सोमवार, 25 अप्रैल 2011

माँ तुम्हारा चूल्हा


माँ
बंद होने वाला है
तुम्हारा चूल्हा
जिसमे झोंक कर
पेड़ की सूखी डालियाँ
पकाती हो तुम खाना
कहा जा रहा है
तुम्हारा चूल्हा नहीं है
पर्यावरण के अनुकूल

माँ
मुझे याद है
बीन लाती थी तुम
जंगलों, बगीचों से
गिरे हुए पत्ते
सूखी टहनियां 
जलावन के लिए
नहीं था तुम्हारे संस्कार में
तोडना हरी पत्तियाँ
जब भी टूटती थी
कोई हरी पत्ती
तुम्हे उसमे दिखता था
मेरा मुरझाया चेहरा
जबकि
कहा जा रहा है
तुम्हारे संस्कार नहीं हैं
पर्यावरण के अनुकूल
तुम्हारा चूल्हा
प्रदूषित कर रहा है
तीसरी दुनिया को

पहली और
दूसरी दुनिया के लोग
एक जुट हो रहे हैं
हो रहे हैं बड़े बड़े सम्मेलन
तुम्हारे चूल्हे पर
तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर
हो रहे हैं तरह तरह के शोध
मापे जा रहे हैं
कार्बन के निशान
तुम्हारे घर आँगन की
हवाओं में

वातानुकूलित कक्षों में
हो रही है जोरदार बहसे

कहा जा रहा है कि
तुम प्रदूषित कर रही हो
अपनी धरती
गर्म कर रही हो
विश्व को
और तुम्हारे चूल्हे की ओर से बोलने वाले
घिघियाते से प्रतीत होते हैं
प्रायोजित से  लग रहे  है
शोध अनुसन्धान
और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी

माँ !
मौन हैं सब
यह जानते हुए कि
जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां जलाओगी तुम,
उतना कार्बन 
एक भवन के  केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र  से
उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

वे लोग छुपा रहे हैं
तुमसे तथ्य भी
नहीं बता रहे कि
तुम्हारा चूल्हा
कार्बन न्यूट्रल है
क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में
जलावन न भी जले फिर भी
कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही
लकड़ियों से
बस उसकी गति होगी
थोड़ी कम
और तुम्हारा ईंधन तो
घरेलू है,
 उगाया जा सकता है
आयात करने की ज़रूरत नहीं

लेकिन बंद होना है
तुम्हारे चूल्हे को
तुम्हारे अपने ईंधन को
और जला दी जाएगी
तुम्हारी आत्मनिर्भरता
तुम्हारे चूल्हे के साथ ही .

माँ ! एक दिन
नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा !

53 टिप्‍पणियां:

  1. arun ji , bahut dino ke baad aa raha hoon , kshama kare.

    bas ye kahna chahunga ki aaj ki aapki is rachna ko padhne ke baad meri aankhe nam ho gayi hia .. mera naman ..

    badhayi

    मेरी नयी कविता " परायो के घर " पर आप का स्वागत है .
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/04/blog-post_24.html

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  2. माँ ! एक दिन
    नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा

    bhaut achi traha se likha hai apne iss subject per, very nice

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  3. इस कविता में भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस दौर में आधुनिकता और प्रगतिशीलता की थोथी दलील के दावों को जिस दक्षता से आपने सामने लाया है, वह अलग से रेखांकित करनेवाली बात है। एक शे’र से अपनी बात समेटूंगा,
    पहले ज़मीन बांटी थी, फिर घर भी बट गया,
    इंसान अपने आप में कितना सिमट गया।

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  4. अरुण जी आज के युग में कार्बन उत्सर्जन की बात वो देश कर रहे हैं जिनके यहाँ ये सबसे ज्यादा होता है...अमेरिका के सामने पूरे भारत के कार्बन उत्सर्जन का अनुपात नगण्य है...आपकी अपनी शाश्क्त रचना के माध्यम से इस बात को बहुत असरदार ढंग से पेश किया है...आपकी जितनी प्रशंशा की जाए कम है.

    नीरज

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  5. यह मेरी मां का चुल्हा नहीं झूलसाता प्रकृति माँ की पर्यावरण चुन्नर (ओज़ोन परत)

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  6. 'माँ तुम्हारा चूल्हा '

    बहुत कुछ कह दिया आपने ....बहुत ही सुन्दरता और सलीके के साथ
    लेखनी सार्थक हुई .....रचनाधर्मिता प्रणम्य है .........

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  7. माँ का चुल्हा
    पालता है पूरा परिवार
    रिद्धी-सिद्धी का प्रतीक
    जीवन दाता है

    सुंदर कविता के आभार अरुण जी
    धन्यवाद

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  8. 'चूल्‍हे' से भाव सुलगे-से, वरना झीने काव्‍यात्‍मक विचार.

