बुधवार, 1 जून 2011

मीडिया हाउस से सीधे रिपोर्टिंग


आज मौका मिला
तो कर लूं  रिपोर्टिंग
उन्ही के दफ्तर से
जो तय करते हैं
सीधे रिपोर्टिंग की नीति

भाग्यशाली रहा कि
पहुँच गया हूँ मैं यहाँ
वरना यहाँ पहुंचना
देश के प्रधानमंत्री आवास में
पहुँचने से कम भी नहीं
दोनों ही हैं
जनता के  लिए
और हैं जनता से उतने ही दूर

राजधानी के ह्रदय में बसे
इसके विशाल और अत्याधुनिक
परिसर को देख
कह नहीं सकते आप कि
आवाज़ हैं देश की जनता की
वही जनता जिन्हें तमाम दावो के बाद भी
मिली नहीं भर पेट रोटी, पानी,
तन भर कपडा
सर पर छत
घर पहुँचने के लिए सड़क

इसके विशाल लाउंज की
वातानुकूलन सुविधा को देख
लगता नहीं कि
कोई समानुपातिक सम्बन्ध है
देश और यहाँ के तापमान के बीच
क्योंकि अभी जब लपटों में थे
कुछ किसान, बचाने को अपनी पुश्तैनी ज़मीन
यहाँ पसरी हुई थी
पूरी शांति

हाँ अभी अभी
गुज़रा है पत्रकारों का एक दल
ट्रेंडी टीशर्ट और डेनिम में
हाथ में काफी का बड़ा मग लिए
उनकी चर्चा में है
विदेश में हुई किसी राजकुमार की शादी
नई रानी, उसके किस्से और तमाम विवरण
कोई बात नहीं कि अभी भी
घर नहीं लौटे हैं कई किसान, उनके जवान बेटे
और दहशत में हैं पत्नियां और बेटियाँ

लाउंज जहाँ मैं
अभी धंसा  हूँ देश के  सबसे बड़े फर्नीचर ब्रांड के
सबसे महंगे सोफे में
शायद इसके सामने ही है
कैफेटेरिया
जहाँ बारी बारी से
अलग अलग टोलियों में आ रहे हैं लोग
एक टोली ने पहन रखी  है
बाघ के छाल की  प्रिंट वाली  शर्ट
उस पर सन्देश भी है
बचाने को बाघ
बहुत प्रतिबद्धता दिख रही है
मुझे तो
बस तर्क समझ नहीं आया कि
एक आम आदमी जैसे मैं
कैसे रोक सकता हूँ
बाघ को मरने से/शिकार होने से
कैसे बढ़ा सकता हूँ इनकी संख्या
जो मैं खरीद नहीं सकता
एक जोड़ी एक्स्ट्रा कमीज़ अपने लिए
बच्चों के लिए 'कुछ मीठा हो जाये' वाला चाकलेट
इस उबलती  महंगाई में
कैसे खरीद सकता हूँ
बाघ की छाल से बने कपडे आदि
खैर उनकी प्रतिबद्धता देख
विश्वास हो चला है कि
बचा सकता हूँ मैं भी बाघ

अरे यह क्या !
ये तो कुछ जाने पहचाने चेहरे हैं
रोज़ ही दिखते हैं
कितना तेज़ होता है
इनके चेहरे पर
कितना भयभीत कर देते हैं
अपने खौफनाक संवादों से
लेकिन बड़ा शांत चित्त दिख रहे हैं यहाँ
ऐसा लग रहा है मानो
नाटक कर रहे हैं
शांतचित्त दिखने का
ये बात नहीं करते किसी से
हां अपने शो की टी आर पी ऐसे देखते हैं
जैसे हो कोई सटोरिया
स्टाक बाज़ार में

मेरी दायीं ओर
है कोई बड़ा सा सम्मलेन कक्ष
वहां आया है अभी अभी कोई
लाल बत्ती वाली बड़ी सी गाडी में
सुनाई  तो नहीं दे रहा मुझे कुछ
लेकिन होठों को पढने से लगता है
हो रही है कोई गंभीर मंत्रणा
भारी भरकम  चिंतन
कुछ लेन देन की  बातें
कुछ बंटवारा होना है आपस में
सूत्रों से जब होगा अधिक ज्ञात
जरुर बताऊंगा

हाँ ! इस बीच
पकड़ लिया गया है मुझे
ले जाया जा रहा है
घसीट कर बाहर
हो सकता है
बन जाये यह ब्रेकिंग न्यूज़ 

या कल के अखबार की सुर्खी 
'एक आम आदमी मीडिया हाउस में घुसा'

21 टिप्‍पणियां:

  1. kisi bhi baat ko man me sajona
    aur fir chhoti chhoti baato ko pakar kar
    uspar pratikriya wo bhi kavita ke roop me dena...
    koi aapse seekhe....!!
    isi baat me chalo aaj
    kuchh meetha ho jaye...
    waise bhi kal pahlee tareekh thi:D:)

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  2. देश व खबरों की गर्मी में यह ठंडक।

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  3. अच्छी कविता, भाई हो कहाँ आज कल?

