सोमवार, 27 नवंबर 2017

भाषाई सौहार्द





प्रकृति की अनुगूंज से 
नदियों की धारा
सागर की लहरों
पक्षियों से कलरव से
निकली जो दिव्य ध्वनियाँ 
सैकड़ो वर्षों तक 
सभ्यता की कंदराओं में 
किया विश्राम 
गढ़े  शब्द 
मानव की जिह्वा से 
गुज़रते हुए पाए अर्थ 
यही बने मानव के उदगार के माध्यम
कहलाये भाषा 


समय के सागर की लहरों के साथ 
तैरते हुए शब्दों ने की 
अनंत यात्राएं 
सभ्यता के सभी कालखंडो के साथ 
ये समृद्ध हुई 
संस्कृति की अंग बनी 
मानव की उदगार बनी 
मनोभावों के सम्प्रेषण का माध्यम बनी 

जो शब्द 
संस्कृति की यात्रा के साथ नहीं चले 
शब्दकोष की शोभा बने 
और कालांतर में समाप्त हो गए 

शब्द
जिन्होंने भूगोल की सीमाओं को 
धवस्त किया 
वे विश्व की भाषाएँ बनी 
विश्व की वाणी बनी 
ज्ञान की सेतु बनी 
जिन्होंने भाषाओँ पर लगाए पहरे
भाषाएँ वहीँ समाप्त हो गई
मृतप्राय हो गई

भाषाएँ बनी कभी तलवार तो 
कभी बनी योद्धाओं की हुंकार
कभी बनी  ज्ञान का भण्डार 
कभी संप्रेषित किया संचित ज्ञान 
तो कभी किया नृपों को सावधान 

भाषाएँ जब एक हुई 
बन गई स्वतंत्रता का स्वर 
भाषाएँ जब एक हुई 
देश हुआ एक
एक हुई जन्शंक्ति
अलग अलग भाषाएँ 
हैं जैसे उंगलियाँ 
एक साथ जब आती है 
बन जाती है मुट्ठी  
बन जाती है शक्ति ! 


3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-11-2017) को "मन वृद्ध नहीं होता" (चर्चा अंक-2801) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आप सभी सुधीजनों को "एकलव्य" का प्रणाम व अभिनन्दन। आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार(दिनांक ०३ दिसंबर २०१७ ) तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com
    हमारा प्रयास आपको एक उचित मंच उपलब्ध कराना !
    तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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