मंगलवार, 13 जून 2017

किसान की व्यथा




खाली मेरी थाली 
भरा है तेरा पेट 
अन्न उगाऊं मैं 
खाऊन मैं सल्फेट 


मिटटी पानी से लड़ूँ 
 उसमे रोपूँ बीज 
पसीना मेरा गंधाये
महके तेरी कमीज़ 


खूब जो उगे मेरी फसल 
गिर जाए इसका मोल 
कोल्डस्टोरेज में भरकर 
पाओ तुम दाम अनमोल 


जो व्यापारी बन गए 
उनके खुले हैं भाग्य 
जो बैठे धरती पकड़ 
रोये अपने दुर्भाग्य 


गेहूं  न फैक्ट्री उपजे 
कंप्यूटर न बनाए धान 
जिसदिन देश ये समझे 
बढे किसान का मान 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (15-06-2017) को
    "असुरक्षा और आतंक की ज़मीन" (चर्चा अंक-2645)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  2. समझते हैं पर समझना नहीं चाहते ... आँखें बंद करने में ही इनक्सा सुख जो छुपा है ...

    उत्तर देंहटाएं