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  9. अरुण जी क्या कहूँ इस अभिव्यक्ति पर आपको
    चूल्हा मंद हुआ,दिल में द्वन्द हुआ,शब्द नहीं मिल पा रहे मुझे
    जिससे व्यक्त करूँ मै अपनी बात को.
    आभार,आभार आपका बहुत बहुत आभार
    दिल को छूती इस शानदार प्रस्तुति के लिए.

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  10. sunder sabdo se tarasha hein aapne maa ji ke chullhe ko
    bahut sunder
    aabhar

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  11. जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां जलाओगी तुम,
    उतना कार्बन
    एक भवन के केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र से
    उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में.

    कितनी सच्चाई और साफगोई से सरल शब्दों से इस मुद्दे को रखा है आपने. सचमुच आप बधाई के पात्र है.

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  12. बहुत बढ़िया पोस्ट ... सोचने को मजबूर करती ...
    दरअसल अमेरिका जैसे उन्नत देश आजकल जिस तरह उन्नतिशील देशो पर पर्यावरण को बर्बाद करने का लांचन लगा रहे हैं .. वो सरासर बकवास है ...
    भारत की उर्जा खपत वैसे ही दुनिया में सबसे कम है ... भारत की समस्या इसकी भयानक रूप से बढ़ी हुई आबादी है न कि उर्जा खपत ... यदि इस आबादी पे नियंत्रण पाया जा सके ... तो बाकी के बहुत सारे समस्याओं का समाधान अपने आप हो जायेगा ...

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  13. चूल्हा पर्यावरण के अनुकूल नहीं!!!!!!!!!!!!
    सी एन जी और एल पी जी के बारे में क्या ख़याल है?

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  14. माँ
    मुझे याद है
    बीन लाती थी तुम
    जंगलों, बगीचों से
    गिरे हुए पत्ते
    सूखी टहनियां
    जलावन के लिए
    ......सुंदर कविता अरुण जी

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  15. बहुत सुन्दर......कुछ अनकही सी .....कुछ अलग सी पोस्ट .....प्रशंसनीय|

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  16. चूल्हे के बहाने कई आयाम समेट लिए आपने .
    सुन्दर रचना.

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  17. माँ
    बंद होने वाला है
    तुम्हारा चूल्हा
    जिसमे झोंक कर
    पेड़ की सूखी डालियाँ
    पकाती हो तुम खाना
    कहा जा रहा है
    तुम्हारा चूल्हा नहीं है
    पर्यावरण के अनुकूल
    भाई अरुण जी बहुत ही सुंदर लिखते हैं आप बधाई और शुभकामनाएं |

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  18. लेकिन बंद होना है
    तुम्हारे चूल्हे को
    तुम्हारे अपने ईंधन को
    और जला दी जाएगी
    तुम्हारी आत्मनिर्भरता
    तुम्हारे चूल्हे के साथ ही .

    बहुत सार्थक प्रस्तुति...अद्भुत होता है आपका विषय का चुनाव और उनका प्रस्तुतीकरण..बहुत खूब!

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  19. kya kahun sir...ek dum se aaj se 25 saal pahle ka manjar yaad aa gaya, kaise gaon me maa chulhe pe khana banati thi...kaise lakri, uple aur koyle ke upar bana khana....banta tha...kaise rasoi ghar pura black room bana rahta tha..par uss khane ki soundhi mahak yaad aa gayee.!!

    sir lajabab kar dete ho aap
    har baar:)

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  20. बहुत सार्थक प्रस्तुति|सुंदर कविता|

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  21. anoothee lekhan shailee hai aapkee itane bade mudde ko kitnee saralta se spasht kiya hai aapne apneeanootheevyangatmak par saral shailee me.
    aabhar

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  22. अरूण जी
    मर्म को छू लेने वाली रचना है यह

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  23. वाह क्या लिखते हैं आप ..अरुण जी ..और सबसे बड़ी बात है की केवल लिखने के लिए नहीं लिखते हैं एक दिशा है आपके लेखन में बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी...वाकई अच्छा लगा !

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  24. हामिद का चिमटा और कुछ साल पहले फिनोलेक्स केबल का विज्ञापन जिसमें एक मजदूर का बच्चा अपनी मान को केबल का चिमटा बनाकर देता है और आजकल दिखाया जाने वाला हैवेल्स का विज्ञापन.. हामिद से हैवेल्स तक की घटनाएँ जिसकी आँखों में आंसू नहीं ला सकतीं वो इस कविता के पीछे का मर्म नहीं समझ सकते... उनके लिए तो चूल्हा सिर्फ कार्बन का जनित्र है.. सशक्त रचना अरुण जी! साधुवाद!