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  4. meediya ki pole kholati hui saarthak rachanaa.hamaare desh main aisa hi ho raha hai.badhai sweekaren.



    please visit my blog and feel free a comment.thanks.

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  5. अरुण जी.....दिल जीत लेते हो आप......इतना ज़बरदस्त व्यंग्य.....सुभानाल्लाह....शानदार |

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  6. बहुत बहुत खूब....इसे मै व्यंग नहीं कहूगी ...ये मीडिया का सच है
    मीडिया भी आम जानता के सामने झूठ बेचती है ...गुमराह किया जाता है
    सच को हम सब से छिपा कर ...........बहुत अच्छा लिखा है आपने अरुण...बहुत खूब

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  7. एक आम आदमी मीडिया हाउस में घुसा'

    करारा व्यंग्य्……………आप इस तरह सच कह देते हैं कि उसके बाद कहने को कुछ नही बचता……………शानदार रचना.

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  8. विदेश में हुई किसी राजकुमार की शादी
    नई रानी, उसके किस्से और तमाम विवरण
    कोई बात नहीं कि अभी भी
    घर नहीं लौटे हैं कई किसान, उनके जवान बेटे
    और दहशत में हैं पत्नियां और बेटियाँ

    बहुत ही करारा व्यंग्य

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  9. यह व्यंग कहाँ ? यह तो सच्चाई है...

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  10. **“मीडिया वार!”**

    कमेंट बाद में अभी बस यही ....

    हैसियत तो काने बैगन की नहीं
    पूछता है भाव लंगड़े आम का
    पहले तू उसकी तरह नंगा तो हो
    फिर नज़ारा देखना हम्माम का।

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  11. इस कविता के द्वारा समकालीन मीडिया की भूमिका पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। अगर यह कहें कि मीडिया समाज का दर्पण है तो शायद ग़लत नहीं होगा। .... पर यदि दर्पण मटमैला है तो व्यक्ति या समाज का क्या दोष मीडिया निष्पक्ष रूप से सही प्रेषण करे तो समाज का आम आदमी, जिसे कविता के अंत में घसीट कर भगाया गया है, भी उसको अपनाएगा, प्रतिबिम्ब भी साफ-सुथर नजर आएगा।

    अरुण जी आपने आज के संदर्भ में मीडिया की भूमिका को पूरे बोल्डनेस से इस कविता के जरिये और कवि की आंखों से देखी-सुनी विडंबनाओं को पूरे पैनैपन से बेनकाब किया गया है।

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  12. मिडिया हाउस में घुसने के जुर्म की सजा है मिडिया में छा जाना , बधाई हो ऐसी सजा पर ......

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  13. एक नंगे संस्थान के भडकीले परिधान के दर्शन हुए.. घबराइए मत वह खबर ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती... बल्कि एक आदमी का घसीट कर बाहर किया जाना तो कोइ खबर ही नहीं.. अगर उनके दरवाज़े पर आम आदमी की लाश भी पड़ी हो (तीन दिन से भूखे की दम तोड चुकी लाश) तो भी खबर नहीं बनती.. कचरा हटाओ बोलकर सफाई कर दी जाती है! अम्बरीश कक्कडों से भरी पड़ी है मीडिया नगरी!!

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  14. क्या खुलासा कर दिया है रचना के माध्यम से...बहुत खूब!

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  15. यह रचना तो ब्रेकिंग न्यूज है
    जी हाँ, पी एम हाऊस, सी एम हाऊस और मीडिया हाऊस में आम आदमी का क्या काम. आखिर आम आदमी की चर्चा हो रही है.

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  16. बहुत ही शानदार रचना|धन्यवाद|

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  17. बहुत ही सुन्दर और शानदार

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

    अफ़सोस, आपकी मीडिया हॉउस की रिपोर्टिंग ने गहरा आघात
    पहुँचाया,जो की आपने केवल हकीकत ही तो बयान की है.

    आप कब तक मुझे इंतजार कराएँगे मेरे ब्लॉग पर रिपोर्टिंग करने का.
    अरुण भाई,आपका बहुत इंतजार करता हूँ मैं.

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  19. करारा व्यंग सुन्दर प्रस्तुति....

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