शनिवार, 15 जनवरी 2011

लकीरें

सिखाया गया था 
बचपन में 
एक लकीर को 
छोटा  करने के लिए
खींचनी चाहिए
एक बड़ी लकीर 
समय के साथ
बदल गई यह सीख
और छोटी कर रहे हैं
हम लकीरें
काट कर. 

दादा जी कहते थे
उनकी हाथ की लकीरे
देखनी है तो देखो
हल के मुट्ठे को
हथेलियों में 
कहाँ होती हैं लकीरें 
आम आदमी के 

पानी पर 
खींचते हुए लकीरें 
खो जाता हूं मैं 
याद करते हुए 
उन लकीरों को 
जो खींची थी  तुमने 
मेरी हथेलियों पर, 
अंतिम बार 
जब मिले थे हम . 

33 टिप्‍पणियां:

  1. लाजबाब क्षणिकाएं जीवन के अनुभूत सत्यों को उद्घाटित करती हुई ...हर एक क्षणिका गहरा अर्थ बोध करवाने में सक्षम है ...शुक्रिया

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  2. समर्थकों का शतक लगने की बधाई ......आशा है यह काफिला और आगे बढ़ता रहेगा ...हार्दिक शुभकामनायें 1000 वें समर्थक होने के लिए

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  3. बहुत ही सटीक और उपयुक्त क्षणिकाएं.. अच्छा लगा..

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  4. जीवन की सरल रेखाएं, कभी सर्पाकार, कभी तिर्यक और कभी छाप छोड़ती.

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  5. बहुत बहुत सच कथन है इन लाइनों में"सिखाया गया था बचपन से -------और छोटी कर रहे हैं उनको काट कर "
    बहुत अच्छी सोच |
    आशा

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  6. पानी पर
    खींचते हुए लकीरें
    खो जाता हूं मैं
    याद करते हुए
    उन लकीरों को
    जो खींचे थे तुमने
    मेरी हथेलियों पर,...

    hmmmmmm jane kitna kuch yaadon me ghumta hai aur hatheliyaan thartharane lagti hain

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  7. सिखाया गया था
    बचपन में
    एक लकीर को
    छोटी करने के लिए
    खींचनी चाहिए
    एक बड़ी लकीर
    समय के साथ
    बदल गई यह सीख
    और छोटी कर रहे हैं
    हम लकीरें
    काट कर.

    सत्य पर आधारित क्षणिका

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  8. सिखाया गया था
    बचपन में
    एक लकीर को
    छोटी करने के लिए
    खींचनी चाहिए
    एक बड़ी लकीर
    समय के साथ
    बदल गई यह सीख
    और छोटी कर रहे हैं
    हम लकीरें
    काट कर.

    सही आइना दिखाया है आपने लोगों को.

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  9. बहुत सुन्दर बदलते हुये परिवेश को इन क्षणिकाओं के माध्यम से बेहतरीन शब्दों से उतारा है।सभी क्षणिकायें एक से बढ कर एक है मगर दूसरी बहुत अच्छी लगी।बधाई।

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  10. पर कोई सीधी लकीरें मिली ही नहीं।

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  11. बदल गई यह सीख
    और छोटी कर रहे हैं
    हम लसमय के साथ
    कीरें
    काट कर।

    तीन लकीरें, तीन दृश्य, तीन क्षणिकाएं।
    वाह.. बहुत सुंदर।

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  12. आज बहुत दिनो बाद आपकी एक बेहद उम्दा और खूबसूरत रचना पढने को मिली……………


    वो कहते हैं
    खींच दी है
    मैने एक लकीर और
    अब इस पार मै
    और उस पार तुम
    कुछ लकीरें स्थायी होती हैं
    अमिट्……जिन्हे पाटा नही जा सकता

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  13. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (17/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  14. पानी पर
    खींचते हुए लकीरें
    खो जाता हूं मैं
    याद करते हुए
    उन लकीरों को
    जो खींचे थे तुमने
    मेरी हथेलियों पर,
    अंतिम बार
    जब मिले थे हम

    bahot khub...

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  15. सराहनीय प्रस्तुति. पर कहीं बहक न जाना इन लकीरों के चक्कर में

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  16. पानी पर खिंची लकीरें मन पर स्थाई आकृति बना लेती हैं .सरहानीय प्रस्तुति ..

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  17. teenon kshanikaayen lakeeron ke teen aayam kholti hain.... aur teenon hee aayam bahut aawashyak hain... behad acchi kshanikayen hain :)

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  18. aapki har kavita zindagee ke chhote chhote sach jeetee hai .. sab padhate hain par tippanii kabhi kabhi ..
    bahut badhaayi..

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  19. सुंदर ...बेमिसाल क्षणिकाएं.... दूसरी क्षणिका बहुत ही अच्छी लगी.....

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  20. प्राचीन उपमानो की पुनर्प्रस्तुति है... कोई नयी बात नहीं है इन कविताओं में..

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  21. हथेलियों में
    कहाँ होती हैं लकीरें
    आम आदमी के

    लाज़वाब पंक्तियाँ..हरेक क्षणिका बहुत खूबसूरत..

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  22. बहुत सुंदर क्षणिकाएं हुई हैं सर... जैसे हर लकीर अपने अंदर ढेर सारे बिन्दों को समेटे हुए एक नया बिम्ब देती है...वैसी ही हैं यह तीनो क्षणिकाएं

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  23. कविता इतने कम हरूफ में लिखी है आपने कि हमें भी सिर्फ एक शब्द मे कहना पड़ रहा है, 'धांसू' !

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  24. सभी क्षणिकाएँ लाजवाब! पहली जीवन का दस्तूर बताती हुई.. दूसरी ने याद दिला दीं बलराज साहनी की वे पंक्तियाँ (फिल्म वक़्त)कि लकीरें देखनी हों तो मेरे हाथ की नहीं,मेरे पीठ की देखो. और तीसरी क्षणिका ने तो क़तील साहब की याद दिला दीः
    अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
    मैं हूँ तेरा, तू नसीब अपना बना ले मुझको!

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  25. अतिसुन्दर मनमोहक क्षणिकाएं..जो भावुक भी करती हैं और चिंतन को खुराक भी देती हैं ...

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  26. 'दादा जी कहते थे
    उनकी हाथ की लकीरे
    देखनी है तो देखो
    हल के मुट्ठे को
    हथेलियों में
    कहाँ होती हैं लकीरें
    आम आदमी के '

    क्या बात है ! लकीरों से हमारे शाश्वत मूल्यों के टूटने की आवाज़ के साथ जीवन की डूबती सिसकियों की पूरी कहानी उभर कर आ रही हैं !
    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  27. वक्त के साथ बीत गई लकिरों की परिभाषाएं,उग आए है नए हाकम जो खरीदते बेचते हैं आम आदमी की लकीरें.टेड़ी या मेडी,किधर जाएगी,तयशुदा है पहले से,कविता के बहाने शहरों के हित अनाज उपजते खेतों में धंसे किसान अच्छे से उभरे हैं आज.रेखाएं प्यार में भी रही ,कभी हाथ में छूटे अहसास के मानिंद या कभी दिल में बहुत गाढ़े से.

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  28. लकीरों को अलग-अलग तरीको से पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त किया है. सुन्दर क्षणिकाएं

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  29. इन बेजोड़ क्षणिकाओं के लिए आपकी जितनी प्रशंशा करूँ कम है...कमाल किया है आपने...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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