शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

बहस के बीच एक बच्चा

वह जो
चाय की दुकान पर
बहस के बीच
लेकर आता है
चाय का गिलास
ले जाता है
खाली जूठे गिलास
वह जिसने  कई बार
हमारी उत्तेजना में
खाया है चांटा
जब भी गीले फर्श पर
फिसला है उसका पाँव
और गीला हुआ है
हमारा खादी का कुरता
या फिर जलने सा 

आभास हुआ है  
गरम चाय के छलकने से
और बात है कि
उसके हाथों के फफोले
नहीं होते मद्धम कभी

वही बच्चा तो है यह
जो हमारी बहसों में होता है
जब हम बदलना चाहते हैं
उसकी दुनिया
देना चाहते हैं उसके अधिकार
जबरन भेजना चाहते हैं
उसे स्कूल
जबकि भिन्न हैं
उसकी प्राथमिकताएं
उसे नहीं पता कि
वह क्यों है बहस में
क्यों है वह आज यहाँ
जहाँ नहीं होना चाहिए
उसकी  उम्र के
किसी को भी

हाँ
उसकी आँखों में
उदासी भरे सपने
भा जाते हैं
छायाकारों को
और साल के कुछ खास दिन
वह या उसके जैसा
कोई और बच्चा
तिरंगा लिए
छप जाता है
अखबार के पन्नो में
विज्ञापनों में
लगता है हमें
बहस को मिल गया
एक मुकाम

उसी अखबार में
लपेट के देता है कई बार वह
बिस्कुट, नमकीन
बिना किसी अन्यथा के भाव के

जिस किसी को
देता है वह चाय
नहीं चाहता है कि
वे करें उस पर जोरदार बहस
वह तो बस चाहता है इतना भर कि
रोज़ रात को मिल जाये उसे
गीले, मैले-
कुचैले 
कुछ पुराने नोट
या फिर खुदरे पैसे
ख़रीदे एक पतंग
और उडाये जी भर कर
अँधेरी रात में
चाहता है कि उसकी पतंग
छू ले एक बार झिलमिलाते तारों को
क्योंकि सुबह होते ही
लौटना है उसे
चाय की दुकान पर
बहसों के बीच

29 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ बच्चो के जीवन मे ऐसे पल ठहर जाते है और उनकी प्राथमिकतायें सच मे जो होती है उन्हे आपने बिल्कुल सही चित्रित किया है…………हम सब के लिये वो सिर्फ़ एक बहस या हमदर्दी का मुद्दा बनकर रह जाते है मगर हकीकत आपने अपनी कविता मे दर्शा दी है।

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  2. जो बात आपने कही है इसे मैंने भी कई बार अनुभव किया है.
    एक सही और वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया है आपने जिस पर गंभीरता से सोचने की भी आवश्यकता है.

    सादर

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  3. किसी भी चीज को देखने के सबके अपने आयाम होते हैं। सही कहा कि बच्चे के फ़फ़ोले कभी मद्धम नहीं पड़ेंगे।

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  4. uss din hi to...jab ham chai pee rahe the...aapke saath to ek bachcha chai ki glass pakra kar chala gaya tha:)

    apne usko bhi shabdo me dhal diya!!

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  5. वह तो बस चाहता है इतना भर कि
    रोज़ रात को मिल जाये उसे
    गीले, मैले-कुचैले कुछ पुराने नोट
    या फिर खुदरे पैसे
    ख़रीदे एक पतंग
    और उडाये जी भर कर
    अँधेरी रात में
    चाहता है कि उसकी पतंग
    छू ले एक बार झिलमिलाते तारों को
    meri dua hai is chaah ke sang.... aur aapki drishti kaafi gahri hai

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  6. नहीं चाहता है कि
    वे करें उस पर जोरदार बहस
    वह तो बस चाहता है इतना भर कि
    रोज़ रात को मिल जाये उसे
    गीले, मैले-कुचैले कुछ पुराने नोट..

    बस यह एक बहस का मुद्दा बना हुआ है ..और ऐसे बच्चों के सपने बिखर रहे हैं .. सच्चाई को कहती अच्छी रचना

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  7. उन बच्चों को, जो वहां हैं, जहां उन्हें नहीं होना चाहिए, आपने अपनी कविता का विषय बनाकर अपने संवेदनशील दृष्टिकोण को पाठकों के समक्ष रखा है।
    कविता में एक विशेष वर्ग के बच्चों की व्यथा सजीवता से व्याख्यायित हुई है।
    इस रचना ने मुझे बेहद प्रभावित किया है।

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  8. इस कविता में अपने समय व परिवेश का नया पाठ बनाया है। समकालीन मनुष्य के संकटों को पहचानने तथा संवेदना की बची हुई धरती को तलाशने के कारण यह रचना असाधरण बन पड़ी है।

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  9. काश कभी हमारी बहसों के बीच आने वाला हमारी बहसों के बीच आ जाये। गहरी अभिव्यक्ति।

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  10. उसे वाकई नहीं पता कि वो क्यूँ है बहस में| उफ, हमारे ये नीति नियंता पता नहीं कब समझेंगे|

    बेहतर है मुक़ाबला करना

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  11. एक तरफ उस मासूम के मासूम सपने हैं, दूसरी ओर उसके लिए की जा रही बनावटी बहस.. एक ओर "काला" खादी का सफ़ेद कुर्ता है, तो दूसरा ओर देश का काला भविष्य चाय की दूकान पर प्लेटें साफ़ करते हुए... इन सरोकारों से किसे सरोकार रह गया आजकल!! अरुण जी प्रकाश में लाते रहें, हम रू ब रू होते रहेंगे इन सरोकार से!!

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  12. एक सही और वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया है आपने जिस पर गंभीरता से सोचने की भी आवश्यकता है|गहरी अभिव्यक्ति।

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  13. बहुत खूब ... संवेदनहीन बुद्धिजीवियों की संवेदनशील बहस का हिस्सा होने पर भी कितना निरीह रहता है ... वो मासूम ...
    तमाचा है इस बर्जुआ समाज पर ये प्रभावी रचना ...

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  14. बहुत ही मार्मिक रचना । आभार अरूण जी ।

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  15. आदरणीय अरुण जी
    नमस्कार !
    सच को उजागर करती हुई अच्छी रचना

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  16. अरुण जी बहुत ही बेहतरीन कविता पढ़ने को मिली बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं |

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  17.  अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  18. बहुत ही ताजगी से भरी कविता बधाई भाई अरुण जी

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  19. Bahut-2 sunder prastuti...
    badhai
    ap bhi aye....hamara jausla badhaye.

    Abhar

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  20. वाह अरुण जी, रोज़मर्रा में होने वाली घटना को क्या खूब समेटा है इस कृति में आपने...
    बस बहस का हिस्सा बन पता है वाह बच्चा पर बहस करने लाया कभी नहीं...

    परवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
    आभार

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