बुधवार, 1 जून 2011

वटसावित्री : कुछ क्षणिकाएं



१.
पिता
नहीं होते सत्यवान
माएं होती हैं
फिर भी
सावित्री

२.
सावित्री
चल देती है
यमराज के साथ
सत्यवान के लिए
सत्यवान
नहीं चल सकता
कदम दो कदम
साथ सावित्री के

३.
धागा बाँध
जोड़ लेती है
सावित्री
कई जन्मों का
सनातन सम्बन्ध
वर्षो साथ रह
जो कई बार
बनता नहीं

४ .
वट
आस्था है
एक दिन में
गहराई नहीं हैं
इसकी जड़ें

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कहा…………आस्था तो है मगर जडें भी गहरी हैं मगर सिर्फ़ स्त्री के लिये पुरुष ने कब रखा व्रत कब की पूजा……………सुन्दर भावों को संजोया है।

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  2. सार्थक विवेचन!!

    वट
    आस्था है
    एक दिन में
    गहराई नहीं हैं
    इसकी जड़ें

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  3. vet sawitri vrat ke uper anoothi rachanaa.sahi kaha aapne aurat to saawitri ban jaati hai aadmi hi satyawaan nahi ban paata,badhaai aapko.

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  4. आज बरगदाही है, आपकी कविता लाइव है।

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  5. वट
    आस्था है
    एक दिन में
    गहराई नहीं हैं
    इसकी जड़ें
    sach hai

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  6. वट
    आस्था है
    एक दिन में
    गहराई नहीं हैं
    इसकी जड़ें

    बहुत सच कहा है...बहुत सटीक प्रस्तुति...

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  7. हर क्षणिका बहुत अच्छी ..सत्य को कहती हुई

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  8. सावित्री
    चल देती है
    यमराज के साथ
    सत्यवान के लिए
    सत्यवान
    नहीं चल सकता
    कदम दो कदम
    साथ सावित्री के...

    हर क्षणिका सच्चे और गहरे अर्थ समेटे हुए है...

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  9. एक-एक क्षणिका में कई-कई संदेश गुंथे हैं, और आज के हालत को बयां कर रहे हैं। कम शब्दों में आपने बहुत ही सार्थक बात कही है। आपकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक मैं इन्हें मानता हूं।

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  10. क्षणिकाओं में उभरता सत्य.कुछ ही पंक्तियों में गहन अर्थ छिपा है.

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  11. अरुण जी,सावत्री और सत्यवान के माध्यम से अच्छी अभिव्यक्ति की है आपने.

    इस बार मेरे ब्लॉग को काफी समय से भुलाये हुए है आप.कोई नाराजगी तो नहीं ?

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  12. आपकी लेखनी सदैव ही निःशब्दता की स्थिति में पहुंचा देती है...

    क्या कहूँ....

    सत्य सटीक निरूपण....

    बहुत बहुत सुन्दर सभी की सभी क्षणिकाएं .......

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  13. padh kar bahut achchha laga.
    saral rachna.
    sarthak baat.
    kehne ka andaaz seedha sada.

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  14. क्षणिकाएं लिखने में आपका कोई सानी नहीं...एक से बढ़ कर एक...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  15. आज कुछ नहीं कहूँगा सिर्फ एक " :)" के... ऐसा नहीं कि नहीं है कहने को.. लेकिन आज अच्छे लगे बिम्ब वाट,सावित्री और सत्यवान के!!

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  16. एक दिन में
    गहराई नहीं हैं
    इसकी जड़ें

    बिम्बों की सुन्दर छटा

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  17. चारों ही रचनाएं बहुत सुदंर हैं.

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  18. वट
    आस्था है
    एक दिन में
    गहराई नहीं हैं
    इसकी जड़ें

    इस अभिव्‍यक्ति का प्रत्‍येक शब्‍द अक्षरश: सत्‍य ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

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  19. अरुण जी
    नमस्कार !
    ....बहुत सटीक प्रस्तुति बहुत सार्थक लिखा है आपने |

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  20. कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका

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