शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

प्रतीक्षा



लौट जाता है सूरज
समंदर के आँचल में 
चला आता है चाँद
अपने घर से

लेकिन ख़त्म नहीं होती 
आसमान की प्रतीक्षा 


लहरे
लौट आती हैं
छू कर तटों को
लेकिन साथ नहीं आता तट
लहरों के साथ
ख़त्म नहीं होती
लहरों की प्रतीक्षा 

सपने 
आते है रोज
झिलमिलाते  
गुलमोहर सजाये 
चले जाते हैं 
आँख खुलने के साथ ही 
फिर भी अच्छा लगता है 
सपनों की स्वप्निल प्रतीक्षा  

रोज सुबह से 
कोई देखता है  रास्ता
डाकिये का 
मालूम भी  है कि
नहीं आयेगी कोई चिट्ठी 
उसके नाम तुम्हारे गाँव से 
फिर भी उसे  पसंद है 
सांझ ढले तक करना 
डाकिये  की प्रतीक्षा 

पलकें बिछाए  
मन की  चौखट पर
खड़ा हूँ मैं 
वर्षों से
लेकिन नहीं आये
तुम्हारे आलता भरे पाँव
अनवरत है 
प्रतीक्षा मेरी भी .

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

यह राजपथ

यह राजपथ

प्रगति पथ
उन्नति पथ
स्वाभिमान पथ
आत्मसम्मान पथ


यह राजपथ


विजय पथ
विकास पथ
अखंडता पथ
संप्रभुता पथ

यह राजपथ

आरोह पथ
अविराम पथ
संस्कार पथ
संस्कृति पथ
ज्ञान पथ
विज्ञान पथ

यह राजपथ

नहीं स्थान यहाँ
जातिगत विद्वेष का
नहीं स्थान यहाँ
धार्मिक अविश्वाश का
यह पथ
प्राण आहुति विशेष का
यह पथ
स्वयं के उत्सर्ग का


यह राजपथ
जन जन का पथ !

(गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना के साथ !) 

सोमवार, 24 जनवरी 2011

होना ही था


१. 

होना ही था
जंगलों को तबाह 
देने के लिए रास्ता 
सडको को /राजमार्गों को 
अलग बात है यह 
पगडण्डी नहीं मांगती बलिदान 
बिठाती है सामंजस्य . 


२. 

होना ही था 
खेतों से विस्थापन किसानो का 
देने के लिए कारपोरेट किसानी को स्थान 
सोचने की बात है यह 
कैसे कर लेता है आत्महत्या 
हर दिन जूझने वाला किसान 


३.

होना ही था 
अपनों के बीच 'स्पेस' की मांग 
अपने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व के लिए 
आज महत्वपूर्ण है यह 
निजता भारी  पड़  रही है
अपनेपन  पर 


४.

होना ही था 
तुम ले लोगी अलग रास्ता 
एक मोड़ पर आकर
क्योंकि तुम्हे नहीं दिखता 
रौशनी के बीच का अँधेरा 
मुझे  अच्छी लगती है
अँधेरे की रौशनी

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

हैती

प्रथम अश्वेत गणतंत्र
नए विश्व के समीकरण में
नहीं उतरता
कहीं खरा
क्योंकि उसे चुकाना है अभी
अपने स्वतंत्र होने का मूल्य
दो शताब्दी के बाद भी.

विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था
समृद्धि  और आधुनिकता के राष्ट्र समूह के
आँचल में पल रहा है
यह दुनिया का सबसे गरीब देश
जो कभी केंद्र रहा था
प्राकृतिक संसाधनों और उनके व्यापार का
जहाँ थे कभी पहाड़, जंगल ही जंगल,
समंदर ही समंदर
और दोहन इस तरह हुआ कि
मौजूद है बस
बंजर भूगोल
बाढ़, भूचाल और
इन सबसे उपजी स्याह सिसकियाँ

उपनिवेशवाद को
पहली चुनौती देते हुए
जिस भूमि में बोया गया था
क्रांति बीज
वहीँ काटी जा रही हैं
भ्रष्टाचार की फसल

'जींस जेक्वस डेसलीन' का
नेतृत्व संघर्ष जिसने दी थी
नेपोलियन की सेना को भी मात
और जीता था स्वातंत्र्य 
लोकतंत्र की रख न सका नीव
और दूर रही सत्ता और सरोकार
आम आदमी से

सैकड़ो तख्ता पलट
उलट फेर के बीच जो साम्य रहा
वह था हाशिये पर
जन और जनहित
तभी तो अपने नाम का
ऊँचे पहाड़ो की भूमि का अर्थ रखने वाला
बौना है नए विश्व समीकरण में
और गिरफ्तार है
नव-उपनिवेशवाद के शिकंजे में
विश्व का प्रथम अश्वेत गणतंत्र -हैती

बुधवार, 19 जनवरी 2011

प्रथम वर्षगांठ पर


(कल यानि १८ जनवरी को सलिल वर्मा जी (चलाबिहारी ब्लॉगर  बनने फेम) की  शादी की  सालगिरह थी . संयोग से मिलना हुआ स्वप्निल 'आतिश' के  साथ. उनसे मिलकर जब घर लौटा तो मेरी अपनी डायरी  में अपने विवाह के पहले वर्षगाँठ पर लिखी कविता मिली, सोचा पोस्ट कर दूं . )  

साल गुज़र गया
हम रहे साथ साथ
कैसे बीता
खबर ही नहीं

धरती अपने  अक्ष पर
घूमती रही अपनी गति से
हमें लगी बहुत तेज़
फिर भी
हमारी सम्मिलित कल्पनाओं से
अधिक नहीं !

ऋतुएँ आईं
ऋतुएँ गई  भी
हमारे लिए तो रहा
वसंत ही
खिले रहे पुष्प
मन के आँगन में
और स्थगित रहा पतझड़
ड्योढ़ी पर ही
साल जो गुज़र गया
हाथ में रहा तुम्हारा हाथ

ठीक है
चाँद नहीं ला पाया मैं
धरती पर
तुम्हारे लिए
तारे भी नहीं लाया तोड़
फिर भी
खुश रही तुम
अपने जीवन में सबसे अधिक
हंसी की खनक
कुछ अधिक हुई
आँखों की चमक
कुछ अधिक चटक हुई
मन भीगा भीगा रहा
साल  भर
साथ साथ रहे जो हम

सुना है गुरुत्वाकर्षण का बल
होता है सबसे अधिक
लेकिन खींचा हमने
एक दूसरे को 

एक दूसरे के प्रति
जा कर पृथ्वी के गुरुत्व के विपरीत

और स्थापित किया - प्रेम का बल
जो  है सबसे प्रबल, सबल
विज्ञान की अवधारणा से परे.