शनिवार, 15 अप्रैल 2017

झारखण्ड एक्सप्रेस -2



आशाएं लेकर चलती है 
झारखण्ड एक्सप्रेस 
हटिया में लद लद कर 
बैठते हैं सपने 
कुछ शिक्षा के 
कुछ रोज़गार के 
कुछ सेहत के 
लौट आती हैं 
कुछ खाली हाथ 
कुछ लहूलुहान 
कुछ अभिशप्त 
जो नहीं लौटती हैं 
वे खो देती हैं 
अपनी पहचान 

झारखण्ड एक्सप्रेस 
लौटती है लेकर बोरी भर कर 
हताशा ! 

6 टिप्‍पणियां:

  1. लौटना भी जरूरी है
    हताशा के लिये
    अपनी पहचान
    नहीं खोती है वो ।

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  2. हर हांव से चलने वाली गाड़ी की यही व्यथा है ... कितनी आशाएं चलती हैं और चूर हो जाती हैं ...

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