रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन डे पर एक चिट्ठी

माँ 
बहुत प्यार करता हूँ तुम्हे
फिर भी
दे ना सका कभी तुम्हे
कोई गुलाब
कोई कार्ड
जब भी कुछ देने की पहल की
सोचा पहले छुडवा दू
तुम्हारे बंधक पड़े गहने
गहने छुडवा न सका
क्योंकि हर बार
बदल गई प्राथमिकताएं
कुछ तुम्हारी मर्ज़ी से
कुछ खिलाफ

पता  नहीं कैसे तुम
बिना उपहार
बिना इज़हार
करती हो प्यार

बाबूजी
आपसे भी करता हूँ
उतना ही प्यार
जितना माँ से
और यह प्यार
तब और बढ़ गया था
जब आपने लगवाया था
पहली बार गाँव में अखबार
फिर भी
कभी आया नहीं ख्याल कि
ले लू आपके लिए कार्ड, फूल
या कुछ और
ख्याल में रहा कि
बंधक पड़े हैं जो खेत
छुडवा लूं  पहले
अन्न से भर दूं 
गिरते हुए दालान पर पड़ा
वर्षों से खाली भंडार

खेत तो छूटे नहीं
क्योंकि नहीं चाहते थे आप
मेरी प्राथमिकताएं
गंवई हो जाये
शायद मेरी बदली हुई
अर्थव्यवस्था
और उससे कहीं अधिक 
बदले हुए मनोभावों से
परिचित थे आप

सोचता हूँ अक्सर
कैसे निभाते हैं आप
प्रेम यह एकतरफा 

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

इन दिनों


इन दिनों
कुछ अजीब सा लगता रहता है
भीतर ही भीतर
यह परेशान भी
नहीं करता
ना कम हुई है भूख
ना ही रूचि
कि दिखा लू
किसी डाक्टर को

निराशा के भाव भी
नहीं हैं
ना ही है कोई प्रवृत्ति
आत्महत्या की 

अवसाद के फैशन से भी 
नहीं हूँ 
ग्रस्त 

आज ही सुबह
लग रहा था मानो कोई
घर के पीछे
सिसक रहा हो
रो रहा हो
पुकार रहा हो
और मैं भाग रहा हूँ
उस से दूर
देखा तो पाया कि
भ्रम था मेरा
हां गुलाब जरुर खिल गया था
गमले में
और तोड़ लाया मैं उसे
पत्नी को देने के लिए उपहार
'रोज़ डे' यानी गुलाब दिवस के अवसर पर

एक दिन
लगा  कि एक बच्चा आ गया है
मेरी सायकिल के नीचे
जबकि सायकिल में लगे थे
रोड रोलर के पहिये
बच्चा दबा जा रहा है
पहिये के नीचे
चिपक कर विकृत हो गया है
उसका चेहरा
उसकी देह
मैंने सायकिल रोक दी
देखे अपने पहिये
सामान्य ही दिखे
साइकिल के कैरियर पर बैठा
मेरा बेटा मुस्करा रहा था
भोलेपन से
और झुक गई साइकिल एक ओर 

उम्मीदों के भार से . 

अब कल ही की बात देखिये
अखबार पढ़ते हुए
अचानक लगा
ढह गया है कुछ
भरभरा कर
गर्द का गुबार छा गया है
आसमान में
लेकिन कुछ कहाँ था ऐसा
सब कुछ सामान्य था
अखबार के सभी पृष्ठ रंगीन थे
देश के तमाम सूचकांक
विपरीत परिस्थितियों में भी
चढ़ रहे थे ऊपर ही 
हाँ सुना है कि 
'पच्चीस पैसे' के सिक्के का चलन
हो जाने वाला है बंद 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

लीक


नहीं रहेगी 
अब लीक 
क्योंकि 
नहीं रहेगी मिटटी नरम
जिस पर बने कोई पहचान

अब बैलों के खुर
और बैलगाड़ियों के पहिये
दोनों ही नहीं रहेंगे
फिर कैसे बनेगी
गाँव  की पगडंडियों  पर
कोई लीक

लीक
जो प्रतीक थी 
विश्वास की
जिसे पकड़
आँखें मूँद
पहुँच जाया करते हैं
बैल अपने घरों तक
विश्वास के  साथ ही
मिट जायेंगे

