सोमवार, 23 जनवरी 2012

बदल गया है विजय चौक का चरित्र

विजय चौक 
वैसे तो देश में 
सैकड़ो होंगे
लेकिन  
देश का सबसे प्रतिष्ठित 
विजय चौक है 
संसद  भवन  के साथ 
राष्ट्रपति भवन के सामने
उत्तरी और दक्षिणी ब्लाक के 
ठीक सामने 
जहाँ से शुरू होता है
राजपथ 

आम आदमी की बात
होती है जहाँ से


विजय चौक के 
एक ओर 
होती है 
मीडिया की बड़ी बड़ी
गाड़ियाँ कतार में
कतार में होते हैं 
नवोदित से बड़े बड़े
पत्रकार
लपकने के लिए 
छोटी से छोटी
और बड़ी से बड़ी खबर

बीच बीच में
सन्नाटा पसर जाता है
फव्वारों पर उड़ने वाली पंछी भी
दुबक जाते हैं 
सायरन के शोर में
आम आदमी वैसे तो 
होता नहीं इस सड़क पर
लेकिन एक दो जो होते हैं
भद्दी गालियों से 
और लाल लाल पुलिसिया आँखों से
डरा कर दूर कर दिए जाते हैं
विजय चौक से 
जब गुज़रते हैं 
हमारे मत से चुने
जनप्रतिनिधि 

भागते काफिले को
पकडती  है
कैमरे की आंखे 
जोर जोर से चीखता हुआ पत्रकार 
एक्सक्लूसिव खबर देता है 
पीछे होता है संसद मौन 


यहाँ के फव्वारे 
सालो भर चलते हैं 
गरीबी रेखा के नीचे वाले
नलकूप की तरह
सूखते नहीं हैं ये

समय था एक 
जब इन फव्वारों पर
कबूतर सुस्ताते थे
प्यास बुझाते थे
बिना भय
फडफडाते थे अपने पंख 
जबकि इन दिनों 
खदेड़ दिए गए हैं 
और कौवों ने 
बना लिया है अड्डा.

29 टिप्‍पणियां:

  1. हुबहू खाका खींच दिया बदलाव का ...

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  2. जबकि इन दिनों
    खदेड़ दिए गए हैं
    और कौवों ने
    बना लिया है अड्डा.
    संसद में भी बस काँव-काँव ही होती है .. सटीक प्रस्तुति

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन!

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  4. आम आदमी की बेहतरी के लिए जिन्हें कटिबद्ध होना था वे ही आम आदमी की दुर्दशा का कारण है!
    कैसी विडम्बना है!

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  5. सार्थकता से सच्ची तस्वीर उपस्थित करती कविता के लिए बधाई!

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  6. जहां खास लोग आम आदमी की बात करते हैं... जरूरी नहीं सभी बतिआते हैं - कुछेक सो भी जाते हैं.

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  7. और कौवों ने
    बना लिया है अड्डा.behatar prastuti ! neta ji ko sat - sat naman

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  8. अरुण जी,

    बहुत दिनों बाद आज आफ़िसियली फ़ुर्सत में हूँ। आपकी कविता ने दिन भर सोचने की खुराक भी दे दी है। समाज से सापेक्षता तो आपकी कविता की विशेषता शुरी से ही रही है, आज ऐसा लग रहा है कि आपके शिल्प में भी सरलीकरण हो गया है (कहीं यह बहुत दिनों बाद आपके ब्लाग पर आने का असर तो नहीं है यह मेरे लिए?)।

    "समय था एक
    जब इन फव्वारों पर
    कबूतर सुस्ताते थे
    प्यास बुझाते थे
    बिना भय
    फडफडाते थे अपने पंख
    जबकि इन दिनों
    खदेड़ दिए गए हैं
    और कौवों ने
    बना लिया है अड्डा."

    यूँ तो इस कविता में आप राइट फ़्राम द वेरी फ़्रस्ट बाल शानदार खेल रहे हैं लेकिन आखिरी गेंद पर क्या जोरदार विनिंग सिक्सर मारा है। कायल हो गया हूँ इस व्यंग्य का।

    धन्यवाद स्वीकार करें !

