सोमवार, 10 जनवरी 2011

बोनसाई

जब मैं बातें करता था
खेतों की
अच्छा लगता था तुम्हे
साथ चल दिया करती थी तुम
मेरे साथ एक यात्रा पर
पगडंडियों के सहारे
यादों से गुजरते हुए
चली जाती थी तुम
मेरे बचपन में
तोड़ लाती थी कुछ गेहू की बालियाँ
अमलताश के लरजते लटकते
फूलों  से लदी डालियों पर
झूल आया करती थी
और जब मैं कहता था
अमलताश के पीले फूलों के बीच 
सुन्दर लगता है तुम्हारा चेहरा
हंसी के फव्वारे में 
भीग जाते थे हम

मेरे गाँव के पोखर में
नहा आती थी तुम
बातों ही बातों में
और सुखाती थी अपने गीले केश
मद्धम धूप में
औरतों वाले  घाट पर
तुम्हारे क्लब के तरणताल से कहीं अधिक
अच्छा लगता था तुम्हे
मेरे गाँव के बाहर का वह पोखरा
जिसकी विशालता के कारण कहते हैं
दैत्यों ने खोदा था इसे और
यहीं तैरना सीखा था मैंने

मेरी साइकिल पर
घूम आती थी तुम
हाट बाज़ार
स्कूल कालेज
वैद्य जी का घर
पंसारी की दुकान
इकलौता पोस्ट ऑफिस
मेरे रिश्तेदारी तक को
जान गई थी तुम धीरे धीरे
निकटता उनसे हो गई थी तुम्हारी 
मुझसे कहीं अधिक

तुमने देना चाहा मुझे
अपने जीवन में स्थान
फिर एक दिन दिखाया
अपना विशाल और भव्य बैठक खाना
जिसमे रखे थे 

तरह तरह के बोनसाई
दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को
कोने में रखा था एक बरगद
मेरे गाँव के बरगद सा.


और लौट आया मैं अपने गाँव.

34 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण भैया
    कविता में उभरा गाँव बहुत अच्छे से महसूसा हैं मैंने भी. किसी को मन मैं रख लिखी कविता भा गई.आप लिखते रहे और हमारे लिए कुछ विषय तो बाकी रखें ....हम किस विषय पर लिखें. टोटा पड़ जाएगा.-
    आदर सहित,

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  2. बोनसाई ....बहुत फेशन में है आजकल..
    खूबसूरत बिम्ब दिये हैं आपने.
    सुंदरा रचना..

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  3. अद्भुत रचना है ये आपकी...वाह...कितना कुछ समेटा है आपने इसमें...कहीं प्यार है कहीं दर्द तो कहीं समाज की ऊंच-नीच वाली वयवस्था ...लाजवाब रचना

    नीरज

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  4. बहुत ही सुन्दर कविता...
    वाह....
    बेहतरीन सोच...

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  5. अरुण जी,
    बिल्कुल अलग अंदाज़ है आपका...दिल को छूने वाला.

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  6. अरुणजी,

    यह अकविता मेरे पसंद की है. अब ये मत पूछियेगा क्यूँ.... ? लेकिन मैं पूछ रहा हूँ इस रचना कि 'प्रेरणा' कौन है ?

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  7. गाँव में जब रहता था... और वो मेरी साईकिल..... ज़िन्दगी के उन दिनों का सफ़र ताज़ा हो गया | सुंदर रचना के लिए बधाई |

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  8. इतना गहन तुलना बोनसाई और जीवन की, वाह।

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  9. बहुत सुन्दर ...
    बोनसाई होते रिश्ते कितना घुटन महसूसते होंगे.

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  10. फिर एक दिन दिखाया
    अपना विशाल और भव्य बैठक खाना
    जिसमे रखे थे
    तरह तरह के बोनसाई
    दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को

    कविता मन में गहरी छाप छोड़ने में सफल हुई है।
    एक उत्तम रचना के लिए बधाई, अरुण जी।

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  11. बोनसाई और बरगद ...वाह !
    अनुपम रचना।

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  12. फिर एक दिन दिखाया
    अपना विशाल और भव्य बैठक खाना
    जिसमे रखे थे
    तरह तरह के बोनसाई
    दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को rishaton ko bonsai bana kar rakhane ki chaht rishton ko panapne se vanchit kar deti hai....kavita me mansikata ko darshane ke liye sunder bimbon ka upayog sunderta se hua hai....

