गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

रात के एक बजे


ऐसा भी कहीं 
होता है किसी कविता का 
शीर्षक  
'रात को एक बजे'
लेकिन हो भी सकता है
क्योंकि
जिंदगी घूमती है
उसी रफ़्तार से 
रात के इस पहर में भी
हाँ ! एक बजे 

ठेले वाले 
जो लगाते हैं 
अपनी रेहड़ी देर रात तक 
किसी मीडिया हाउस के बाहर
वहां चौदह साल से  कम का एक बच्चा 
धो रहा होता है
जूठी प्लेटें उन मीडियाकर्मियों की 
 जो अभी अभी तैयार  करके आयें है 
बाल श्रम पर एक सनसनीखेज स्टोरी 
रात के एक बजे 

पाण्डेय जी 
जो आयें थे गाजीपुर से 
आई ए एस  की तैयारिओं के लिए 
अपने वंशानुगत संस्कारों
और ढेर सारी पुस्तकों के साथ 
कहते फिरते हैं 
हो गए शिकार 
नई आरक्षण नीति के ,
वे बांटते हैं इन दिनों खबर 
हिंदी, अंग्रेजी और लोकल भाषा में 
उठ चुके हैं और साइकिल पकड़ 
चल दिए  हैं लेने सुबह का अखबार 
रात के एक बजे 

आखिरी शो के बाद 
खाली हुए मल्टीप्लेक्स से
चुने जा रहे हैं 
पॉपकार्न के खाली डिब्बे और
कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलें 
हो रही है फर्श की  सफाई 
और इन सब में लगे भिड़े 
युवा हाउसकीपिंग स्टाफ की  आँखों में 
जाग रहे होते हैं सपने 
रात के एक बजे 

वे जो 
देश के प्रतिष्ठित अभियांत्रिकी  कालेज से निकल
इन दिनों किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के  सी ई  ओ हैं 
उन्हें लेनी है सुबह की पहली फ्लाईट  
वे भी जाग  चुके हैं 
कर रहे हैं जरुरी मेल
दे रहे हैं अपने दफ्तर को  निर्देश 
निपटा रहे हैं अर्जेंट फ़ाइल 
और बाहर पोर्टिको में ऊँघता उनका ड्राइवर 
कर रहा है  इन्तजार 
रात के एक बजे 

इन सब के बीच 
मेरी नींद जो चली गई है 
तुम्हारे साथ ही 
तुम्हारे आँचल से लिपट
मैं भी जगा हूँ 
सुन रहा हूँ 
सिक्योरिटी गार्ड की चहल कदमी
रुक रुक कर आती जाती गाड़ियों का शोर 
दीवार  घडी  के चलने की टिक टिक 
और भी बहुत कुछ
जो अमूमन दिन में सुनाई नहीं देता  
रात के एक बजे 

34 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण -सुबह की शुरुआत इतनी अच्छी कविता से हो रही है और मैं तुम्हारे कवि में एक नया अरुणोदय डैक पा रहा हूँ

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  2. बस, मन के कान खुले होने चाहिए.

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  3. अरुण जी,
    आपकी कविता हमेशा आम आदमी के आस पास घूमती है !
    रात को एक बजे संवेदना की वो सारी आवाजें सुनाई देती हैं जो दिन के शोर में अक्सर खो जाया करती हैं !
    आपकी गहन सोच इस कविता में नए विम्बों के साथ एक नई रोशनी पैदा कर रही है !
    आभार !!

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  4. कमाल का अवलोकन.... और उसका सुंदर शाब्दिक प्रस्तुतीकरण

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  5. आम आदमी की दिनचर्या ही नही रातचर्या का भी क्या खूब चित्रण किया है…………आपकी सोच को नमन है…………आप इसी तरह लिखते रहें ये ही दुआ करती हूँ ………………कविता ने तो जो असर किया है उसे शब्दो मे व्यक्त करना मुश्किल है।

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  6. रात के एक बजे की ज़िन्दगी ... कितनी आम हो गई है ना ..और जो सन्नाटा था वो शायद कही भी नहीं बाकी रहा

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  7. सब कुछ रात के एक बजे के बाद यह तो सही है .... लेकिन आपकी कविता कुछ ज्वलंत मुद्दों की तरफ भी ध्यान आकर्षित करती है ..जैसे
    किसी मीडिया हाउस के बाहर
    वहां चौदह साल से कम का एक बच्चा
    धो रहा होता है
    जूठी प्लेटें उन मीडियाकर्मियों की
    जो अभी अभी तैयार करके आयें है
    बाल श्रम पर एक सनसनीखेज स्टोरी
    क्या विरोधभास है ....रात के एक बजे ....

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  8. aur..
    raat barah baje mobil bola..
    Mr. loco pilot...G.N.SHAW..
    garib rath..secunderabad..ke liye...bulaye..
    aa ja duty me..
    raat ek baje.......,
    bahut sundar ...dhanyabad..kamal ke ek baje.ham to isake aadi hai.

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  9. रचना दिमाग पर ऐसे छा गयी है, दृश्य और विचारों ने ऐसे मन को घेर लिया है कि पूर्ण रूपेण निःशब्दता की स्थिति बन गयी है...सो क्या कहूँ अब ??????

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  10. वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने ...