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  9. सार्थक व सटीक अभिव्‍यक्ति ।

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  10. कौवो ने बना लिया है अड्डा ... सच कहा है अब बेचारे कबूतर कहें नज़र नहीं आते बस कांव कांव ही नज़र आती है ... दूर दृष्टि ..

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  11. ऐसे अनेक बदलाव आ रहे हैं देश के वातावरण में जो किसी भी दृष्टि से चिंताजनक हैं ...

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  12. कविता की शुरूआत अच्‍छी है। कविता भी बहुत कुछ कहती है। पर
    यहाँ के फव्वारे....से .....बना लिया है अड्डा... तक की पंक्तियों की जरूरत ही नहीं है। वास्‍तव में ये पंक्तियां एक नई कविता का आरंभ हैं।

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  13. विजय चौक का इतना सुंदर और ऐतिहासिक विवरण सुंदर कविता के माध्यम से बहुत बढ़िया लगा. बधाई.

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  14. kavita ne achanak mod liya aur ek sachchi haqueekat kah gayee...sundar rachna..

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  15. दुखदायी परिवर्तन ....!!
    बीते हुए दिन याद दिला दिए आपने ....दिल्ली आने की ,विजय चौक देखने की इच्छा प्रबल हो गयी ...

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  16. करण समस्तीपुरी ने आपकी पोस्ट " बदल गया है विजय चौक का चरित्र " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    अरुण जी,

    बहुत दिनों बाद आज आफ़िसियली फ़ुर्सत में हूँ। आपकी कविता ने दिन भर सोचने की खुराक भी दे दी है। समाज से सापेक्षता तो आपकी कविता की विशेषता शुरी से ही रही है, आज ऐसा लग रहा है कि आपके शिल्प में भी सरलीकरण हो गया है (कहीं यह बहुत दिनों बाद आपके ब्लाग पर आने का असर तो नहीं है यह मेरे लिए?)।

    "समय था एक
    जब इन फव्वारों पर
    कबूतर सुस्ताते थे
    प्यास बुझाते थे
    बिना भय
    फडफडाते थे अपने पंख
    जबकि इन दिनों
    खदेड़ दिए गए हैं
    और कौवों ने
    बना लिया है अड्डा."

    यूँ तो इस कविता में आप राइट फ़्राम द वेरी फ़्रस्ट बाल शानदार खेल रहे हैं लेकिन आखिरी गेंद पर क्या जोरदार विनिंग सिक्सर मारा है। कायल हो गया हूँ इस व्यंग्य का।

    धन्यवाद स्वीकार करें !

    उत्तर देंहटाएं
  17. कबूतरों के स्थान पर आसीन होते कौवे.. बस इन दो प्रतीकों में सारी बात समेट दी है आपने.. कुछ भी कहना शेष नहीं!! शानदार!!

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  18. कबूतर की जगह कौवों ने अड्डा जमा लिया है...!
    सच्चाई उतर आई है पंक्तियों में।

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  19. बदलाव का सटीक व सार्थक विश्लेषण किया है आपने इस प्रभावी रचना में जो दृश्य सा गुजरता है ..आपका आभार..

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  20. bilkul sach... din badle ... to fizayen bhi badli.... !! vijay chauk ka rutba bhi badla..

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  21. बहुत सटीक और सुन्दर प्रस्तुति..

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  22. सत्य इतनी शालीनता और सुन्दरता से चित्रित किया सटीक

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  23. क्या कहूँ.....

    बहुत ही सटीक...

    एक अपार पीड़ादायक सत्य...

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  24. यहाँ के फव्वारे
    सालो भर चलते हैं
    गरीबी रेखा के नीचे वाले
    नलकूप की तरह
    सूखते नहीं हैं ये....
    ...
    आपकी शैली में एक करारी चोट इस बार विजय चौक फ़तेह !

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