गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

चुनाव



हाथ

हाथी
कमल
साइकिल
तीर
मोमबत्ती
आलमारी
चाबी
घर
सूरज
दो पत्ती
हसुआ हथौड़ा
कंप्यूटर
अंगूठी
कबूतर
कौवा
आम
कटहल
गेहू की बाली
सड़क
मोटर
गाय
बछड़ा
उगता सूरज
आदि आदि

इन सबके बीच

उलझे आदमी को
करना है चुनाव (?)

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब!! उलझाव की अच्छी परिभाषा और उलझाव के इतने इन्तेज़ामात... उफ्फ ये आदमी और उसकी ज़िंदगी!! चुनाव में चुनाव कितना मुश्किल!! एक गाना
    दिल में बसाकर प्यार का तूफ़ान ले चले,
    हम आज अपनी मौत का सामान ले चले!!

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    1. सलिल सर कविता को और भी स्पष्ट कर दिया आपने...

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  2. मानों सब कह रहे हों, चुनना चाहते हो तो चलो चुन ही लो फिर देखते हैं.

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  3. Sach! Chunav ke samay manme itnee duvidha rahtee hai! Har taraf ullu hee ullu! Waise bechare ulluko bekar badnaam kar dete hain hamlog!

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  4. इन सब के बीच भटका आदमी तो अपनी बु्द्धि विवेक के अनुसार किसी न किसी का कर ही लेगा चुनाव। असली समस्या तो उनके लिए है जो इन सबके बीच भटकते हुए, उन लोगों के दर्द को भी महसूस करता है जो इन सब के बीच भटके हुए हैं।

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  5. बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

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  6. भूल भुलैया है, या शब्दों का छलावा, फिरभी आदमी फंसता ही जाता है।

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  7. क्या बात ...बहुत खूब ..एक उलझे सिस्टम में उलझा आदमी .चुने तो क्या चुने.

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  8. वाह साहब....मुझे चुनाव चिह्न देख कर बड़ी हंसी आती है तरह तरह के.....बहुत सुन्दर|

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  9. चयन भी ऐसा ही होगा ....नतीजा तो हम हर बार ही देखते हैं.

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  10. चुनाव करना तो जरूरी है, देखना कोई चूक नहीं जाना।

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