बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

इन दिनों


इन दिनों
कुछ अजीब सा लगता रहता है
भीतर ही भीतर
यह परेशान भी
नहीं करता
ना कम हुई है भूख
ना ही रूचि
कि दिखा लू
किसी डाक्टर को

निराशा के भाव भी
नहीं हैं
ना ही है कोई प्रवृत्ति
आत्महत्या की 

अवसाद के फैशन से भी 
नहीं हूँ 
ग्रस्त 

आज ही सुबह
लग रहा था मानो कोई
घर के पीछे
सिसक रहा हो
रो रहा हो
पुकार रहा हो
और मैं भाग रहा हूँ
उस से दूर
देखा तो पाया कि
भ्रम था मेरा
हां गुलाब जरुर खिल गया था
गमले में
और तोड़ लाया मैं उसे
पत्नी को देने के लिए उपहार
'रोज़ डे' यानी गुलाब दिवस के अवसर पर

एक दिन
लगा  कि एक बच्चा आ गया है
मेरी सायकिल के नीचे
जबकि सायकिल में लगे थे
रोड रोलर के पहिये
बच्चा दबा जा रहा है
पहिये के नीचे
चिपक कर विकृत हो गया है
उसका चेहरा
उसकी देह
मैंने सायकिल रोक दी
देखे अपने पहिये
सामान्य ही दिखे
साइकिल के कैरियर पर बैठा
मेरा बेटा मुस्करा रहा था
भोलेपन से
और झुक गई साइकिल एक ओर 

उम्मीदों के भार से . 

अब कल ही की बात देखिये
अखबार पढ़ते हुए
अचानक लगा
ढह गया है कुछ
भरभरा कर
गर्द का गुबार छा गया है
आसमान में
लेकिन कुछ कहाँ था ऐसा
सब कुछ सामान्य था
अखबार के सभी पृष्ठ रंगीन थे
देश के तमाम सूचकांक
विपरीत परिस्थितियों में भी
चढ़ रहे थे ऊपर ही 
हाँ सुना है कि 
'पच्चीस पैसे' के सिक्के का चलन
हो जाने वाला है बंद 

34 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल करते हैं अरुण जी…………कहाँ कहाँ पहुंच जाते हैं……………मानव मन की अनुभुतियों को उकेरना कोई आपसे सीखे………………ऐसा होता है सबके साथ और उसे आपने शब्दो मे पिरो कर सार्थक कर दिया। बेहद उम्दा अभिव्यक्ति।

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (10/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  3. इन दिनों
    अघटित भी देख लेता हूँ
    मानव हूँ ना
    एक रेखा खींच लेता हूँ

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  4. अनूठे शब्द बिम्ब प्रस्तुत किये हैं आपने...वाह...अद्भुत रचना...
    नीरज

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  5. अरुण जी
    आज की कविता के बारे में गहरे से सोचना पड़ेगा .....अब कमेन्ट बाद में करूँगा ...

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  6. देश में हो रही दुखद एवं अफसोसजनक घटनाएं मन में एक दुःख उत्पन्न कर रही हैं...

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  7. आसपास घट रही दुखद घटनाये संवेदनशील ह्रदय को ऐसे ही छलनी कर देती हैं..
    मार्मिक अभिव्यक्ति.

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  8. बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति.....अरुण जी

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  9. बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

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  10. सुंदर अतिसुन्दर , कई अर्थों को अपने में समाये हुई रचना, बधाई

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  11. असहज से और अधिक असहज होता जा रहा है जीवन .जहाँ अवसाद तो है ,पर अपरिभाषित ही है.सुन्दर अभिव्यक्ति .

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  12. बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति|धन्यवाद|

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  13. चवन्‍नी, मानों चलती जिन्‍दगी का घूमता पहिया.

