मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

असंख्य शुभकामनाएं


(कल प्रेम दिवस था. आज सुबह सुबह मोहल्ले के कूड़ेदान में बिखरी हुई थी गुलाब की अनगिनत पंखुड़िया. वहीँ से जन्मी यह कविता  किसी अनामिका के लिए) 

एक गुलाब
लिया था मैंने
देने को 
उपहार 
नहीं मालूम था
नहीं करोगी तुम 
उसे स्वीकार 

बिखर गईं 
पखुडियाँ 
और हवाओं में 
 हैं बिखरी देखो 
तुम्हारे जन्मदिन की
असंख्य शुभकामनाएं
अनाम .

23 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या अन्दाज़ है जन्मदिन की शुभकामना देने का…………बहुत अच्छा लगा।

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  2. वाह नया अन्दाज़ ! अरुण जी..
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  3. वैलेंटाईन डे की हार्दिक शुभकामनायें !

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  4. ऐसा लगा जैसे सब कुछ बिखरा सा है ..अच्छी अभिव्यक्ति

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  5. पहुँच ही गयी होंगी उस तक ये शुभकामनाएं..टेलीपैथी बनकर...:)

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  6. बिखर गईं
    पखुडियाँ
    और हवाओं में
    हैं बिखरी देखो
    तुम्हारे जन्मदिन की
    असंख्य शुभकामनाएं..

    वाह आखिर हवाओं द्वारा ही सही पैगाम तो पहुँच ही गया...बहुत खूबसूरत अंदाज़ में लिखी रचना..

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  7. और एक दिन जिन्दगी भी यूँ ही अनाम गुम हो जाती है ......गुलाब की पंखुड़ी की तरह ....काश हम जी पाते इसे और दे पाते किसी को जन्मदिन की बधाई ...

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  8. क्‍या खूब दिन है जन्‍म का, पंखुडी-पंखुड़ी, गुलाब ही गुलाब.

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  9. वाह अनोखा अंदाज शुभकामनायें देने का ..

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  10. अच्छा बिम्ब खींचा गया है. छोटी मगर कविता जैसी रचना

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  11. बहुत सुन्दर अंदाज सुभकामनाएँ देने का| धन्यवाद|

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  12. ये आपकी कविता ....
    गुलाब की पंखुडियों के साथ स्थान विशेष की गंध है इस कविता में।

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  13. वाह, अपना प्यार लुटाना ही इस दिन की सार्थकता है।

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  14. वाह, अपना प्यार लुटाना ही इस दिन की सार्थकता है।

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  15. patta patta buta buta haal hamara jaane hai ,
    jaane na jaane gul hi na jaane bagh to sara jaane hai

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  16. बचपन में जब पूजा के लिए फूल तोड़ने को हम भाई बहनों को भेजा जाता था,अक्सर ही मैं रो पड़ती थी...मुझे फूलों को पेड़ से जुदा करना असह्य लगता था...

    अब और क्या कहूँ...

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  17. सुंदर कविता और आपका अपना अंदाज़. शुभकामनायें अच्छी रचना के लिए.

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