उनके लिए
जिन्होंने कभी नहीं माना
हाथ की लकीरों को
मिट्टियों में सने
पसीने से लथपथ
आत्माओं के लिए
लीक
होती थी
भविष्य की रेखाओं सी 

बदलते समय के साथ 
मिट जायेगी 
गाँव की  सड़क की लीक 
फिर भी क्या
लीक से हट सकेंगे
गाँव/देश/समाज/दुनिया 
अपनी सोच में

कच्ची सड़कों  पर
बनाने वाला लीक 
बनाता  था
ह्रदय पर भी
पूरी संवेदना के साथ
मिटटी की महक के साथ
जिसमे संघर्ष तो होता था 
नहीं था अविश्वास
 

एक लीक 
बनाई थी  मैंने 
अपने ह्रदय में 
कि  आएगा कोई 
पहचान कर 
मिटटी और इसकी महक 
प्रतीक्षारत है लीक 
और रहेगी
मिटटी के न रहने तक भी . 

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

खिडकी से समय

खिडकी से
जो रोशनी आती है 

छनकर
लाती है अपने साथ
एक टुकड़ा समय

पसर जाता है समय
कमरे भर में
चढ़ जाता है वह
छत से टंगे पंखे पर
पंखा घूमने लगता है
पूरी गति  से
मानो धरती से हो
कोई होड़

समय उछल कर
घुस जाता है
टूटी अलमारी  में
जहाँ पड़ी  हैं
पुरानी तस्वीरों की गठरी
जिसमे हैं दादा दादी
दादी तस्वीर में भी है
दादा से हाथ भर दूर
दादी पूछती है हाल
और श्वेत श्याम तस्वीर से भी
चमक उठता है 

उनकी आँखों में इन्द्रधनुष
सातों रंग जिन्दा हो उठते हैं

समय उड़ कर
बैठ जाता है
दीवार पर टंगे
'सुभाष चन्द्र बोस' के  पोस्टर पर
जिस पर जम चुकी है 
धूल की कई कई परतें
इस बार जयन्ती पर भी
नहीं झाडी गई धूल
थोडा उदास हो जाता है समय

लगता है
मनाया गया है
किसी का जन्मदिन
दीवार पर अब भी चिपकी हैं
चमकीली झंडियाँ
खो जाता है समय
इनकी  झिलमिल में


शोर है
 कमरे में बहुत तेज़
रीमिक्स संगीत का
जिससे डर कर समय 

जाता है लिपट
किवाड़ के पीछे रखे
क्रिकेट के बल्ले  से
बल्ला देखने लगता है सपने
पैसा, आटोग्राफ, लड़की

आशंकित हो उठता है 

इस बार समय
तभी खींच दिया जाता है
खिड़की पर परदा
पसर जाती है
कृत्रिम रोशनी और छद्मता .



असहाय है समय .

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

सपनों को दिखा दो सूरज


स्वप्न 
सदियों से
तुम्हारी आँखों में
जो पल रहे हैं
इतिहास होने से पहले
उन्हें एक बार
सूरज दिखा दो

सपनो का 
होता है अपना भूगोल
अपनी दिशाएं 
अपने मौसम 
जो निर्भर होते हैं
मन के भीतर बहने वाली 
हवाओं पर

धूप में बिछा दो 
मन की चटाई
और उलट पुलट लो
सोते सपनो को
सील गए हैं
दबे दबे 
ह्रदय की  दीवारों के
किसी कोने में

लगने दो वसंती हवा
कि खिल उठेंगे
उनके मुरझाये रंग
और बोल पड़ेंगे
सोये हुए ज़ज्बात
थोड़ी साँसे मिल जाएँगी
सपनों को भी

दे दो
कुछ पंख चुनकर
जो छोड़े थे कबूतरों ने
सपनों को
भरने को उड़ान
उन्मुक्त आकाश में
करने दो
सफ़ेद सेमल के फाहों से तैरते
बादलों से मन की बातें

देर तक
रखने से बंद
अँधेरे कोठरी में 
या फिर प्राचीर के विस्तार में भी 
घुट सकता है दम
फिर ये तो सपने हैं
नाजुक से गौरैया के
नए पंख वाले बच्चों की तरह
छोड़ दो उन्हें स्वछन्द 
एक बार के लिए 

आँखों के 
सपनों को 
दिखा दो सूरज