शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कलाई घडी


कलाई पर
बंधा है
समय
मारता  है
पीठ पर चाबुक
और दौड़ पड़ता हूँ मैं
घोड़े की तरह
आगे
और आगे
अंतहीन
घडी मुस्कुराती है
कलाई पर बंधी बंधी
मुझे हाँफते देख

22 टिप्‍पणियां:

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  2. हम सभी घड़ी के चाबुक के आगे बेबस हैं और इसी तरह दौड़ते रहते हैं... हाँफते हाँफते.
    ************

    प्यार एक सफ़र है, और सफ़र चलता रहता है...


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  3. कभी कभी लगता है , सब कुछ छोड़ कर कहीं दूर चले जाएँ जहाँ हांफना न पड़े !

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  4. घडी मुस्कुराती है
    कलाई पर बंधी बंधी
    मुझे हाँफते देख

    सटीक

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  5. घडी मुस्कुराती है
    कलाई पर बंधी बंधी
    मुझे हाँफते देख
    बहुत सही कहा है आपने इन पंक्तियों में ...

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  6. घड़ी जीवन भर दौड़ाये रहती है, हमने तो पहनना ही छोड़ दिया है।

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  7. समय हमेशा अपने गति चलता रहता,,,उसके आगे हम बेबस है,,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  9. थोड़ा कहा बहुत समझना - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

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  10. बढ़िया रचना है :कलाई पर
    बंधा है
    समय
    मारता है
    पीठ पर चाबुक
    और दौड़ पड़ता हूँ मैं
    घोड़े की तरह
    आगे
    और आगे
    अंतहीन
    घडी मुस्कुराती है
    कलाई पर बंधी बंधी
    मुझे हाँफते देख

    समय सवारी करता मेरी ,मैं हूँ एक मुसाफिर यारों ,समय चक्र से बंधा हुआ हूँ .
    ram ram bhai
    शनिवार, 22 सितम्बर 2012
    असम्भाव्य ही है स्टे -टीन्स(Statins) से खून के थक्कों को मुल्तवी रख पाना

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  11. बढ़िया रचना है :कलाई पर
    बंधा है
    समय
    मारता है
    पीठ पर चाबुक
    और दौड़ पड़ता हूँ मैं
    घोड़े की तरह
    आगे
    और आगे
    अंतहीन
    घडी मुस्कुराती है
    कलाई पर बंधी बंधी
    मुझे हाँफते देख

    समय सवारी करता मेरी ,मैं हूँ एक मुसाफिर यारों ,समय चक्र से बंधा हुआ हूँ .
    ram ram bhai
    शनिवार, 22 सितम्बर 2012
    असम्भाव्य ही है स्टे -टीन्स(Statins) से खून के थक्कों को मुल्तवी रख पाना

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  12. मैं तो कलाई पर घड़ी बांधता ही नहीं.. धडकनों की टिक-टिक के साथ दोस्ती कर ली है.. देखें कब कहती हैं ये आकर मुझसे कि चल अब समय हो गया है तेरा!!

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  13. समय बहुत बलवान है. सुंदर कविता.

    बधाई.

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  14. अंतहीन घड़ियों में खत्म होता समय ... हाथ की घडियां के हिसाब से ...
    बहुत खूब ...

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  15. समय की चाबुक की मार से ही तो सब बेहाल हैं..
    सुन्दर कविता

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  16. कलाई पे घड़ी भी समय का ही एक अनमोल उपहार है...जो हर वक़्त चलते रहने का एहसास दिलाता रहता है...अपने 'होने' का एहसास...~सुंदर रचना !
    ~सादर !!!

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  17. घड़ी मुस्कुराती है .. इसलिए कि समय के आगे कौन भाग पाया है और समय के पीछे भागने वाला कब टिक पाया है?

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  18. सच है जानते हैं समझते हैं..फिर भी कुछ कर नहीं पाते..घड़ी की चाबुक में दौड़ते ही रहते हैं हम।

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  19. घोडे़ की तरह दौड़ते हैं
    इसलिये हाँफ जाते हैं
    हमारी तरह दौड़ के देखो
    गधे कभी नहीं हाँफते हैं
    दौड़ते चले जाते हैं
    भूल जाते हैं हाँफने की बात !

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  20. मतलब कलाई पर बंधी घड़ी पर भी आप इतनी गहरी बात कह सकते हैं और वो भी मात्र एक पंक्ति में...वाह!!!!! :)

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