गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

खिडकी से समय

खिडकी से
जो रोशनी आती है 

छनकर
लाती है अपने साथ
एक टुकड़ा समय

पसर जाता है समय
कमरे भर में
चढ़ जाता है वह
छत से टंगे पंखे पर
पंखा घूमने लगता है
पूरी गति  से
मानो धरती से हो
कोई होड़

समय उछल कर
घुस जाता है
टूटी अलमारी  में
जहाँ पड़ी  हैं
पुरानी तस्वीरों की गठरी
जिसमे हैं दादा दादी
दादी तस्वीर में भी है
दादा से हाथ भर दूर
दादी पूछती है हाल
और श्वेत श्याम तस्वीर से भी
चमक उठता है 

उनकी आँखों में इन्द्रधनुष
सातों रंग जिन्दा हो उठते हैं

समय उड़ कर
बैठ जाता है
दीवार पर टंगे
'सुभाष चन्द्र बोस' के  पोस्टर पर
जिस पर जम चुकी है 
धूल की कई कई परतें
इस बार जयन्ती पर भी
नहीं झाडी गई धूल
थोडा उदास हो जाता है समय

लगता है
मनाया गया है
किसी का जन्मदिन
दीवार पर अब भी चिपकी हैं
चमकीली झंडियाँ
खो जाता है समय
इनकी  झिलमिल में


शोर है
 कमरे में बहुत तेज़
रीमिक्स संगीत का
जिससे डर कर समय 

जाता है लिपट
किवाड़ के पीछे रखे
क्रिकेट के बल्ले  से
बल्ला देखने लगता है सपने
पैसा, आटोग्राफ, लड़की

आशंकित हो उठता है 

इस बार समय
तभी खींच दिया जाता है
खिड़की पर परदा
पसर जाती है
कृत्रिम रोशनी और छद्मता .



असहाय है समय .

33 टिप्‍पणियां:

  1. ye ashay samay ! kitni udaane bharta hai , yaadon ki kitni salwaten sidhi ker jata hai

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  2. aaj se pahle kabhi kabhi maine aapki nazm ka koi khaas hissa nahi chuna,,poori nazm sahi hai ,.... samay kee viklangata batati hui

    शोर है
    कमरे में बहुत तेज़
    रीमिक्स संगीत का
    जिससे डर कर समय
    जाता है लिपट
    किवाड़ के पीछे रखे
    क्रिकेट के बल्ले से ( yahaan se jo transition hua cricket kee shohrat kee taraf,...adbhut hai wo arun hats offff.......)
    बल्ला देखने लगता है सपने
    पैसा, आटोग्राफ, लड़की

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  3. इस कविता ने बहुत से मुडाव देखें है अपने स्ट्रोक के साथ.मुझे ये ठीक बात जान पड़ती है, कविता अपनी गति के साथ ही पाठकों को बराबर स्ट्रोक करती है.एक कविता जब तब दिमाग को हिलाने की बात सोचती है तब ही कविता में नई जान आती है,उम्र बढ़ जाती है उसकी .कवि लिखते लिखते खुद सोचता है कि कब समय ढंग की चाल चले और रचना में स्ट्रोक आ जाए. बेहतर कविता........आज का समय बहुत कुछ कहता रहता है,ये अलग बात है कि इन्हें अरुण बाबू सुनते ही कविता करते हैं.वाह.अगली रचना के और बेहतर होनी बाट जोहता हूँ.

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  4. बल्ला देखने लगता है सपने
    पैसा, आटोग्राफ, लड़की


    व्यक्ति जब किसी शोहरत को पा लेता है तो उसका झुकना ठीक बनता है .....लेकिन आज कुछ उल्ट दिखाई देता है ...आपने बिलकुल पहचान लिया जी ...आपकी नजर को सलाम ....शुक्रिया

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  5. तिरोहित होते आदिम संस्कार..... आज चीजें हो गयी हैं प्रेम करने के लिए और आदमी (दुर)उपयोग करने के लिए.... ऐसे में कवि की चिंता वाजिब लगती है. अधिकतम उपभोक्तावाद का नारा देकर अधिकतम उफोगवाद पर उतरी पीढ़ी को देख कर वह समय उदास ही होगा जिसने कभी 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसे गौरवपूर्ण मन्त्र का साक्षी रहा है.

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  6. बहुत खूब .... समय का फेरा भी खूब है ... आता है और फिर पसर जाता है इधेर उधर ...
    बहुत लाजवाब रचना है ...

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  7. dhoop ke sath aata samay apne hi khatm hone ke samay se anjan hai par yadon ke jin galiyaron me vah samay milane par ghoom aata hai vahi uska sarthak samay hai...aur ye galiyare chhadm nahi asali hai jeevan ki dharohar hai...bahut sunder rachana...

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  8. आज टिप्पणी में एक मुक्तक

    प्रकृति ने भाषा बदल दी व्याकरण खतरे में है,
    आदमी ख़तरे में है, पर्यावरण ख़तरे में है।
    रह रहे हैं लोग अब ख़ुद की बनी भूगोल में,
    सिर्फ़ दर्पण ही नहीं अन्तःकरण ख़तरे में है।

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  9. डॉ. राही मासूम रज़ा का समय अपनी गहरी आवाज़ में कहता था "मैं समय हूँ" और सारा देश थमकर देखने लगता था उस गुज़रे समय को जो आज भी उतना ही रेलेवेण्ट है जितना तब था.
    आज आपने दिखाया एक डरा हुआ समय, किवाड़ और आलमारी के पीछे छिपता समय! मान्यताओं और परम्पराओं के ह्रास से डरा समय!!

