा लाते हैं जो सोचने पर मजबूर कर देती है. आपने संतुलित शब्दों में आधुनिक चकाचौंध, संसाधनों का असमान वितरण, बाजारवाद, असंतुलित अर्थव्यवस्था में गृह-संचालन की चुनौती, मातृ मनोविज्ञान आदि का बड़ा ही सहज चित्रण किया है.

    रैपर के मनोविज्ञान से
    कई बार हारता है बाज़ार
    क्योंकि माएं
    जानती हैं अब भी
    अपने बच्चों का मनोविज्ञान

    इस पंक्ति में जो पंच होना चाहिए शायद वह कुछ कम रह गया है.... शायद 'मनोविज्ञान' शब्द के खुल कर आ जाने से वो भी दो-दो बार. अन्यथा नहीं लेंगे. आपसे हमेशा कुछ अधिक की उम्मीद रहती है.

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  18. अभी एक शब्द नहीं मेरे पास तरल हो चुके मनोभावों को ठोस बना अभिव्यक्त करने के लिए...

    साधुवाद आपका इस सार्थक सृजन के लिए...

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  19. रैपर का मनोविज्ञान दर्शाती एक सुन्दर कविता .बधाई .

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  20. एक अनछुए विषय को माँ की संवेदना से जिस तरह आपने जोड़ा है उसके लिए आपकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है !
    रचना बहुत अच्छी लगी !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  21. बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति है| बधाई|

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