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  14. • साहित्य और मनुष्य में आस्था रखने वाले कवि समय के साथ कम हो रहे हैं। आज अधिकांश कवि कविता को तकनीक समझते हैं, जैसे मशीन हो कविता, बटन ऑन किया और निकल गई कविता। आप इसके विरुद्ध, अपनी पूरी बनावट और बुनावट ... और भंगिमा में कवि हैं। कविता के प्रति आपकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध रही है। इस पतनशील समय में, अनावश्यक ठहराव के विरुद्ध और भौतिक अवमूल्यन के विरुद्ध यह कविता आवाज़ लगाती प्रतीत हो रही है। मथने और सचेत करने वाली यह प्राणवान कविता और इसके भीतर की तरलता और उदासी बहुत देर तक हमारा पीछा करती है।

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  15. अनूठे शब्दों से सजी संवेदनशील रचना .....

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  16. मन सहज कर लें, मन आशंकायें भी देता है और दिशाहीनता भी।

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  17. सुन्दर रचना ...बहुत विचारों की उथलपुथल...सुन्दर अभिव्यक्ति ..आज का आदमी डरा हुवा है- अवचेतन मन ... ऐसा कुछ दिखाती है...

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  18. बहुत अच्छी लगी रचना , वो मन भोले बच्चे सा कुछ बोलता है ..सबको सुनाई भी कहाँ देता है ....

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  19. मेरी सायकिल के नीचे
    जबकि सायकिल में लगे थे
    रोड रोलर के पहिये
    बच्चा दबा जा रहा है
    पहिये के नीचे
    चिपक कर विकृत हो गया है
    उसका चेहरा
    उसकी देह
    मैंने सायकिल रोक दी


    लगता है चीजें अपनी वास्तविकता से पीछे हट रही हैं और उनका जो अभिप्राय लिया जाता है ..वो आज नहीं लिया जा रहा है ....साईकिल के पहिये का रोड रोलर के पहिये में तब्दील होना ....और मेरे द्वारा बच्चे को दबा देना ..दोनों बातें बदलते मानव मूल्यों का प्रतीक है....आपका आभार अरुण जी

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  20. एक संवेदनशील मन की गहन अनुभूतियों को शब्दों में कुशलता से सजाया है.

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  21. जब इंसान की कीमत ही चवन्नी भर रह जाए और रहनुमाओं की गिनती ही करोड‌ की ईकाई से प्रारम्भ हो तो ऐसे में चवन्नी रहे या जाये किसे फ़र्क पड़ता है..
    हाँ! फ़र्क पड़ता है मेरी माँ को जो आज भी बच्चों की सेहत और सफलता के लिये मान लेती है सवा रुपये का प्रसाद!!

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  22. इस कविता के बिम्ब को पढ़ते हुए लगता है की अभिधा में प्रकट भाव बहुत शक्तिशाली है

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  23. Arun sir...nazm ne shuru me ek alag tarah ki anjani bechain kee nabz tatolne ki koshish hai...ek cheez aapne ghazab kahee 'avsaad ka faishon'... As usual nazm bina shor sharabe ke khatm hoti hai aur ek aisi sadharan si pratit hone wali wajah dikhati hai jisme kai dashakon ka itihas chhipa hai... :)

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  24. कुछ था भीतर जो पिघला रहा था
    पर कुछ था जो निकल भी नहीं रहा था...
    वाह... आप धन्य हैं...

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  25. प्रियवर अरुण चन्द्र रॉय जी
    नमस्कार !

    अच्छी रचना है… हमेशा की तरह ।

    भावुक मन की उल्झनों को काव्य में साकार कर दिया आपने …
    होता है ऐसा सबके साथ

    मैं जानता हूं यह आपका शैल्पिक चमत्कार ही है
    फिर भी कभी यह गीत सुन लिया करें
    जब चारों तरफ़ अंधेरा हो …
    प्रार्थना कर जगत के पालनहारे से …

    सच , बहुत सुकून मिलता है …

    बसंत पंचमी सहित बसंत ॠतु की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  26. बहुत सी अनुभूतियों को परिभाषित करती रचना !
    सशक्त रचना !

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. बहुत खूबसूरत लिखा है...
    पढ़ने में बहुत अच्छा लगा..बहुत अच्छे भावों में सजी रचना...

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