शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

बच्चे जो मर जाते हैं


अमेरिकी  अश्वेत कवि लैंग्स्टन ह्यूज की कविता "किड्स हु डाई" का अनुवाद 

 बच्चे जो मर जाते हैं 


यह मर जाने वाले बच्चों के लिए है
जो हो सकते हैं किसी भी जाति, धर्म या रंग के,
उन बच्चों के लिए जो 
निश्चित तौर पर मर जायेंगे 
कुलीन और अमीर लोग रहेंगे जीवित 
हमेशा की भांति 
चूसते हुए शोणित, खाते हुए सोना-चांदी
बच्चो को मरणासन्न छोड़ कर ।

बच्चे मिसिसिपी के खेतों में मर रहे होंगे 
जब उनके माता पिता बटाई पर कर रहे होंगे खेती 
बच्चे शिकागो की गलियों में मर रहे होंगे 
जब उनके माता पिता कर रहे होंगे मजदूरी 
कलिफ़ोर्निया के संतरा के बागानों में भी मर रहे होगे बच्चे 
चुनते हुए संतरा 
गोरे और फिलिपिनो,
नीग्रो और मैक्सिकन,
हर रंग, धर्म के बच्चे मारे जायेंगे 
वे बच्चे जो नहीं जानते हैं अभी 
क्या होता है झूठ, कैसे ली जाती है रिश्वत, लालच 
और छद्म शांति ।

बुद्धिजीवी और ज्ञानी 
जो लिखते हैं अखबारों के सम्पादकीय 
जिन महान लोगों के नामों के पहले लगा होता है "डॉ." 
किसी भी जाति, धर्म के 
जो करते हैं सर्वेक्षण , लिखते हैं किताबें
जो शब्दों का चक्रब्यूह रचते हैं मरने वाले बच्चों की हत्या के लिये 
और सुस्त न्यायलय, रिश्वतखोर पुलिस
और रक्तपिपासु सेना, 
धनाढ्य साधू-संत और धर्मप्रचारक 
सब खड़े मिलेंगे एक पक्ष में मरे हुए बच्चों के विरुद्ध 
कानून के अनुच्छेदों, बन्दूक के छर्रों की सहायता से हराते हुए 
डराते हुए

मरने वाले बच्चे  होते हैं 
जैसे आदमी के रक्त में लौह-तत्व 
और ये कुलीन और अमीर लोग नहीं चाहते 
लोगों के जिह्वा पर चढ़े मरने वाले बच्चों के खून का लौह-तत्व  
क्योंकि वे नहीं चाहते लोगों को हो जाए उनके भीतर की ताकत का एहसास 
एंजेलो हेरंडन की बातों पर हो विश्वास या फिर वे हो जाएँ एकजुट 

सुनो मरने वाले बच्चों 
तुम्हारे लिए नहीं बनेगा  कोई स्मारक 
अलग बात है कि बसे रहोगे तुम हमारे हृदयों में 
हो सकता है तुम्हारा मृत शरीर फेंक दिया जाय किसी  दलदल में 
या किसी जेल के कब्र में या  किसी खेत में दफना दिया जाए 
या बहा दिया जाय किसी नदी में 
किन्तु आएगा ऐसा दिन 
जब हजारों कदम एक साथ उठ पड़ेंगी 
और तुम्हारे हक में आवाज़ उठाएंगी
तुम्हारे लिए प्रेम, ख़ुशी और आनंद का स्मारक बनायेंगी 
जब विभिन्न जातियों और धर्म के हाथ एक साथ मुट्ठियों में बदल जायेंगी 
और मरे हुए बच्चो के बहाने 
उनके गीत क्षितिज पर छा जायेंगे 
वह गीत विजय का होगा, वह गीत विजय का होगा . 

5 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 11/01/2019 की बुलेटिन, " ५३ वर्षों बाद भी रहस्यों में घिरी लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. अगर इस मार्मिक कविता में मिसीसिपी, शिकागो और कैलिफ़ोर्निया में मरन वाले बच्चों की जगह दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद में मरने वाले बच्चों का ज़िक्र होता तो यह भारत के बच्चों की तस्वीर होती. शोषण, दमन और ग़रीबी का न तो कोई धर्म होता है, न उनकी राष्ट्रीयता होई है, न उनका रंग होता है, और तो और उनका कोई काल भी नहीं होता, ये आदि काल से चले आ रहे हैं और अनंत काल तक चलते रहेंगे.

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    1. गोपाल जी यह मूल कविता का अनुवाद है और यह कविता अस्सी साल पहले अमेरिका में लिखी गई थी। आपने दिल्ली, मुंबई अहमदाबाद समझ लिया इसका अर्थ है कि कविता और अनुवाद अपनी कसौटी पर खड़ी उतरी है। कविता में स्थान घटनाएं केवल प्रतीक होती है। ध्यानपूर्वक पढ़ने और टिप्पणी के लिए धन्यवाद और आभार।

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  3. हृदय स्पर्शी बिंबों के सहारे शोषित बाल्यावस्था का इतना सटीक चित्रण दिल दहलाता सा पर यथार्थ,, ये रोज मरने जैसा ही है आशा का मरना बचपन का मरना जीने के लिये मरना । अप्रतिम।

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