सोमवार, 7 मार्च 2011

तवा

तवा 
बदला नहीं है
रसोई में 
वर्षो से 

चढ़ा है  
रोज ही 
कई कई बार
जब तक रहा है 
सब कुछ सामान्य 
थका नहीं है कभी 
तवा 

आंच पर
चढ़ने से 
कमजोर तो हुआ ही है 
किन्तु तप कर 
कुछ अधिक ही 
हुआ है काला 
कुछ इस्पात सा 


थका नहीं है
ना कभी हुई है
कोई प्रतिक्रिया 
कठोर है
लेकिन दिखाई नहीं 
कठोरता 
हाँ ! दृढ अवश्य दिखता है 
कभी जो गौर से 
देखो इसे 

जब तक
आंच पर नहीं चढ़ता 
बहुत अकेला होता है
तवा 
सबसे अलग
सबसे भिन्न
अपने अकेलेपन को
कभी किसी से 
जताया नहीं
बांटा नहीं 
अन्य बर्तनों की तरह 
ना ही कभी खडका 

बातें करना चाहता है 
बिना आंच पर चढ़े भी 
कुछ पिता सा लगता है 
तवा , आज 

34 टिप्‍पणियां:

  1. ओह .. तवे के माध्यम से पिता के द्वारा निभाए गए कर्तव्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया है ..बहुत अच्छी रचना

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  2. आंच पर
    चढ़ने से
    कमजोर तो हुआ ही है
    किन्तु तप कर
    कुछ अधिक ही
    हुआ है काला
    कुछ इस्पात सा

    बेहतरीन रचना ....कमाल का बिम्ब लिया .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक सुन्दर बौद्धिक कविता. विम्बों में काफी नवीनता झलकती है. अभिव्यक्त भाव के लिए कहना चाहूँगा, "सुर्खरू होते हैं इंसान ठोकरे खाने के बाद ! रंग लाती है हिना, पत्थर पर घिस जाने के बाद !!"

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  4. थका नहीं है
    ना कभी हुई है
    कोई प्रतिक्रिया
    कठोर है
    लेकिन दिखाई नहीं
    कठोरता
    हाँ ! दृढ अवश्य दिखता है
    कभी जो गौर से
    देखो इसे
    bilkul... jivan chakra ke pahiye me chalte aadmi ki tarah

    उत्तर देंहटाएं
  5. बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज ...

    अंत आते आते रचना ने जो मोड़ लिया है .... Simply great ...

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  6. नए बिम्ब ..अकेलापन ,परिस्तिथियों को झेलने का माद्दा ,कमजोर पर दृढ ..बहुत खूब

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  7. झकझोर गयी आखिरी पंक्तियाँ....कविता दुबारा पढ़ने को बाध्य करती हुईं

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  8. बिम्बात्मक प्रयोग के माध्यम से बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  9. थका नहीं है
    ना कभी हुई है
    कोई प्रतिक्रिया
    कठोर है
    लेकिन दिखाई नहीं
    कठोरता
    हाँ ! दृढ अवश्य दिखता है
    कभी जो गौर से
    देखो इसे ........

    तवे सी दृढ़ता और अनवरत कार्यशीलता निश्चित ही ग्राह्य है . नया बिम्ब, अनुपम शैली , असाधारण विषय आपके लेखन की विशेषता हैं. शुभकामना .

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  10. कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज ...adbhut bimb.....akela alag anthak ppita sa ...bahut sunder...

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  11. Bahut achhi kavita kahi aapne arun sir....kitni buree baat hai tawa apni paidaish ke waqt se hi generation gap ka shikar ho jata hai...bahut achhi lagi mujhe

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  12. बहुत खूब .... घर के पालनहार की व्यथा कथा आपने एक तवे के माध्यम से कह डाली ...

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  13. जब तक
    आंच पर नहीं चढ़ता
    बहुत अकेला होता है
    तवा

    बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज
    अद्भुत... जब सोचा तो रोज का घरेलू सच लगा, मगर अभ तक ध्यान क्यो नही गया... तवा और पिता पर भी गौर से विचार करने का....!

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  14. बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज ...
    तवे की पिता से तुलना वाह! सुंदर रचना , शुभकामनायें

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  15. badhiya , tave ke bina kaam hi nahi chalta ...koi roti nahi pakti ...yani bread and butter sab iske jimme hai ...तवे की पिता से तुलना ...najar ka kamaal hai ...

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  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  17. तवे पर केन्द्रित कोई रचना पहली बार पढी। कोई चार बार पढी। हर बार नए अर्थ सामने आए। जितना कुछ महसूस कर पा रहा हूँ, उतना कुछ कह पाना मुमकिन नहीं हो रहा। अच्‍छी लगी।

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  18. आज सरोकार के माध्यम से तवा और खूबसूरत हो गया है।

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  19. तवा की खूबियाँ कविता में बाखूबी बयान की हैं आपने
    बहुत पसंद आई कविता.

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  20. सबसे अलग
    सबसे भिन्न
    अपने अकेलेपन को
    कभी किसी से
    जताया नहीं
    बांटा नहीं
    अन्य बर्तनों की तरह
    ना ही कभी खडका
    बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज
    wah. tave ke madhyam se kya gazab ki kavita likhi hai....tareef ke liye shabd hi nahin mil rahe hain....

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  21. बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    ...
    अप्रतिम प्रस्तुति...पिता के अहसासों का बहुत अनूठा और सशक्त चित्रण..आपकी रचना ने निशब्द कर दिया..

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  22. तवा और उस पर कविता
    अरुण भाई आपने सचमुच ज़ोर का झटका वो भी ज़ोर से ही दे डाला है

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  23. हर दिन तपता है,
    दिन रात जगता है,
    पर जीवन को जीवन देता है.

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  24. भरा हो पेट तो बच्चे कहाँ समझते हैं,
    तवे पे कौन अपनी उँगलियाँ जलाता है!(रविंद्र शर्मा)
    तवे की तपन और उसकी यात्रा से पिता जी की समानता अद्भुत है!आपकी सिग्नेचर हैं ये कविता!

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  25. kavita tawa par...
    kaun dhayan deta hay is kaate kaluthe tawe par..
    magar...aapki rachna tawa ...tawe ko ek nayi pahchan de gaya...ab aaj ghar jaakar ghar ke tawe ko phir se milne ka man karta hay...behad sundar bhaw wali kavita.
    dhanywad

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  26. बातें करना चाहता है
    बिना आंच पर चढ़े भी
    कुछ पिता सा लगता है
    तवा , आज


    kuchh nahi biklul peeta sa lagta hai, sab kuchh sahta hai, sara dard...par hame sukh dena chahta hai..:)

    lajabab!! rachna!!

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  27. थका नहीं है
    ना कभी हुई है
    कोई प्रतिक्रिया
    कठोर है
    लेकिन दिखाई नहीं
    कठोरता
    हाँ ! दृढ अवश्य दिखता है

    तवा एक नए सन्दर्भ में प्रयोग किया है आपने ...जो बिम्ब आपने खींचा है ..बहुत गहरे भाव संप्रेषित करता है , सच में उसने कभी किसी से नहीं कहा ..एक प्रेरणा जैसा लगता है ....अति मार्मिक और अर्थपूर्ण ...आपका शुक्रिया .

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