मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

रिशेप्शनिस्ट


वर्षो से
सैकडों फोन
रोज सुनती है वो
लेकिन नही आया
वो एक फोन
जिसका इंतज़ार था उसे .


टेलीफोन के पैड पर
थिरकतीं हैं उसकी उंगलियाँ ऐसे
जैसे थिरका था उसका पांव
पहला प्यार होने पर .


दफ्तर के पीछे वाली खिड़की पर
रहने वाली गौरैया
बहुत खुश थी आज
उसने जाने थे अंडे
पहली बार इर्ष्या की आग में
जली थी वो .

5 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर रचना बधाई

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  2. nari man ko bahut gahare se jana hai. bahut sunder likha hai . badhai

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  3. itna achcha likhte hai. ab tak to kai books likh li hongi. starting ka photo bahut impresive hai

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  4. anamika ji abhi to likhna shuru kiya hai ! aap logon ke taareef yon hi milti rahegi to aur bhi likhunga ... kitabein bhi aayengi !

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  5. यार, आपने बहुत सादा शब्दों में गहरी बात कह दी। पहला हिस्सा पढ़कर मुझे सच में उस एक फोन का इंतज़ार महसूस हुआ। रोज सैकड़ों कॉल सुनना और फिर भी खाली रह जाना, ये दर्द आपने साफ दिखाया। दूसरे हिस्से में उंगलियों का थिरकना और पहले प्यार की याद जोड़कर आपने भावना और भी जीवंत कर दी। तीसरे हिस्से में गौरैया और अंडों वाली बात ने तो चुभन पैदा कर दी।

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