मंगलवार, 3 सितंबर 2013

गरम चाय




उसके पास है
एक केतली
केतली के नीचे
एक अंगीठी

जैसे ऊपर है
उसकी  कृशकाय  देह
अन्दर  है
भूख की आग से तपती 
पेट की अंगीठी

उसकी पैंट में पीछे
खुंसे होते  है
प्लास्टिक के कप  गिनती के
जबकि गिनती
नहीं आती है उसे

5 रूपये की चाय में
50 पैसे पुलिस के 
50 पैसे नगर निगम की कमेटी  के 
50 पैसे लोकल गुंडे के 
तीन रूपये पचास पैसे ठेकेदार के 
जो देता है उसे
केतली, चाय, अंगीठी


जब तक गरम रहेगी
पेट की आग
पिलाएगा कोई न कोई
गरम चाय
गाँव के नुक्कड़ से लेकर
इण्डिया गेट तक

16 टिप्‍पणियां:

  1. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ...पूरी रचना बहुत ही खूब कुछ भी छोड़ दूं तो नाइंसाफी होगी.
    .....अद्भुत रचना अरुन जी !

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. कमाल का शब्दचित्र खींचते हो भाई ..
    बधाई !

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  4. पाँच रुपए की चाय में उसके लिए नहीं बचा कुछ भी ...सटीक शब्द चित्र ।

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    1. वाकई नहीं बचता है उसके लिए कुछ।

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  5. आपकी रचनाओं में पहले शब्द से ही एक केनवस तैयार होने लगता है ओर अंत आते आते पुरी कहानी ज़िंदा इंसानों की छप जाती है ...
    गहरी संवेदना लिए ... लाजवाब रचना ...

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  6. किसको मै अच्छा कहूँ ? हर पंक्ति दिल में उतर गयी ,बहुत उम्दा रचना।
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  7. पापी पेट का सवाल है .....अब क्या कहे इसे कि वो भी आधा अधूरा भरता है

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  8. बहुत सुन्दर...गज़ब का चित्रण किया है आपने कविता में!

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  9. पेट की आग है जब तक गर्म चाय मिलती रहेगी तब तक !
    सरोकार वाजिब है !

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  10. गरम करने वाले कारक कम, ठण्डे करने वाले अधिक।

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  11. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।।।

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  12. जब तक गरम रहेगी
    पेट की आग
    पिलाएगा कोई न कोई
    गरम चाय
    गाँव के नुक्कड़ से लेकर
    इण्डिया गेट तक

    ...बहुत मर्मस्पर्शी रचना...

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  13. bechara chai bantte hi rah jaiga
    aur kuchh nahi milna usko !!

    kisi bhi chhoti si baaton ko kavita me rach dena koi aapse seekhe ....

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