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  13. लाजवाब रचना. अमलताश के लरजते लटकते
    "फूले से लदी डालियों पर
    झूल आया करती थी
    और जब मैं कहता था
    अमलताश के पीले फूलों के बीच
    सुन्दर लगता है तुम्हारा चेहरा
    हंसी के फव्वारे में
    भीग जाते थे हम"

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  14. बोनसाई हमारी उस वीभत्स सोच की प्रतीक है ,जो प्राकर्तिक उपादानों तक को उसके सही आकार में देखने तक से कतराती है .सुन्दर कविता..
    निर्मल

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  15. हम्म।
    गांव का बरगद ही अच्छा है, क्या हुआ जो बूढा हो गया है, इन दिनों।

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  16. क्या बात है अरुण जी !
    बेहतरीन रचना !
    बोनसाई पर और भी रचनाएं पढ़ी हैं लेकिन आप का अंदाज़ सब से अलग है
    बधाई

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  17. अरुण जी,
    बिल्कुल अलग अंदाज़
    तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  18. बेहद सशक्त रचना.जीवन के बोनसाईकरण पर सार्थक,कम में बहुत कुछ कहती.

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  19. बहुत ही खूबसूरत वर्णन गाँव का और तालमेल उंच-नीच का..
    अच्छी रचना.. बधाई...

    आभार

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  20. कविता का शीर्षक भले ही 'बोनसाई " हो मगर कथ्य बरगद जैसा विशाल,हृदयस्पर्शी और मर्मस्पर्शी होने का आभास कराता है. श्रृंगारिक पक्ष दर्शाती निम्न पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगीं.

    अमलताश के लरजते लटकते
    फूलों से लदी डालियों पर
    झूल आया करती थी
    और जब मैं कहता था
    अमलताश के पीले फूलों के बीच
    सुन्दर लगता है तुम्हारा चेहरा
    हंसी के फव्वारे में
    भीग जाते थे हम

    उफ़, ये भीगना भी कितना सुखद है. बधाई.

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  21. बहुत सुन्दर!
    ग्रामीणान्चल से निकलकर कविता कब क्लब के भीतर प्रवेश की पता ही नहीं चलता....यदि आप ड्राइंगरूम में सजे बोनसाई न दिखाते.
    सुन्दर प्रतिमानों सज्जित से एक गूढ़ अर्थ सामने रखती हुई आपकी कविता भी सुन्दर है......
    शुभकामनाएँ......

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  22. ... विशाल और भव्य बैठक खाना
    जिसमे रखे थे
    तरह तरह के बोनसाई
    दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को
    कोने में रखा था एक बरगद
    मेरे गाँव के बरगद सा.
    और लौट आया मैं अपने गाँव.
    ... laajawaab !!

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  23. बड़ी ख़ूबसूरत कविता है....प्यारी सी...
    लोगों को , सुनने को ये खेत-पोखर की बातें अच्छी लगती हैं..पर उनके लिए जीवन का सच...बोनसाई ही है.
    इसे बड़ी कुशलता से शब्दों में पिरो दिया

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  24. तुमने देना चाहा मुझे
    अपने जीवन में स्थान
    फिर एक दिन दिखाया
    अपना विशाल और भव्य बैठक खाना
    जिसमे रखे थे
    तरह तरह के बोनसाई
    दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को
    कोने में रखा था एक बरगद
    मेरे गाँव के बरगद सा.
    tab jana is pyaar ko
    is samman ko ...

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  25. delhi aa kar to is tarah ke bahut se anubhavon se do chaar hua hoon....lekin gaon lautna chaah ke bhi nahi laut pataa...bahut acchi rachna lagi arun sir....

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  26. अरूण सर! अच्छा हुआ आपने अपनी कविता के नायक "मैं" को गाँव लौटने काअंत सुझाया. बात हास्य की नहीं किंतु हो सकता था वो "मैं" उस नायिका के ड्राईंग रूम में बोनसाई बने शोभा बढा‌ रहे होते एक शो पीस की तरह!

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  27. अरुण जी,
    कविता सोचने पर विवश करती है !
    इसका अंत तो पाठक की संवेदना को झकझोर कर रख देता है !
    संग्रहणीय रचना !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  28. बहुत अच्छी प्रस्तुति....बधाई!
    कभी समय मिले तो हमारे ब्लॉग//shiva12877.blogspot.com पर भी अपनी एक नज़र डालें .

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  29. bahut sundar...ek shrota aur paathak ke naate mujhe jo baat sabse jyada achchi lagu o ye ke ek lambi rachna hone ke baawjood ras ko kaayam rakha aapne aur bahut achchi tarah kaakyam rakha...aur jo kuch bhi likha hain aapne bahut saaf aur rochak dikh raha hain...ye kavita yaad rahegi,

    उत्तर देंहटाएं
  30. फिर एक दिन दिखाया
    अपना विशाल और भव्य बैठक खाना
    जिसमे रखे थे
    तरह तरह के बोनसाई
    दर्शा रहे थे तुम्हारी पसंद को ...
    दिल की गहराइयों से निकल कर आ रही है कविता ... अच्छा दृश्य बाँधा है ...

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