बुधवार, 13 जुलाई 2011

रास्ते

इन दिनों
सभी रास्ते
एक ओर ही जाते हैं
कहीं से
मुड जाइये
किसी भी नुक्कड़ से
ले लीजिये
कोई भी मोड़
पहुचेंगे आप
वहीँ

पूछ लिया
किसी ने
मुझसे किसी का पता
मैंने दिखा दिया
एक रास्ता
लेकिन वह रास्ता भी
पंहुचा वहीँ
इस रास्ते पर
चलते चलते
बदल जाते हैं
लक्ष्य
दृष्टि
सरोकार

बहुत भीड़ है
इस रास्ते पर
सब जाना चाहते हैं
इस ओर ही
बहुत आसान है
यह राह
सिखाता है
करना समझौते
करना युक्ति
आगे पहुचने के लिए
गति और दिशा की
नहीं है कोई सीमा
बस कुछ करके
निकलना है आगे

ये रास्ते
बंद हैं
कुछ लोगों के लिए
जैसे मेरे लिए
मेरे गाँव के किसना, रामखेलाउन,
उर्मिया की माई के लिए
अरशद, फरहान के लिए
इस रास्ते पर
चलने के लिए
बने हैं कुछ
अघोषित नियम
जिनकी चर्चा ऐसे खुले में
होती नहीं

जब यह रास्ता
गाँव से चलता है
साथ होते हैं
लाखो लोग
होती है
उनकी आवाजें
उनकी जद्दोजहद
लेकिन जैसे जैसे
बढ़ता है कोई
इस रास्ते पर
छूटते जाते हैं
लोग
दबती जाती है
उनकी आवाजें
और लाल-नीली बत्तियों का शोर
भारी पड़ जाता है
दूसरे सभी शोरों, नारों
सरोकारों पर

यह रास्ता
वापिस नहीं लौटता
पीछे की ओर नहीं चलता
बस एक ओर चलता है
अपने मद में

संसद मार्ग कहते हैं इसे.

31 टिप्‍पणियां:

  1. संसद मार्ग कहते हैं इसे. very good.

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  2. यह रास्ता
    वापिस नहीं लौटता
    पीछे की ओर नहीं चलता
    बस एक ओर चलता है
    अपने मद में

    संसद मार्ग कहते हैं इसे....

    बहुत सार्थक और सटीक टिप्पणी..बहुत सुन्दर

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  3. दबती जाती है
    उनकी आवाजें
    और लाल-नीली बत्तियों का शोर
    भारी पड़ जाता है
    दूसरे सभी शोरों, नारों
    सरोकारों पर
    ..........बिकुल सही फ़रमाया आपने बेहद प्रभावी और उम्दा रचना है....शुभकामनाएं।

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  4. भावों को सटीक प्रभावशाली अभिव्यक्ति दे पाने की आपकी दक्षता मंत्रमुग्ध कर लेती है...

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. अरुण जी आपकी कविता पाठक को कवि के मंतव्य तक पहुंचाती हैं। आप की विशेषता है कि आप अतिरिक्त पच्चीकारी नहीं करते। अपनी साफ दृष्टि और संप्रेषणीयता से आप अपना एक अलग मुहावरा रचते हैं।
    यह रास्ता
    वापिस नहीं लौटता
    पीछे की ओर नहीं चलता

    इस कविता की खास विशेषता है कि यह अपने इरादों में राजनैतिक होते हुए भी राजनैतिक लगती नहीं है। इसमें कहीं कोई जार्गन नहीं है।
    और लाल-नीली बत्तियों का शोर
    भारी पड़ जाता है
    दूसरे सभी शोरों, नारों
    सरोकारों पर
    और जब मैं यह पढ़ता हूं तो यह कहने को विवश हो जाता हूं कि आपमें विचारधारात्मक प्रतिबद्धता होने के बावजूद आपकी कविता में कहीं भी विचारधारा हावी होती हुई नजर नहीं आती है।

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  7. सारे मार्ग संसद के उपांग हैं। इन्हीं सड़कों पर चल नेता संसद पहुँचते हैं।

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  8. मार्ग तो सारे देश के ही संसद मार्ग की तरह हो चुके हैं अब.
    सटीक अभिव्यक्ति.

