शनिवार, 25 अप्रैल 2015

मृत्यु

कैसी होती है मृत्यु
कैसा होता है इसका स्वाद 
क्या होता है इसका कोई रूप भी 
क्या देता है यह निर्वाण 
कैसा सुख है इस  में 
जो करता है  बंधनो से मुक्त 
कितनी पीड़ा देता है  
जो होती है कोई प्रतीक्षा 
या विछोह ही।  

प्रेम भी तो मृत्यु ही है 
रहस्य से भरा 
रहस्यहीन  भी।  

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

भगवा रंग

पत्तों का रंग 
अचानक हो गया है 
भगवा 

हो गए हैं 
अन्न के दाने 
भगवा 

यों तो 
नहीं होता रंग कोई 
पानी का 
फिर भी आभास हो रहा है 
पानी का रंग 
भगवे सा 

सूर्योदय और सूर्यास्त के रंग से 
भिन्न है यह रंग 
और राष्ट्रीय ध्वज में जो है रंग 
उसकी भावना से मेल नहीं खाता यह 

इस रंग से बू आती है 
जलते हुए मांस की और 
रक्त के खदकने का स्वर भी  ! 

गुरुवार, 8 जनवरी 2015


नए साल में ब्लॉग की शुरुआत कार्टून से।  बस कोशिश है।  देखते हैं दोस्तों को कैसी लगती है।


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

गृहस्थी : कुछ क्षणिकाएं




१,
आटा 
थोडा गीला
फिर भी गीली
तुम्हारी हंसी

२.
मैं 
तुम 
बच्चे , 
गीले बिस्तर की गंध 
कितनी  सुगंध 

३.
न कभी 
गुलाब 
न कोई 
गीत 
फिर भी जीवन में 
कितना संगीत 

४.
सूखी रोटी
नून 
और तेरा साथ , 
आह ! कितना स्वाद 

५.
तीज 
त्यौहार पर 
तेरा उपवास 
गरीबी को छुपाने का 
अदभुत प्रयास 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

खलिहान


धान कट कर 
आ रहे हैं खेतो से 
नहीं है खेत में 
मजूरन की लहक चहक 
वे गा नहीं रही हैं गीत
दूर कहीं सुन सकते हो
कोई गा रहा है शोक गीत 

दौनी हो रही है  
धानो की 
नहीं है लेकिन 
बैलो के गले में घंटियों का 
समवेत स्वर

किसान और उसकी औरतें व्यस्त नहीं हैं 
व्यस्त है ट्रैक्टर 
और उसके इंजन के शोर और बड़े पहियों के बीच 
दब गया है 
किसान, मजूर और खलिहान !