शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

बाबूजी खेत नहीं जाते



इधर कुछ दिनों से
बाबूजी को
लहलहाते  खेत
अच्छे नहीं लगते
डर लगता है उन्हें
पकी हुई  फसल देख
अचानक से रोने लगते हैं
दहाड़े मार मार
हो गया हो मानो
पुत्रशोक


बहुत संभालना पड़ता है उन्हें
पूछने पर बताते हैं कि
चाहते हैं वे
गेहूं कटने से पहले
आग लगा दें
लहलहाते खेतों में
या ओले पड़ जाएँ
प्राकृतिक आपदा आ जाये

बडबडाते हैं
खुद से बाते करते हैं
खुद को अभिमन्यु कहते हैं
जिसके लिए  चक्रव्यूह से बाहर निकलना
असंभव सा है
और समझ नहीं आती
किसी को भी
उनकी बातें


नहीं चाहते
फसल काटने के बाद
गिड़गिडायें
पान चबाते बिचौलियों के सामने
या फिर सरकार की ओर से नियुक्त
मोटे पेट और चश्मा लगाये अधिकारियों के सामने
टेक दें घुटने


हाल में बने
काले काले  बड़े और ऊँचे गोदाम 
कहते हैं शीतघर जिसे,
बाबूजी डरते हैं
उसकी परछाई से
दैत्य सा लगता है वह
जोर जोर से चिल्लाते हैं
शीतघर के दरवाजे पर खड़े हो
कालाबाजार का घर कहते हैं उसे
जला देना चाहते हैं  उस शीतघर को

कुछ लोग कहते हैं
बूढ़े और पागल हो गए हैं
कुछ लोग कहते हैं
आत्महत्या कर लेनी चाहिए उन्हें
गाँव से भगा देना चाहते हैं कुछ लोग


जिन खेतो की मेडों  पर
बचपन और जवानी   के पैरों के निशान हैं
आज उन्ही खेतो में
नहीं जाते हैं बाबूजी

(किस वैशाखी की शुभकामनाएं दे हम बाबूजी को)

23 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण जी कुछ नहीं कह पा रहा हूं इस सशक्त अभिव्यक्ति पर।

    बाबूजी के बहाने आपने जो दरिद्रता, फटेहाली और उसके लिए जिम्मेदार तंत्र की सच्चाई को जिन शब्दों में सामने रखा है उस पर कोई टिप्पणी करने से ज़्यादा उचित ये चार पंक्तियां समर्पित करना समझता हूं ...

    महाकाव्य लिख डालो इतना पतन दिखाई देता है।
    घोर गरीबी में जकड़ा ये वतन दिखाई देता है।
    जनता की आशाओं पर इक कफन दिखाई देता है।
    उजड़ा उजड़ा सच कहता हूँ चमन दिखाई देता है।

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  2. यह वही लिख पायेगा जो जमीन से जुड़ा रहा हो.....
    शुभकामनायें अरुण ...

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  3. दर्द की इन्तिहा --
    तंत्र का दोष |
    बाबू जी --
    कैसे रहे होश |

    शीत - घरों के बोरों की रखवाली चूहों का अधिकार |
    भले - राम की नैया खेवें, टुंडे - मुंडे बिन पतवार ||

    तिलचट्टों ने तेल कुओं पर, अपनी कुत्सित नजर गढ़ाई |
    तो रक्त-कोष की पहरेदारी, नर-पिशाच के जिम्मे आई |

    http://rhytooraz.blogspot.in/

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  4. babuji ki halat samajh aati hai..aaj kamobesh har kisan ki ye yantrana hai...behad khoobsurat shabdon me ujagar kiya aapne is vyatha ko.

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  5. भ्रष्टतंत्र की इंतेहा दर्शाती एक सशक्त अभिव्यक्ति अन्दर तक झिंझोडती है।

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  6. अपना खून-पसीना बहा कर उपजाई फसल को बिचौलियों और काला बाजारियों के चंगुल में फंसते देख..कौन ना आपा खो बैठे
    बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति

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  7. बाबूजी को प्रणाम!!जिस पीढ़ी के अम्मा-बाबू बच्चे को डिब्बे का दूध पिलाते हों और आया या शीतल कमरे वाले क्रेश में दिन भर छोड़ जाते हों.. उन्हें कैसे समझ में आएगा दर्द सुदर्शन जी के इस वाक्य का कि किसान को अपना लहलहाता खेत देख क्या आनंद आता है..
    ऐसे में अपनी औलाद को "बेच खाने" का गम मनाने वाले को दुनिया पागल ही समझेगी..!! संवेदना की पराकाष्ठा अरुण बाबू! हमेशा की तरह!!

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  8. कुछ लोग कहते हैं
    बूढ़े और पागल हो गए हैं
    अपने दर्द को व्यक्त करना शायद पागलपन ही है इस समाज में.

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  9. बेहद सार्थक और सशक्त लेखन.............

    सच है!! काहे का चैत्र काहे का वैशाख........

    सादर.

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  10. सुंदर , सशक्त रचना ..... हार्दिक शुभकामनायें

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  11. पूरी की पूरी व्यवस्था पर चोट करती कविता।

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  12. जिन खेतो की मेडों पर
    बचपन और जवानी के पैरों के निशान हैं
    आज उन्ही खेतो में
    नहीं जाते हैं बाबूजी bahut bhawpoorn aur man ko chooti hui......

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  13. अपनी मेहनत के लुटने की आशंका से उपजे दर्द की बोहतरीन अभिव्यक्ति । बाबूजी .............

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  14. LOVED THE SOUL OF THIS POEM , BUT ONE THING, I COULD NOT SEE ANY RELATION BETWEEN "GEHOON " AND COLD STORES. MAY BE YOU MUST BE TALKING ABOUT POTATO.

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  15. बाबू जी के दर्द को उकेर दिया है आपने एक एक पंक्ति में अरुण जी ... समय की त्रासदी कैसे मजबूरी को सामने लाती है ...
    बहुत ही संवेदित करती है ये रचना ...

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    1. .बहुत सुन्दर भावार्थ इन पक्तियों में छिपा हुआ है!बहुत प्यारी रचना.बहुत ही संवेदित रचना ...

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  16. हृदयस्पर्शी सशक्त रचना अरुण जी

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