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  9. यह रास्ता
    वापिस नहीं लौटता
    पीछे की ओर नहीं चलता
    बस एक ओर चलता है
    अपने मद में

    संसद मार्ग कहते हैं इसे.
    Ha,ha,ha! Waise sach hai!

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  10. एक व्यथा और पीड़ा एक आम आदमी की, जो हमेशा से आपकी कविताओं का विषय रहा है, इस बार भी छूता है मन को, खडा करता है एक प्रश्न जिसका उत्तर हर व्यक्ति को खोजना है.. आपकी कविताओं की विशेषता है वे सवाल करती हैं.. जवाब नहीं देतीं, क्योंकि या तो उन प्रश्नों के जवाब नहीं किसी के पास या उनके जवाब सिर्फ उनके पास हैं जो संसद मार्ग के यात्री हैं, नीली-लाल बत्तियों वाले वाहनों के.. जिनके वाहन के शीशे बंद होते हैं और ऐसे सवालों के लिए "जैमर" लगे होते हैं.. अरुण जी, उस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं साठ सालों से!!

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  11. जहां रास्‍ते पहुंचते हैं, वहीं से रास्‍ते खुलते-निकलते हैं.

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  12. दबती जाती है
    उनकी आवाजें
    और लाल-नीली बत्तियों का शोर
    भारी पड़ जाता है
    दूसरे सभी शोरों, नारों
    सरोकारों पर
    बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... ।

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  13. वाह....सच कितना यतार्थ छुपा है इसमें.......इंसानी फितरत कितनी जल्दी रंग बदलती है ......वाह

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  14. यही है ज़िन्दगी का सच ………रास्ते भी बदल जाते है और मुसाफ़िर भी और मंज़िले भी…………और इसी के साथ सबको जीना पडता है।

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  15. संसद मार्ग या संसद ... दोनों ही एक स्थिति में आकार बहरे हो जाते हैं ... और जला देते अहिं वापस लौटने का रास्ता ...
    बहुत प्रभावी प्रस्तुति है अरुण जी ..

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  16. इन मार्गों पर चलने के लिए
    तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।।
    रचना बहुत सटीक है!

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  17. कल 15/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  18. भाई अरुण जी आपकी कविता कभी निराश नहीं करती अप कविता में जो कहना चाहते हैं बड़े सलीके से बिना शोरगुल के ख जाते हैं |बधाई

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  19. भाई अरुण जी मेरे कमेंट्स में त्रुटियाँ हो गयी हैं आप के स्थान पर अप और कह के स्थान पर ख हो गया है |

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  20. कल 17/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  21. भीड़ सिर्फ एक शोर इससे ज्यादा कुछ नहीं जिसका कोई आस्तिव नहीं सिर्फ शोर के सिवा कुछ भी उसके बाद सबका अपना - अपना सफर कहाँ रूकती है भीड़ सब अपने रास्तों में गुम और सफर निरंतर जारी |
    ये बात भी सही लगी ....संसद मार्ग कहते हैं इसे.:)
    बहुत सुन्दर रचना दोस्त :)

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  22. मंजिल अपनी जगह है ,रास्ते अपनी जगह
    पर कदम ही लड़खड़ायें - कोई भला फिर क्या करे ?????
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  23. बिना किसी बनाव-शृंगार के सीधे-सरल शब्दों में अधिक घनत्व वाली बात कविता में कह देना आपकी विशेषता है।
    यह बेजोड़ कविता आखि़री शब्द तक पाठक को बांध कर रखती है।

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  24. इस रास्ते पर
    चलने के लिए
    बने हैं कुछ
    अघोषित नियम
    जिनकी चर्चा ऐसे खुले में
    होती नहीं


    एक दम सोलह आने सही बात वो भी डंके की चोट पर

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  25. यह रास्ता
    वापिस नहीं लौटता
    पीछे की ओर नहीं चलता
    बस एक ओर चलता है
    अपने मद में
    ....
    मगर भाई जी संसद मार्ग नही ..महबूब के डगर तक
    अब ये बात अलग है की सबके महबूब और सब की चाहतें अलग अलग हो सकती हैं.

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