गुरुवार, 16 जून 2011

वसीयतनामा


बाबूजी
लिख गए हैं
एक वसीयत
जिसमें नहीं है
माँ का नाम

वही माँ
जो तोड़ी है
चूड़ियां उनके मरने के बाद
सूनी भी की है
अपनी लाल टुह टुह मांग
तज कर
सभी इन्द्रधनुष
हो गई है कपास
उसी माँ का
नहीं है नाम
वसीयत में

जिनके नाम हैं
वसीयत में
लगा चुके हैं
अपना अपना हिस्सा
उसकी कीमत
और लौट चुके हैं
अपनी अपनी दुनियाँ में
देकर माँ को
एक समय सीमा

समय सीमा
बेदखल होने को
इतिहास से
स्मृतियों से
और पूर्व की भांति ही
चिर शांति में है माँ

27 टिप्‍पणियां:

  1. जिनके नाम हैं
    वसीयत में
    लगा चुके हैं
    अपना अपना हिस्सा
    उसकी कीमत
    और लौट चुके हैं
    अपनी अपनी दुनियाँ में
    देकर माँ को
    एक समय सीमा
    Ek aah ke siway aur koyi shabd nahee hai mere paas...

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  2. उफ़ ...जाने कैसा कैसा लगने लगा पढकर...

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  3. समय सीमा
    बेदखल होने को
    इतिहास से
    स्मृतियों से
    और पूर्व की भांति ही
    चिर शांति में है माँ..

    कटु यथार्थ को कहती मार्मिक रचना

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  4. एक कड़वा सच ... जिसे आपने
    इस रचना में ढाला है ..गहन भाव लिये बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  5. समय सीमा
    बेदखल होने को
    इतिहास से
    स्मृतियों से
    और पूर्व की भांति ही
    चिर शांति में है माँ

    आज के सच को बयाँ कर दिया…………घर घर की कहानी है । बेहद मार्मिक चित्रण्।

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  6. ये तो सरासर अन्याय हुआ . औलाद सब कुछ हो गयी और जीवन साथी कुछ भी नहीं !
    मार्मिक अभिव्यक्ति !

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  7. अरुण जी एक औरत और माँ होते हुए भी ऐसी सोच मुझे नहीं आई ...कभी सोचा ही नहीं कि कोई हक माँगा जाये
    आपकी कलम को सलाम ....मार्मिक प्रस्तुति
    --

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  8. हाँ, हर माँ, पत्नी के नाम यही वसीयत आती है और सारी भौतिक चीजों के हिस्सेदार बहुत सारे होते हैं और कोई भी उससे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता है क्योंकि माँ के हिस्से में यही उनके जीवन में आने के बाद मिला था और वहीपाती के जाने के बाद उससे छीन लिया जाता है.
    बहुत सही लिखा है, इसे क्या कहूं? शब्द नहीं हैं.

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  9. vasiyat mein jinke naam the , sabke hisse maa ka aashish aur saath tha ... samay seema mein baandhte hue kisi ne jaana hi nahin ki kal bhi ek vasiyat hogi , jahan ek hisse mein bhi kai prashn honge !

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  10. अत्यंत गहरी और गंभीर रचना.. बहुत उम्दा..
    माँ हमेशा की भांति चुप रहती थी.. पर क्या अब रहेगी? समय बदल रहा है और माँ भी.. शायद अब वो बोल उठे!

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  11. समय सीमा
    बेदखल होने को
    इतिहास से
    स्मृतियों से
    और पूर्व की भांति ही
    चिर शांति में है माँ.....

    पति को खोकर और अपने ही जिगर के टुकड़ों से समय सीमा बेदखल होने की पाकर और क्या रह जाता है उसके लिए...बहुत दुःख होता है पर यही सच्चाई है वर्तमान की... जीवन के सत्य को परिभाषित करती मार्मिक अभिव्यक्ति.....

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  12. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  13. समय सीमा
    बेदखल होने को
    इतिहास से
    स्मृतियों से
    और पूर्व की भांति ही
    चिर शांति में है माँ
    Behtareen rachana hai!

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  14. अत्यंत भावमय रचना
    आपकी दृष्टि भेदक है

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  15. पीढ़ी दर पीढ़ी यह दुख बढ़ता ही जा रहा है

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  16. नहीं ! बाबू जी ऐसा नहीं कर सकते हैं, बार-बार कविता पढने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ ,
    आभार उपरोक्त रचना हेतु ............

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  17. वही माँ
    जो तोड़ी है
    चूड़ियां उनके मरने के बाद
    सूनी भी की है
    अपनी लाल टुह टुह मांग
    तज कर
    सभी इन्द्रधनुष
    हो गई है कपास
    उसी माँ का
    नहीं है नाम
    वसीयत में ...

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति...यह हमारे समाज की कैसी विडम्बना है कि जिस पत्नी ने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया, उस के नाम वसीयत में कुछ भी नहीं..इसके बारे में सोच कर ही मन व्याकुल हो जाता है. बहुत उत्कृष्ट रचना..

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  18. समय सीमा
    बेदखल होने को
    इतिहास से
    स्मृतियों से
    और पूर्व की भांति ही
    चिर शांति में है माँ

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति

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  19. badhiya to likha hai ....magar ye bataao ..smritiyon se bedakhal kaise karenge vo log ....yani apni hi jaden kaat daalenge...

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  20. dard ko sakchat lakar samne khada kar diya.kya kahoo.....atyant samvedansheel rachna.

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  21. जो जीवन भर हिस्से में बंटती रहती है वो हिस्सा लेकर क्या करे?

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  22. वसीयत में मिली थी जो जिंदगी वो तो जी ली अब क्या आस लगाना !!!!

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  23. बाबूजी
    लिख गए हैं
    एक वसीयत
    जिसमें नहीं है
    माँ का नाम

    वही माँ
    जो तोड़ी है
    चूड़ियां उनके मरने के बाद
    सूनी भी की है
    अपनी लाल टुह टुह मांग
    तज कर
    सभी इन्द्रधनुष
    हो गई है कपास
    उसी माँ का
    नहीं है नाम
    वसीयत में
    ....चोट तो खैर आप हमेशा से ही करते हो समाज कि रीतियों विद्रूपताओं और कुरीतियों पर मगर कभी कभी तो आप जबरदस्त प्रहार करते हो भाई...मैं आपके साथ हूँ भाई हमेशा |

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