बुधवार, 19 जनवरी 2011

प्रथम वर्षगांठ पर


(कल यानि १८ जनवरी को सलिल वर्मा जी (चलाबिहारी ब्लॉगर  बनने फेम) की  शादी की  सालगिरह थी . संयोग से मिलना हुआ स्वप्निल 'आतिश' के  साथ. उनसे मिलकर जब घर लौटा तो मेरी अपनी डायरी  में अपने विवाह के पहले वर्षगाँठ पर लिखी कविता मिली, सोचा पोस्ट कर दूं . )  

साल गुज़र गया
हम रहे साथ साथ
कैसे बीता
खबर ही नहीं

धरती अपने  अक्ष पर
घूमती रही अपनी गति से
हमें लगी बहुत तेज़
फिर भी
हमारी सम्मिलित कल्पनाओं से
अधिक नहीं !

ऋतुएँ आईं
ऋतुएँ गई  भी
हमारे लिए तो रहा
वसंत ही
खिले रहे पुष्प
मन के आँगन में
और स्थगित रहा पतझड़
ड्योढ़ी पर ही
साल जो गुज़र गया
हाथ में रहा तुम्हारा हाथ

ठीक है
चाँद नहीं ला पाया मैं
धरती पर
तुम्हारे लिए
तारे भी नहीं लाया तोड़
फिर भी
खुश रही तुम
अपने जीवन में सबसे अधिक
हंसी की खनक
कुछ अधिक हुई
आँखों की चमक
कुछ अधिक चटक हुई
मन भीगा भीगा रहा
साल  भर
साथ साथ रहे जो हम

सुना है गुरुत्वाकर्षण का बल
होता है सबसे अधिक
लेकिन खींचा हमने
एक दूसरे को 

एक दूसरे के प्रति
जा कर पृथ्वी के गुरुत्व के विपरीत

और स्थापित किया - प्रेम का बल
जो  है सबसे प्रबल, सबल
विज्ञान की अवधारणा से परे.

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिलकश रचना है और मन भावन भी......इश्वर से प्रार्थना करता हूँ के आप दोनों का ये प्यार हमेशा यूँ ही बना रहे...

    नीरज

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  2. ऋतुएँ आईं
    ऋतुएँ गई भी
    हमारे लिए तो रहा
    वसंत ही
    खिले रहे पुष्प
    मन के आँगन में
    और स्थगित रहा पतझड़
    ड्योढ़ी पर ही
    साल जो गुज़र गया
    हाथ में रहा तुम्हारा हाथ
    yah vasant hamesha rahe

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  3. ........ प्रशंसनीय रचना - बधाई
    आप दोनों का ये प्यार हमेशा यूँ ही बना रहे...

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  4. सचमुच प्रबल है प्रेम का बल -सलिल भाई को आपके माध्यम से तनिक देर सी ही विवाह की वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई !

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  5. देखिये अरूण जी! आपकी कविता की प्रस्तावना को छोड़कर बाकी सब बहुत ही सुंदर है!! ईश्वर आपकी युगल जोड़ी बनाए रहे और यह प्रेम बंधन प्रगाढ़ हो यही आशीष है!
    पण्डित जी! बधाई स्वीकार की गई!! देर तनिक भी नहीं हुई है... धन्यवाद आपका!

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  6. ek dum zordaar....superb ....lekin pahli saalhirah kyun..aisi kavita to har saalgirah par aani chahiye..

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  7. बधाई हो ,अगली सालगिरह की अगली कविता का इंतेज़ार रहेगा
    बहुत सुंदर कविता !

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  8. बहुत खूब क्या लिखे हैं महाराज एकदम झमझमौआ रचना है । शुभकामनाएं समेटिए हमारी तरफ़ से

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  9. अरे वाह! कमाल कर दिया अरुण जी…………इसका मतलब आप तो हमेशा ही दूरदृष्टि रखते हैं और कविता मे ऐसे उतारते हैं कि पढने वाला कायल हुये बिना न रहे……………सलिल जी को वैवाहिक वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई और एक बधाई और कि उनकी वजह से हमे आपकी इतनी सुन्दर कविता पढने को मिल गयी।

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  10. प्रेम- रस का रसायन और ढाई का आंकड़ा.

