शनिवार, 2 सितंबर 2017

सड़क

सड़कें
कहीं नहीं पहुँचती
पहुंचाती है
यात्री को।

यात्री
सड़क के बिना
नहीं पहुच सकते
कहीं भी
मंजिल यदि साध्य है
सड़कें साधन।

सड़कें
धरती को नहीं छोड़ती
जो धरती को छोड़ते हैं
औंधे मुँह गिरते है
किसी न किसी मोड़ पर

मैं बने रहना चाहता हूँ
सड़क
तुम पाना अपनी मंजिल
यहीं से गुज़रते हुए। 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 04 सितंबर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’हिन्दी ग़ज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार से निखरी ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-09-2017) को "आदमी की औकात" (चर्चा अंक 2717) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत ही सटीक कविता, कितनी ही बार हूँ उन्हें भूल जाते हैं जो बिना कुछ अपेक्षा किये हमारा हॉंसला बढ़ते यहीं और बिना देकेः हमारे साथ चलते हैं . .

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  5. क्या बात है !!! सडक की सार्थक परिभाषा और सडक को भावपूर्ण उद्बोधन कमाल है | हार्दिक शुभकामना -

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