बुधवार, 19 जुलाई 2023

ग़ज़ल 1


ये दुनिया गोल है प्यारे 

तेरा भी मोल है प्यारे 


बिकेगा सब यहां देखो 

तेरा भी तोल है प्यारे


भिंची हैं मुट्ठियां मेरी

अंगारा बोल है प्यारे 


बिठाए पहरे होठों पर 

खुली जो पोल है प्यारे 


मिलाता क्यों नहीं नजरें

कहीं कुछ झोल है प्यारे


रंगों में बंट गई धरती

ये क्या भूगोल है प्यारे


ये जो आंचल है माता का

बड़ा अनमोल है प्यारे

शुक्रवार, 16 जून 2023

सब ठीक है

बहुत दिनों बाद मिले
बीज बेचने वाले बाबा
पूछा कि कैसे रहे पिछले दिन
उन्होंने कहा सब ठीक है,
लेकिन कहां है सब ठीक?

पेड़ के नीचे बैठ कर
पुराने कपड़ों को ठीक करने वाले बाबा
बहुत दिनों बाद दिखे
थके हुए कदम और उदासी आंखों में भर कर
वे उसी पेड़ के नीचे खाली बैठे मिले।
पूछने पर बताया कि
वे भी ठीक है,
लेकिन कहां है सब ठीक?

वो चौंक पर बैठता है एक चाभी बनाने वाला
वह भी कहां दिखाई दिया साल भर से
उसका बोर्ड अब भी टंगा था
फोन मिलाया तो उसने भी कहा
सब ठीक है
लेकिन कहां है सब ठीक?

ऐसे ही ज़िन्दगी के आसपास
रोज़ दिखने वाले जब नहीं दिख रहे
या कमजोर या उदास दिख रहे हैं
फिर भी कह रहे हैं सब ठीक है
तो मत समझिए कि सब ठीक है।

हां
जब सब ठीक नहीं है
तब भी सब ठीक कहना
और कुछ नहीं बल्कि है
आदमी के भीतर बसी
जिजीविषा और आशा
यही उसे खड़ा करता है
हर बार गिरने पर
संबल देता है
लड़खड़ाने पर।

ठीक है कि अभी
सब ठीक नहीं लेकिन
कल होगा सब ठीक ।

मंगलवार, 23 मई 2023

घुटने का दर्द


ऐसा कौन है 

जिसके घुटने में नहीं है दर्द 

जिसे नहीं हो रही कठिनाई 

सीढ़ियाँ चढ़ने या उतरने में 

फिर भी क्या कभी सुना कि

किसी ने पूछा हो 

आपके घुटने का हाल 

या बताया हो 

अपने ही घुटने का हाल । 


दरअसल जो जरूरी है 

वह हो नहीं रहा दुनियाँ में 

और गैर जरूरी संवादों से भरी दुनिया 

होती जा रही है संवाद और संवेदना हीन । 


घंटों मोबाइल या लैपटॉप या कंप्यूटर की सकीं से 

बुझी आँखों के पीछे जो दर्द होता है 

घुटनों का , रीढ़ की हड्डी का या ढीली पड़ती पकड़ का 

उसका जिक्र कहाँ करना चाहता है कोई 

और करे भी कैसे जब कोई सुनना ही नहीं चाहता ।  


थक रहे कदमों, बुझ रही आँखों 

और आँगन के सूनेपन की अभिव्यक्ति के लिए 

नहीं बन सकता पंद्रह बीस सेकेंड का कोई रील । 

मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

शेष

 पिता अब नहीं हैं 

नहीं है मां भी अब

ऐसा तो कह नहीं सकते

क्योंकि वे हैं अब

अपनी वसीयतों में

दस्तावेजों में। 


शायद रह जाता है

यही शेष

दस्तावेज

मैं रहना चाहूंगा शेष

अपनी कविताओं में। 

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

मसखरे के हाथों में दे दो सत्ता की बागडोर


मुझे लगता था कि 

मेरे पास है समाधान

दुनियां भर की  समस्याओं का 

कि अगर  मैं किसी देश के राष्ट्रपति से मिल  लूं 

तो रोक लूंगा उसे अपने पड़ोसी राष्ट्र पर बम गिराने से । 


मुझे लगता था कि

यदि कभी किसी दंगाई से मिला तो

उसकी तलवार के नोक पर 

रख दूंगा एक गुलाब का फूल

और कहूंगा कि किसी को मारने से पहले देख ले अपनी जेब में रखी बेटी की तस्वीर एक बार 

मुझे यकीं था कि वह दंगाई नहीं रहेगा फिर । 


मुझे यह भी लगता था कि

देश की वित्तमंत्री तक यदि पहुंच जाऊं मैं

तो समझा लूंगा उन्हें कि

सीमा पर तोप से कहीं अधिक जरूरी हैं

मेरे गांव के स्कूल में शिक्षक, पंचायत में अस्पताल 

और वे थपथपा कर मेरी पीठ मान जायेंगे मेरी बात। 


कितना गलत था मैं

जब मेरी कोशिशों के सब बीज खोखले निकले

अंकुरित नहीं कर पाया एक भी  पौधा प्रेम और विश्वास का

भरोसे की कलम सूख गई नमी की कमी के कारण और 

अपनी तमाम कोशिशों के लिए कहलाया मैं मसखरा  । 


फिर कहूंगा, चाहे कोई सुने न सुने

मसखरों की बातें जो सुनती दुनियां

सीमाओं पर बाड़ नहीं होते

हाथों में हथियार नहीं होते

गुलाब की खेती होती

तलवारों की जगह हाथों में होते कलम

बस एक दिन किसी मसखरे के हाथों में दे दो दुनियाँ की बागडोर।