गुरुवार, 13 जनवरी 2011

बोनसाई 2

प्रतीक के रूप में

जब इस्तेमाल हो रहे हैं
जीवन के मूल तत्त्व जैसे 
जल वायु आकाश अग्नि और पृथ्वी 
दीवारों पर टंगे 'कृष्ण अर्जुन' के संवाद वाले पोस्टर से
मिल रही है प्रेरणा 
प्रकृति प्रेम परिलक्षित हो रहा है 
दीवारों के 'सिंथेटिक' रंगों से 
अचंभित नहीं करते 
टैरेस गार्डेन में 
आम, जामुन, लीची, 
नीम और पीपल 

अपने लघु आकार में 


दूरियों के 
सिमटने के साथ ही
सिमट रहे हैं 
अपने दायरे 
सरोकार जाहिर करने के लिए 
बदल गई है विधि 
ऐसे में अचंभित नहीं करता 
दो अपनों के बीच
स्पेस  का आग्रह
और कमरे के कोने में रखे 
बोनसाई का संक्रमण 

बोनसाई है 
अट्टहास 
हमारे लघु होते मानस पर 
सिकुड़ते दृष्टिकोण पर 
सूखते प्रेम कुंड पर 


घर के अन्तरंग कोनो में 
गर्वित हो शोभायमान बोनसाई 
खुश होता है 
देख हमारा  अकेलापन 
लघु होते  संस्कार और
विलुप्त  प्राय संस्कृतियाँ 

विशाल हो फैला लेता है 
अपनी जड़े 
हमारे मष्तिष्क पर 
बोनसाई 

25 टिप्‍पणियां:

  1. बोनसाई हमारे रिश्तों में स्पेस मांगने लगी है |

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  2. बेहद सशक्त रचना.जीवन के बोनसाईकरण पर सार्थक

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  3. आपको और आपके परिवार को मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !"

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  4. एक अर्थ पूर्ण रचना दुबारा पढने को मिली ..आपका आभार

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  5. काव्‍य बिंब में मान्‍य हो, लेकिन संस्कार के साथ लघु दीर्घ जैसा प्रयोग और संस्कृति (परिवर्तनशील होती है) विलुप्त प्राय होना, मुझे दुरूह प्रतीत हो रहा है, शायद अपनी काव्‍य-रुचि-सीमा के कारण.

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  6. अरुण जी आपकी कविता समय के साथ आंच में तपे कुंदन की तरह निखरी है। आपकी काव्यकत्मकता निखार पर है। आपकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है। मामूली सी बात भी आपकी कविता में ख़ास हो जाती है। आप रचनात्मक ऊर्जा से भरे हुए हैं। आपकी रचनात्मक ऊर्जा देख कर रश्क होता है। समाज में आसन्‍न संकटों की भयावहता से हमें परिचित कराया है आपने इस कविता के माध्मय से। आपकी वैचारिकता की मौलिकता नई दिशा में सोचने को विवश करती है । बोनसाई के द्वारा बिल्‍कुल नए सोच और नए सवालों के साथ समाज की मौजूदा जटिलताओं को उजागर किया है आपने।

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  7. बौने होते संस्कार और लुप्त होती परम्पराओं पर आपकी वेदना इस कविता में दिखाई देती है!

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  8. बोनसाई है
    अट्टहास
    हमारे लघु होते मानस पर
    सिकुड़ते दृष्टिकोण पर
    सूखते प्रेम कुंड पर
    यकीनन बोनसाई एक एहसास है संकुचित मानसिकता का वर्ना विशालतम को बौना बना देना और उसमें सौन्दर्य ढूढना और क्या है?

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  9. घर को ही संसार मानने वाले, संसार के विशालतम प्रतीकों को सहेज कर घर में सजाना चाहते हैं।

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  10. खुश होता है
    देख हमारा अकेलापन
    लघु होते संस्कार और
    विलुप्त प्राय संस्कृतियाँ

    बहुत खूबसूरती से आज की सोच को परिभाषित किया है ..

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  11. बहुत सुन्दर रचना . लोहड़ी और मकर संक्रांति की शुभकामनायें

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  12. बोनसाई है
    अट्टहास
    हमारे लघु होते मानस पर
    सिकुड़ते दृष्टिकोण पर
    सूखते प्रेम कुंड पर

    वाह...अद्भुत सोच...इस विलक्षण रचना के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें...

    नीरज

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  13. jab bhi aapke blog pe aata hoon, ek hi baat sochta hoo......aapki soch ko salam!! aapkee soch ka dayra itna vistrit hai ki kuchh bhi achhuta nahi...mujhe lagta hai, aap jab bhi kuchh naya dekhte ho, aapka kavi mann usko apne sabdo me ukerne legta hai...:)

    hai na...dhanya hain ham jo aapko follow kar raha hen.......:)
    Manoj sir kee baato se purntaya sahmat!

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  14. मेरे दिल की सारी बात मनोज जी ने कह दी…………आपकी लेखनी से सच मे रश्क होने लगा है……………आपकी सोच बेहद सूक्ष्म होती जा रही है चीजो के पार देखने की क्षमता ही इंसान को अलग बनाती है।

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  15. निष्‍ठुर मनुष्‍य का
    प्रकृति से खिलवाड़
    जिस बरगद के नीचे
    कोई पनप नहीं पाता
    उसे बोनसाई बनाकर
    अपने ड्राइंग रूम के
    एक कोने की सीमा में बॉंधे
    बढ़ने नहीं देता।
    ऐसी सोच
    बो न सॉंई।

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  16. बोनसाई के माध्यम से वर्तमान को आइना दिखता सच .मानव मूल्यों में आ रही गिरावट को रेखांकित करती रचना.

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  17. बोनसाई -२ के माध्यम से अपने सामजिक विद्रूप पर एक सशक्त कमेन्ट किया है ,बधाई .

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  18. sashakt rachana.....samjhne me bahut jor lagana pada hamaare nanhe se man, mastishk ko........

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  19. बोनसाई है
    अट्टहास
    हमारे लघु होते मानस पर
    सिकुड़ते दृष्टिकोण पर
    सूखते प्रेम कुंड पर

    गहन चिंतन से परिपूर्ण बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  20. घर के अन्तरंग कोनो में
    गर्वित हो शोभायमान बोनसाई
    खुश होता है
    देख हमारा अकेलापन
    लघु होते संस्कार और
    विलुप्त प्राय संस्कृतियाँ
    bonsai sanskriti ,aur bonsai prem ab har jagah ghar kar raha hai...hamare jeevan me rishton me sanskriti me...bahut dukhad hai ye...

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  21. अरुण जी, हमेशा की तरह इस बार भी बेहतरीन रचना..आज कल हम अपने विचार से नही बल्कि देखा देखी काम अधिक करते है..बस उसी का परिणाम है कि तुलसी और गुलाब कम और बोनसाई ज़्यादा दिखते है.. ..सुंदर रचना के लए साधुवाद..अरुण जी, हमेशा की तरह इस बार भी बेहतरीन रचना..आज कल हम अपने विचार से नही बल्कि देखा देखी काम अधिक करते है..बस उसी का परिणाम है कि तुलसी और गुलाब कम और बोनसाई ज़्यादा दिखते है.. ..सुंदर रचना के लए साधुवाद..

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  22. बोनसाई है
    अट्टहास
    हमारे लघु होते मानस पर
    सिकुड़ते दृष्टिकोण पर
    सूखते प्रेम कुंड पर

    बहुत खूब .. सही जगह जा कर पकड़ा है ... सचमुच इसनान का दायरा सिमिटा जा रहा है ...

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