मंगलवार, 28 नवंबर 2017

अँधेरा है जीवन


जीवन 
अँधेरा ही तो है 
अँधेरा न हो तो 
क्या है रात का अस्तित्व 
पर्वतों की गुफाओं से लेकर 
पृथ्वी के गर्भ तक 
नदियों के उद्गम से लेकर 
समुद्र की तलहटी तक 
पसरा हुआ है 
अँधेरा ही अँधेरा 

जैसे हर रात के बाद 
दिन का होना तय है 
तय है 
दिन के बाद रात भी 
उजाले के बाद अँधेरा भी 

अँधेरा न हो तो 
कहाँ पता चलता है 
उजाले का प्रतिमान 
रौशनी का अस्तित्व ही है 
अँधेरे से 

बीज को पनपने के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
आँखों की नींद के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
गर्भ के भीतर भी है 
गहन अन्धकार है 
हर परछाई का रंग 
होता है अँधेरा 

अँधेरा जीवन का ही 
एक नितांत अनिवार्य पहलू है 
मेरे जीवन में स्वागत है तुम्हारा 
हे अन्धकार ! 

4 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ उजाले होंगे वहां अँधेरे भी मिलते ही हैं
    अलग अनुभव करता है उजाला और अँधेरा
    बहुत सुन्दर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (29-11-2017) को "कहलाना प्रणवीर" (चर्चा अंक-2802) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आप सभी सुधीजनों को "एकलव्य" का प्रणाम व अभिनन्दन। आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार(दिनांक ०३ दिसंबर २०१७ ) तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com
    हमारा प्रयास आपको एक उचित मंच उपलब्ध कराना !
    तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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