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  10. सच में इस बनावटी जीवन में असहाय है समय .....

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  11. बहुत ही अच्छी रचना.
    शुभ कामनाएं

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  12. हर बार कुछ अलग अंदाज कुछ अलग अहसास से भरी होतीं हैं आपकी कवितायेँ बधाई

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  13. आज ४ फरवरी को आपकी यह और" खिडकी से समय " सुन्दर भावमयी विचारोत्तेजक पोस्ट चर्चामंच पर है... आपका धन्यवाद ..कृपया वह आ कर अपने विचारों से अवगत कराएं

    http://charchamanch.uchcharan.com/2011/02/blog-post.html

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  14. समय उछल कर
    घुस जाता है
    टूटी अलमारी में
    जहाँ पड़ी हैं
    पुरानी तस्वीरों की गठरी
    जिसमे हैं दादा दादी
    दादी तस्वीर में भी है
    दादा से हाथ भर दूर
    दादी पूछती है हाल
    और श्वेत श्याम तस्वीर से भी
    चमक उठता है
    उनकी आँखों में इन्द्रधनुष
    सातों रंग जिन्दा हो उठते हैं

    कविता में समय सजीव हो उठा है।

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  15. जिसमे हैं दादा दादी......दादी तस्वीर में भी है........दादा से हाथ भर दूर...............
    दादी पूछती है हाल...........और श्वेत श्याम तस्वीर से भी............चमक उठता है ...........उनकी आँखों में इन्द्रधनुष

    यार अरुण, दादा दादी का ऐसा प्यार बखानती कविता शायद पहली बार ही पढ़ रहा हूँ मैं और अंदर ही अंदर ईर्ष्या भी हो रही है तुमसे...........क्या लिखते हो यार.........बहुत खूब|

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  16. बहुत खूब , ये समय की फितरत भी आदमी सी है ...

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  17. तभी खींच दिया जाता है
    खिड़की पर परदा
    पसर जाती है
    कृत्रिम रोशनी और छद्मता
    असहाय है समय .

    सचमुच समय अपने सच्चे रूप में, शायद ही कभी नज़र आए...
    कुछ सोचने को विवश करती कविता

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  18. जो चित्र आपने उकेरा है शब्दों के माध्यम से ...मन में सन्नाटा सा पसर गया है...

    कुछ कहते नहीं बन रहा...आह,वाह..कुछ भी नहीं...

    ऐसे ही सार्थक सुन्दर लिखते रहें...

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  19. पसर जाता है समय
    कमरे भर में
    चढ़ जाता है वह
    छत से टंगे पंखे पर
    पंखा घूमने लगता है
    पूरी गति से
    मानो धरती से हो
    कोई होड़

    समय की जीवंत प्रस्तुति वाह..... शब्द नहीं हैं हमारे पास इस रचना की प्रशंसा के लिए, ऐसे ही सार्थक सुन्दर लिखते रहें..

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  20. समय के लिए शो के बीच एक ब्रेक.

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  21. असहाय है समय .

    मगर कब तक?

    जब उसका समय आता है

    तब तक दृश्य बदल जाता है

    और फिर समय बलवान हो जाता है


    सब समय की ही बात होती है…………भावों को यथार्थ के धरातल पर बखूबी उतारा है।

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  22. बहुत खूबसूरत..समय का क्या कहना..कहाँ कहाँ ले जाता है.

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  23. सुन्दर अभिव्यक्ति ..समाया का अच्चा मूल्याङ्कन, गहरे तक उतरने की बात बधाई

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  24. सुंदर रचना ....समय के बहाने ... समय की कहानी में झाकना

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  25. आदरणीय अरुण चन्द्र रॉय जी
    नमस्कार !
    समय उड़ कर
    बैठ जाता है
    दीवार पर टंगे
    'सुभाष चन्द्र बोस' के पोस्टर पर
    .......कुछ सोचने को विवश करती कविता
    जिस पर जम चुकी है
    धूल की कई कई परतें
    इस बार जयन्ती पर भी
    नहीं झाडी गई धूल
    थोडा उदास हो जाता है समय

    उत्तर देंहटाएं
  26. अरुण जी, सच ही कहा है उड़ता है समय. पर मुझे तो बहुत अच्छा लगता है इसका उड़ना बिना पंख कहीं भी कभी भी पहुँच जाना बुलाये, बिन बुलाये. आप के समय के साथ मैं भी घूम आई हूँ कितने ही जहान

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  27. समय कहाँ असहाय है .बीतने के बाद भी तो बचा रहता है हमारी स्मृति में .अति सुन्दर कविता .

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  28. समय उछल कर
    घुस जाता है
    टूटी अलमारी में
    जहाँ पड़ी हैं
    पुरानी तस्वीरों की गठरी
    जिसमे हैं दादा दादी
    दादी तस्वीर में भी है
    दादा से हाथ भर दूर
    दादी पूछती है हाल
    और श्वेत श्याम तस्वीर से भी
    चमक उठता है
    उनकी आँखों में इन्द्रधनुष
    सातों रंग जिन्दा हो उठते हैं

    समय का मानवीयकरण इतना जीवंत और अदभुत है कि बस वाह वाह .....

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  29. लगता है
    मनाया गया है
    किसी का जन्मदिन
    दीवार पर अब भी चिपकी हैं
    चमकीली झंडियाँ
    खो जाता है समय
    इनकी झिलमिल में

    pasand aai...

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