मंगलवार, 20 जून 2017

जीवन शून्य है





सैकड़ो बार कहे जाने के बाद भी 
हम दुहराते हैं कि 
जीवन शून्य है 
और आश्वस्त होते हैं 
माया मोह के बंधन से दूर हैं हम 

जितनी बार दुहराते हैं शून्य 
शून्य का  धागा  
मनोकामना के धागे की तरह 
मजबूती से लिपट जाता है 
हमारे चारो ओर 
कुछ  आशाओं के संग 

शून्य का यह डोर 
चलता रहता है हमारे साथ 
साँसों की डोर के सामानांतर 
और कहता है शून्य नहीं है जीवन 

6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट। कविता में दार्शनिकता का पर्याप्त पुट है। बधाई।

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  2. अच्छा लग रहा है लगातार लिखते हुऐ देखते आपको।

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. नमस्ते, आपकी यह रचना गुरुवार 22 -06 -2017 को "पाँच लिंकों का आनंद " http://halchalwith5links.blogspot.in में लिंक की गयी है। चर्चा के लिए आप भी आइयेगा ,आप सादर आमंत्रित हैं।

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  5. जीवन शून्य है....बहुत ही सुन्दर...
    लाजवाब प्रस्तुति...

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