गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

विकास मार्ग




राजधानी से
देश की ओर निकलने वाली
हर सड़क को
कहा जाता है
विकास मार्ग.

विकास मार्ग
जहाँ जहाँ से गुज़रता है
छीन लेता है
खेत खलिहान
मोड़ देता है
पानी का बहाव
बदल देता है 
प्रकृति का स्थानीय चक्र 
उगा देता है
कंक्रीट के कांटे
चिमनियाँ सुलग  उठती हैं
सूरजमुखी फूलों की जगह

विकास मार्ग
लाता है विकास का बेतरतीब बहाव 
करता है बहुत विकास एकमुखी 
चौड़ी कर देता है खाई 
बदल देता है
अर्थव्यवस्था का चरित्र ही
आत्मनिर्भरता को
विस्थापित कर देता है
नौकरी पेशा से
प्रति व्यक्ति आय के अनुपात में
तेज़ी से बढ़ता है प्रति व्यक्ति व्यय

विकास मार्ग के दोनों ओर
लग जाते हैं
मोबाइल के ऊँचे ऊँचे टावर
बंद हो जाते हैं
छोटे छोटे बाज़ार
खुलने लगते हैं माल
बिकने लगते हैं
दुनिया के नामी गिरामी ब्रांड
सूखे खेतों  की पीठ पर
चाबुक की छाप से प्रतीत होते हैं

तेज़ी से बढ़ रहे हैं
फ़ैल रहे हैं
विकास मार्ग
चारों ओर
अमर बेल  की तरह
चूसते हुए
धरती का पानी, पोषण
यह दौर है जब
नामकरण हो रहा है इनका 
भांति भांति से
ताकि याद रहे 
खेत खलिहानों को
अवाम को 
कि कौन लाया था यह विकास मार्ग 
क्या था इसका उद्देश्य 

18 टिप्‍पणियां:

  1. is vikaas kaa to sapnaa nahi dekhaa tha un panili aankho ne ...aaj bhi wo panili hee hai aur sapnaa bhi sapnaa hee hai

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  2. विकास के रास्ते में विनाश छिपा हवा है ... अर्थपूर्ण रचना है ... बहुत खूब अरुण जी ...

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  3. विकास मार्ग
    जहाँ जहाँ से गुज़रता है
    छीन लेता है
    खेत खलिहान
    मोड़ देता है
    पानी का बहाव
    बदल देता है
    प्रकृति का स्थानीय चक्र
    उगा देता है
    कंक्रीट के कांटे
    चिमनियाँ सुलग उठती हैं
    सूरजमुखी फूलों की जगह
    ...... आपने तो कटाक्ष का अलकतरा डाल दिया , जबरदस्त खुलासा और उसकी बेचैनी

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  4. विकास के नाम पर हो रहे शोषण पर गहरा कटाक्ष किया है।

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  5. अरुण जी!
    विकास मार्ग तो कई बने, मगर विकास का मार्ग एक नहीं!!विकास मार्ग बने, साथ ही जो भी हुआ वह आपकी कविता में झलकता है.. काश कोई विकास की पगडंडी ही ईमानदारी से बनी होती!!!

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  6. रास्‍तों से ही रास्‍ते निकलते हैं.

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  7. सचमुच ये कैसा विकास है..और कब तक ठहरेगा..

    सबके मन में घुमड़ते प्रश्नों को शब्द दे दिए हैं..
    उम्दा कविता

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  8. यह वह मार्ग है जिसपर चलना तो सब चाहते हैं, चल पर आम जन चल नहीं पाते।

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  9. राजधानी की ओर आने वालों के लिये होता है यह नाम...

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  10. विकास मार्ग
    जहाँ जहाँ से गुज़रता है
    छीन लेता है
    खेत खलिहान
    मोड़ देता है
    पानी का बहाव
    बदल देता है
    प्रकृति का स्थानीय चक्र
    उगा देता है
    कंक्रीट के कांटे

    वाह अरुण जी बहुत ही शानदार है पोस्ट....हैट्स ऑफ इसके लिए।

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  11. बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति ।

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  12. बेहद आवश्यक विषय जिसपर लोगों का ध्यान खींचना आवश्यक है ...
    आभार आपका अरुण !

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  13. न जाने कहां ले जाएगा, यह विकास का मार्ग.

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  14. तेज़ी से बढ़ रहे हैं
    फ़ैल रहे हैं
    विकास मार्ग
    चारों ओर
    अमर बेल की तरह
    चूसते हुए
    धरती का पानी,
    तिस पर तुर्रा यह ,गाते हैं यही लोग फिर भी -मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती ,......चन्दन हैं माती मेरे देश की ....

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