सोमवार, 24 जनवरी 2011

होना ही था


१. 

होना ही था
जंगलों को तबाह 
देने के लिए रास्ता 
सडको को /राजमार्गों को 
अलग बात है यह 
पगडण्डी नहीं मांगती बलिदान 
बिठाती है सामंजस्य . 


२. 

होना ही था 
खेतों से विस्थापन किसानो का 
देने के लिए कारपोरेट किसानी को स्थान 
सोचने की बात है यह 
कैसे कर लेता है आत्महत्या 
हर दिन जूझने वाला किसान 


३.

होना ही था 
अपनों के बीच 'स्पेस' की मांग 
अपने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के लिए 
आज महत्वपूर्ण है यह 
निजता भारी  पड़  रही है
अपनेपन  पर 


४.

होना ही था 
तुम ले लोगी अलग रास्ता 
एक मोड़ पर आकर
क्योंकि तुम्हे नहीं दिखता 
रौशनी के बीच का अँधेरा 
मुझे  अच्छी लगती है
अँधेरे की रौशनी

26 टिप्‍पणियां:

  1. होना ही था ...सार्थक चिंतन ...

    निजता भरी पड़ रहा है..... इसमें शायद "भारी " आना चाहिए था ...

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  2. अंधेरा भी खुली आंखों से, खुली आंखों को दिखता है.

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  3. गहरा चिन्तन सुन्दर रचनायेण। बधाई।

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  4. हर पंक्ति बेहतरीन ... विकास की कीमत चुकाते पेड़ ,रिश्ते ,खेत

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  5. waaah..... lekin ye sab kuch jo hua hai kya anawashyak nahi hai... ye sab jab nahi tha..jeevan tab bhi to sukhmay tha... behad khubsurat rachna hai arun sir...man men kai sawal paida karne wali....

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  6. होना ही था
    तुम ले लोगी अलग रास्ता
    एक मोड़ पर आकर
    क्योंकि तुम्हे नहीं दिखता
    रौशनी के बीच का अँधेरा
    मुझे अच्छी लगती है
    अँधेरे की रौशनी

    गहन चिंतन..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

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  7. अच्छी प्रस्तुती. बेहतरीन विश्लेषण. यही प्रगति है ???

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  8. अलग बात है यह
    पगडण्डी नहीं मांगती बलिदान
    बिठाती है सामंजस्य ...

    चारों बहुत ही शशक्त ... प्रभावी तरीके से अपनी बात दर्ज कराते हुवे ...

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  9. क्योंकि तुम्हे नहीं दिखता
    रौशनी के बीच का अँधेरा
    मुझे अच्छी लगती है
    अँधेरे की रौशनी...
    Bahut sachchi aur achchi behatreen rachna...

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  10. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  11. सार्थक चिंतन की समेटे हैं रचनाएँ..... बहुत सुंदर

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  12. पगडंडियाँ विनाश नहीं करती हैं, विकास की पगडंडियाँ।

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  13. bilkul alag dhang alag andaj aur content ki tajgi se bhari kavita jise padhne ka dil/man kata hai badhai brother

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  14. बहुत अच्छा लगा .............बिलकुल अलग सोच

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  15. सोचने की बात है यह
    कैसे कर लेता है आत्महत्या
    हर दिन जूझने वाला किसान

    सही सवाल उठाया है आपने.
    सभी कवितायें सुन्दरं हैं.

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  16. आज की परिस्थिति मे जो कुछ भी घटित हो जाय चौंकने/चौंकाने वाली बात नही होती। बुदबुदा कर रह जाते हैं…… "यह तो होना ही था"। सुंदर अभिव्यक्ति।

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  17. क्या लिखते हैं आप...
    सच बहुत ही सार्थक सोच है...
    खूब सुन्दर...

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  18. अलग बात है यह
    पगडण्डी नहीं मांगती बलिदान
    बिठाती है सामंजस्य .

    सारी क्षणिकाएं बहुत ही प्रभावकारी हैं..

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  19. होना ही था
    तुम ले लोगी अलग रास्ता
    एक मोड़ पर आकर
    क्योंकि तुम्हे नहीं दिखता
    रौशनी के बीच का अँधेरा
    मुझे अच्छी लगती है
    अँधेरे की रौशनी gahan bhav...andhere ki roshani...shashakt ehsas...

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  20. सारी क्षणिकाएं बहुत ही प्रभावकारी हैं.
    बहुत पसन्द आया

    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  21. pehli kshanikaa kaa kad baaki kshanikaon se kaafi badaa hai sir....

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