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  11. और स्थापित किया - प्रेम का बल
    जो है सबसे प्रबल, सबल
    विज्ञान की अवधारणा से परे.
    :) सुंदर अभिव्यक्ति...... सलिल जी को हार्दिक बधाई.....

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  12. पहला साल तो कविता में दिख रहा है बाकी बाद के बारें में क्या रहा बाबुजी

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  13. सुना है गुरुत्वाकर्षण का बल
    होता है सबसे अधिक
    लेकिन खींचा हमने
    एक दूसरे को
    एक दूसरे के प्रति
    जा कर पृथ्वी के गुरुत्व के विपरीत

    और स्थापित किया - प्रेम का बल
    जो है सबसे प्रबल, सबल
    विज्ञान की अवधारणा से परे.

    प्रेम ने विज्ञान के विपरीत जाकर अपनी पहचान बनाई.
    कमाल की सोंच.बधाई

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  14. ऐसे यूँ रहते रहते,
    हम 12 वर्ष बिता बैठे हैं।

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  15. सलिल वर्मा जी (चलाबिहारी ब्लॉगर )ko sadi ki saal girh mubarak,
    धरती अपने अक्ष पर
    घूमती रही अपनी गति से
    हमें लगी बहुत तेज़
    फिर भी
    हमारी सम्मिलित कल्पनाओं से
    अधिक नहीं !..........
    sunder kavita , abhaar

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  16. jee han yehi hoti hai kavita-sadhi aur sugathit.Arun jee meri drishti me appki sarvottam rachna.

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  17. बहुत खूबसूरत रचना ....आपके माध्यम से सलिल जी की शादी की वर्षगांठ पर शुभकामनायें

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  18. ऋतुएँ आईं
    ऋतुएँ गई भी
    हमारे लिए तो रहा
    वसंत ही

    बहुत ही ख़ूबसूरत और प्यारी सी रचना
    सलिल जी को वैवाहिक वर्षगाँठ की हार्दिक बधाई

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  19. ठीक है
    चाँद नहीं ला पाया मैं
    धरती पर
    तुम्हारे लिए
    तारे भी नहीं लाया तोड़
    फिर भी
    खुश रही तुम
    अपने जीवन में सबसे अधिक
    हंसी की खनक
    कुछ अधिक हुई
    आँखों की चमक
    .....बहुत भावभीनी प्रस्तुति..प्रेम रस से सराबोर बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  20. बहुत ही लाजवाब रचना है ... सच है कभी कभी ओरेम में समय का एहसास ख़त्म हो जाता है ... सलिल जी को शादी की वर्षगाँठ की बधाई ...

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  21. ठीक है
    चाँद नहीं ला पाया मैं
    धरती पर
    तुम्हारे लिए
    तारे भी नहीं लाया तोड़
    फिर भी
    खुश रही तुम..
    बहुत ही लाजवाब रचना है ...

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  22. ईश्वर यह vasant chirasthaayi करें....

    bahut ही भावुक mohak premodgaar....

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  23. प्रिय बंधुवर अरुण रॉय जी
    अभिवादन !

    आपकी इस पोस्ट पर कमेंट 19 या 20 को लिखा भी था, पता नहीं किसी नेट समस्या के चलते पब्लिश नहीं हुआ, फिर विस्मृत ही हो गया …
    ख़ैर !
    सर्वप्रथम सलिल जी को बहुत बहुत बधाइयां !

    रचना हमेशा ही अच्छी होती है आपकी , आज भी !
    खींचा हमने
    एक दूसरे को
    एक दूसरे के प्रति
    जा कर पृथ्वी के गुरुत्व के विपरीत
    और स्थापित किया - प्रेम का बल


    प्रवाह के विपरीत आप जैसे जीवट वाले ही प्रतिमान स्थापित करते हैं … :)
    पुनः श्रेष्ठ रचना के लिए हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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