मंगलवार, 7 जून 2011

छोडू राम



हुजूर मैं हूँ
छोडू राम
किसी को
छोड़ आना हो घर, दुकान, दफ्तर,
ससुराल, मायके
छोड़  आता हूं
जिसे पंहुचा आता हूँ
चौखट तक
पलट कर देखते नहीं
अलग बात है यह
और कोई नई बात भी नहीं

मैं छोडू राम
किसी को भिजवाना है
कोई जरुरी कीमती माल
शहर के
इस कोने से उस कोने
या इस शहर से उस शहर
भरोसे से छोड़ आता हूं
लेकिन जब भी
खोला है मुंह
वाजिब मेहनताने के लिए
कोंच दिया गया है
मेरे ही पसीने से तर
मेरा ही गमछा
मेरे ही मुंह में 

बच्चे जब शाम को
लौटते हैं अपने घर
मैं उनके साथ चल लेता हूँ
कदम दो कदम
बतिया लेता हूँ
अपना लड़कपन
छोड़ आता हूँ
उन्हें गली के नुक्कड़ तक
वापसी में
खींच लेते हैं मेरे बाल
मेरी बनियान
मेरा लड़कपन छूट जाता है वहीं
छोडू राम जो ठहरा मैं

इस दुनिया में
मेरे नाम से तो नहीं
लेकिन मेरे काम से हैं
हजारों छोडू राम 
दो बातें प्रेम से करो
कुछ भी कर दूंगा मैं
सिवाय  इसके कि
आस्मां से तारे नहीं ला सकता
लेकिन उठा लूँगा आसमान सिर पर
आपका काम होने तक

लोग बहुत प्रेम से
बतियाते हैं
जब तक छोड़ता नहीं मैं
उन्हें, उनका सामान, उनका सन्देश
उनके गंतब्य तक
कईयों को तो छोड़ आया हूँ
विधान सभा संसद तक
और फिर लौटते हुए
मेरे कानो में गूंजती  हैं
उपहास मिश्रित उनकी हंसी
अट्टहास भी


ठीक वैसे ही
महसूस करता हूँ
जैसे मतदान के बाद
ठगा सा
महसूस करते हैं आप

मैं बेबस, लाचार,
अपमानित छोडू राम
कभी सम्मान देना हो
तो कहियेगा मुझे
लोकतंत्र

30 टिप्‍पणियां:

  1. जी हाँ भारत का लोकतन्त्र यही तो है!
    सुन्दर रचना!

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  2. खुदको छोडू राम जैसा क्यों महसूस कर रही हूँ शायद .......और भी करेंगे इस रचना को पढने के बाद

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  3. आपने साधारण से छोड़ू राम पर असाधारण कविता रची है। इस बदलते समय में सभ्‍यता की ऊपरी चमक दमक के भीतर उजड़ते लोकतंत्र और इस त्रासद स्थिति में कवि का कर्त्तव्‍य होता है कि वह उदात्त को नहीं, साधारण को भी अपनी कविता में ग्रहण करे, उसे जिसे सभी छोड़ चुके हों। तभी तो लोकतंत्र की नींव मजबूत हो सकेगी। कविता में लोकतंत्र के प्रति संवेदना का विस्तार व्‍यापक रूप से देखा जा सकता है।

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  4. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्रsatic byang karati hui saarthak rachanaa.wakai bahut achcha likha hai aapne.badhaai sweekaren.


    please visit my blog.thanks

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  5. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्र

    इस पंच ने कहाँ कुछ कहने लायक छोड़ा....

    बस लाजवाब !!!

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  6. कल नुमाइश में मिला वह चीथड़े पहने हुए ,
    मैं ने पूछा नाम तो बोला कि छोडू राम है .
    मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है ।
    शोषित की आवाज़ है यह कविता .बहुत घनीभूत हुई है पीड़ा छोडू राम की.यही दास्ताँ है हिन्दुस्तान की .

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  7. छोड़ू राम पर ..... सुंदर काव्य प्रस्तुति

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  8. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्र...

    बहुत सटीक टिप्पणी...लाज़वाब

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  9. आम जनता इसी श्रेणी में आती है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  10. सही दशा वर्णन छोडू राम का.

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  11. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्र

    छोडू राम के माध्यम से केवल राम के मन के भावों को अभिव्यंजित कर दिया आपने ....आपका आभार

    उत्तर देंहटाएं
  12. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्र

    Bilkul sahi... kamaal ki rachna

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  13. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    कहियेगा मुझे लोकतंत्र.

    बहुत ही सशक्त व्यंग कविता के माध्यम से. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  14. ठीक वैसे ही
    महसूस करता हूँ
    जैसे मतदान के बाद
    ठगा सा
    महसूस करते हैं आप

    मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    तो कहियेगा मुझे
    लोकतंत्र



    इस रचना की तारीफ़ के लिए मेरे पास शब्द नहीं है . क्या बढिया व्यंग लिखा है आपने! इसके के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ. आभार.

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  15. ठीक वैसे ही
    महसूस करता हूँ
    जैसे मतदान के बाद
    ठगा सा
    महसूस करते हैं आप

    मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    तो कहियेगा मुझे
    लोकतंत्र
    arun ji aaj har aam insaan छोडू राम
    tho hai hi...par uske sath sath aapne ham jaisi aam janta ko is loktantra ka jo aayina dikhaya wo kamal hai.....bahut khub

    उत्तर देंहटाएं
  16. मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    तो कहियेगा मुझे
    लोकतंत्र
    मर्माहत कर गयी ये रचना....कुछ कहने को शब्द कम पड़ रहे हैं...

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  17. निशब्द कर दिया……………ये है शानदार व्यंग्य्।

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  18. क्या बात है छोड़ू राम की....खूबसूरत रचना और व्यंग...

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  19. संवेदनशीलता की इस दृष्टि को सलाम

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  20. क्या कहूं अरुण जी.....शब्द नहीं मिल रहें हैं.....कमाल किया है आपने....शानदार...लाजवाब |

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  21. अरुण भाई एक बार फिर से आप ने 'कस्बों के रिक्शे वाले' की याद दिला दी| बहुत बहुत बधाई मित्र|

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  22. छोडू राम पर बरसते है

    लाठी डंडे,

    नींद में सोते लातें पडती

    विरोध होगा तो

    मुंह भी नोच डाल दिया जायेगा

    नहीं तो एनकाउन्टरकर दिया जायेगा

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  23. ठीक वैसे ही
    महसूस करता हूँ
    जैसे मतदान के बाद
    ठगा सा
    महसूस करते हैं आप

    मैं बेबस, लाचार,
    अपमानित छोडू राम
    कभी सम्मान देना हो
    तो कहियेगा मुझे
    लोकतंत्र
    prabhi kavita

    rachana

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  24. छोड़ू राम बड़े लगे अपने को आज के लोकतंत्र की अपेक्षा।

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  25. आज अपनी लोकतंत्र की हालत ऐसी ही हो गयी है ..जैसे छोडुराम,,, बहुत सुन्दर तरीके से आपने लोकतंत्र और जनता की हालत बयाँ की ...

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