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  25. सशक्त कविता.......
    जो ह्रदय के तारों को कहीं न कहीं झंझ्कोरती है.....

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  26. मौन हैं सब
    यह जानते हुए कि
    जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां जलाओगी तुम,
    उतना कार्बन
    एक भवन के केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र से
    उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

    100% सही बात कही है आपने मगर चूल्हे पर खाना बनाने वाली ग़रीब माँ की सुनता कौन है. बेहतरीन व्यंग.

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  27. सही बात है.. कहते तो सब चूल्हे को बुरा-भला हैं पर असलियत किसे पता है?
    पहले कम से कम लोग दिल के दौरे से इस गति से नहीं मरते थे जितना आज मर रहे हैं.. पर वातानुकूलित कक्षों पर कोई शोध हो रहा है जो इनके उन मापदंडों को दर्शाए जो उन्हें नकारात्मक परिवेश में दिखाए? नहीं.. क्योंकि यह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का खेल है जिसमें हम प्यादे हैं और हमारी मौत ख़ास मायने नहीं रखती है..
    सब माया जाल में फंसे हैं और अपनी जड़ों को खुद ही काटने पर तुले हुए हैं...

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  28. बिलकुल सही आंका आपने, कुछ मूल बातों को नज़रंदाज़ कर हम . ... हम बड़े बड़े शोध कर रहे हैं. बेहद आत्मीय कविता !

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  29. बहुत ही सुंदर भाव है आपकी कविता में।धन्यवाद।

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  30. वाह........ ! मैं बहुत दिनों के बाद ऐसी कविता पढ़ रहा हूँ जिसमे काल्पनिकता और यथार्थापरता का संतुलित संगम है. नए अविष्कार अथवा तकनीकें जिन पर हम इतराते हैं वास्तव में इन्होने जिन्दगी को सिर्फ कॉम्प्लीकेट ही किया है. वरना मुझे तो नहीं लगता है कि हम कुछ ऐसा कर पाए हैं, जिसके बिना जिन्दगी मुश्किल थी. सुन्दर रचना. धन्यवाद. माँ का चूल्हा प्रतीक है हमारे आदिम संस्कारों का, आधुनिकता जिसे लीलने पर लगी हुई है.

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  31. paryavaran sevi santhaon ka doharapan kya khoob ukera hai 'ma ke chulhe 'ke bahane...sunder...

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  32. Har cheez ke maayne badal rahe hain ... naya yug puraani maanytaao ko khaariz katke fir se unhe apnaa raha hai ... kaisi vidambna hai ...

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  33. निरंतरता के लिए बधाई .सुन्दर कविता है .

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  34. दिल को छूनेवाली रचना.... बधाई स्वीकार करें....

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  35. Bhai VAAh very beautiful& meaningful wording. Gzabbbbbbbbbbbbbbbbb. Congrats.

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  36. रचना वास्तविकता दर्शाने वाली है....धन्यवाद!

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  37. अतिप्रभावशाली और मर्मस्पर्शी ढंग से विषय को उठाया है आपने...

    सार्थक बहुत ही सुन्दर रचना...

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  38. बहुत खूब.
    बहुत ही खूब.
    भाव भी सुन्दर.
    बढ़िया सन्देश.

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  39. यादों की संवेदनाओं से भरी पोस्ट। चूल्हा और माँ, दोनों ने परिवार को पाला है।

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  40. माँ ! एक दिन
    नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा ...

    touching lines...You made me emotional.

    .

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  41. आज आप को याद करते करते यहाँ तक पहुँचा क्योंकि आपकी इस रचना की तारीफ़ सुन रक्खी थी..

    अरुण जी,यह जमाना नया है यहाँ लोग आराम की जिंदगी जीना चाहता है और जीवन की वास्तविक बातों को समझने का उनके पास टाइम नही यहाँ...आपने बहुत गंभीर और सही बात कविता के माध्यम से उठाई है काश आज का आधुनिक मानव मानव समझ पाए...बधाई

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  42. बेहतरीन कविता !
    मैं नि:शब्द हूं

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  43. "ye tezaabi baarishen ,bijli ghar kee raakh ,
    ek din hogaa bhoopatal vaarnaavat kee laakh "-
    ammaa kaa choolaa to nir -dosh hai -
    Aao Dekho kitni badi badi kaaren yahaan amrikaa me kitni gas (amrikaa me tel ko gas hi kahaa jaataa hai )foonk rhin hin pal prati -pal .
    Van devi ko van -nikaalaa dene kaa shadyantr angrezon ne shuru kiyaa thaa bhaarat sarkaar usi kaanoon pe chalti rhi hai .
    behtreen hakeekat byaani ke liye aap badhaai ke paatr hain arundaa !
    veerubhai .

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  44. हाथी के दांत को पहचानना कठिन है..बेहतरीन कविता

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