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  11. Yah kavita mahanagariya jeevan shaili ke bahane samaj ki kai visantiyon ki nabz pakadti hai..umdar rachna hai arun sir...

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  12. वैसे कविता का शीर्षक तो कुछ भी हो सकता है.कवि की कल्पना की कोई सीमा नहीं.परन्तु आपकी इस रात के १ बजे ने कईयों के १२ बजा दिए हैं.
    बढ़िया व्यंगात्मक कविता.

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  13. किसी के हिस्से में प्यास आयी... किसी के हिस्से में जाम आया ! परिस्थितिजन्य जीवन के मशीनीकरण पर तीक्ष्ण व्यंग्य है !!! धन्यवाद !!!!

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  14. बहुत ही अच्छा प्रस्तुति..
    रात्री ज़िन्दगी को खूब दर्शाया है आपने अलग-अलग ऐंगल से..

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  15. apne isko likha kab.........ye to bata do...sure raat ke ek baje...ya dopahar me ek baje..:)

    ek umda rachna fir se....:)

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  16. कहते हैं महानगर कभी नहीं सोता, लिहाजा ए.एम. और पी.एम. से कोई फ़र्क नहीं पड़ता.. आपकी सम्वेदनशीलता दिख रही है हर पंक्तियों में..
    हाँ यादें तो घड़ी और कैलेंडर देखकर नहीं आतीं..

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  17. फिल्म 'चमेली' याद आ गयी...जो एक रात की ही कहानी थी...

    जब बाकी लोग चैन से सो रहे होते हैं....क्या क्या ना होता है रात के एक बजे.

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  18. जीवन की आपाधापी ने लो्गों ने घड़ियाँ गिनना छोड़ दिया है। बस यंत्र वत चलते रहना है।

    लेकिन रात 1 को भी बजना है, याद दिलाना है तुम मशीनी रोबोट नहीं, हाड़ मांस के आदमी हो।

    कुछ तो सोचो! रात 1 बजे सो जाए करो।

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  19. परिस्थितिजन्य जीवन के मशीनीकरण पर तीक्ष्ण व्यंग्य है|
    बेहद खूबसूरत प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  20. समाज की समस्याएं बहुत बारीकी से देखते हो अरुण ! आपको हार्दिक शुभकामनायें !

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  21. भाव भी अक्‍सर कविता बनने के लिए रात एक बजे का इंतजार करते हैं.

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  22. एक बजे के कितने ही रबंग बिखेर दिए हैं आपने अपनी रचना में...बधाई स्वीकारें...
    नीरज

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  23. अरुण जी, आपकी इस कविता के नामाकरण से लेकर उसकी अंतर्वस्तु में निहित कथ्य तक कविता को एक नया संस्कार देते हैं।
    आपकी इस कविता में कथ्य और संवेदना का सहकार है, जिसका मकसद है यह संसार व्यवस्थित और समरूप हो!
    आपकी कविता न तो जनवादी तेवर है और न ही प्रबल कलावादी आग्रह। इसमें निजी चित्तवृत्ति से लेकर समूची सामाजिकता में आवाजाही है।

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  24. अज कल तो हर ज़िन्दगी मे शायद एक बजे का महत्व बढ गया है। बहुत अच्छी कविता। बधाई।

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  25. ठेले वाले
    जो लगाते हैं
    अपनी रेहड़ी देर रात तक
    किसी मीडिया हाउस के बाहर
    वहां चौदह साल से कम का एक बच्चा
    धो रहा होता है
    जूठी प्लेटें उन मीडियाकर्मियों की
    जो अभी अभी तैयार करके आयें है
    बाल श्रम पर एक सनसनीखेज स्टोरी
    रात के एक बजे

    संवेदना के धरातल पर बहुत मार्मिक तथा सच्चाई से लबरेज़ कविता. शीर्षक भी बहुत चुना हुआ है. बधाई आपको.

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  26. वो बहुत कुछ जो दिन के उजालों में नहीं हो सकता था रातों को ही होता था कभी. पर आज तो रात और दिन में कुछ अंतर ही नहीं रहा. सब कुछ सब की आँखों के सामने ही घटता है पर दिखाई देता है किसी किसी को जब जहाँ फायदा हो. बेहतरीन हमेशा की तरह

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  27. rat ke 1 baje sote jagat me bhi aapki samvedanao ka is tarah jage hona sukhad hai...aapne mashini tareeke se kam me lage logo ke liye jo samvedana jagayee hai bahut achhi ban padi hai...

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  28. दुनिया २४ घंटे चलती रहती है और जिंदगी भी ... फिर रात के एक बजे अ दोपार के एक ... क्या फर्क पढता है म्हणत करने वाले को .....

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  29. बढ़िया व्यंगात्मक कविता

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  30. आपके विषय बहुत प्रभावित करते हैं ......
    और आपकी लेखन सैली तो कमाल की है .....
    रात के एक बजे कोई अनाम किसी अनामिका को ख़त भी तो लिख सकता है .......
    ):
    आपकी ये नज़्म भी अच्छी लगी .....
    हाँ अपनी क्षणिकायें भेजिए न सरस्वती सुमन के लिए .....
    परिचय और चित्र के साथ .....

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  31. किसने कहा जीवन रात को एक बजे सो जाता है।

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