बुधवार, 22 जून 2011

खिड़की का टूटा हुआ शीशा


ठीक है
जो टूट गया है
खिड़की का शीशा
चली आती है
गोरैए कभी कभी
बैठ जाती हैं

किताबो के आलमीरे  पर
किताबें खुश हो जाती हैं
कवितायेँ कसमसाने लगती हैं
पढ़े जाने को
कहानियों के भीतर
एक लहर उठ जाती है
आत्मकथाओं की आत्माएं
फिर जीवित हो उठती हैं
गोरैए की चहक से

गौरैया उड़कर
बंद पंखे के डैने पर
बैठ जाती है
डैने हिल उठते हैं
गौरैया डर जाती है
जैसे डरती हैं लडकियां
अचानक कुछ हिलने से
फिर आश्वस्त हो
गोरैया फुर्सत में बैठ जाती हैं
पंखे का डैना
उसकी कानो में कुछ कहता है
गोरैया हंसती है
हंसती हुई
गोरैया अच्छी लगती है
इस बीच
पसीने से लथपथ हो उठता हूँ मैं
बहुत दिनों बाद
आया है इस तरह पसीना
पसीने से मैं
कुछ बरस पीछे चला जाता हूँ
याद आता है
मेरे शहर का
रिक्शेवाला
लेकिन उस से पहले
याद आती है माँ
पसीने से तर
छौंकती सब्जी
बेलती रोटी
रिक्शेवाला कुछ सुपरमैन सा लगता है
लेकिन नहीं देखा कभी
किसी सुपरमैन को आते पसीना
गोरैया उड़कर चली जाना चाहती है

उसे डर है
कहीं बदल ना दिया जाये
खिड़की का यह टूटा शीशा
गोरैया लौट जाती है
कवितायेँ सो जाती हैं
कहानियां उदास हो जाती हैं
आत्मकथाएं मृत हो
जाती हैं
आलमीरे में पड़े पड़े
हाँ एक इंतजार छोड़ जाती है
गोरैया
जो आई थी खिड़की के
टूटे हुए शीशे से

आज सब खिड़कियाँ बंद है

33 टिप्‍पणियां:

  1. to is gauraiyya ko aane deejiye na ...kavitaayen kahaaniyan jag jaayengee ...badhiya

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  2. टूटने से राहें बनती हैं, बनने से टूट जाती हैं।

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  3. कमाल …………गज़ब का गहन चिन्तन करके लिखा है।

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  4. सुखद है यह आगमन, गौरैया का.. जाग जाती कविताओं का.. और देखिये ना कैसे दाखिल हो गयी उस टूटे शीशे से उस रिक्शे वाले के पसीने की गंध!! शीतल बयार् सी कविता!!

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  5. इतनी बारीकी से देखने, परखने और एक प्रभावशाली रचना का रूप देने की आपकी अद्भुत शक्ति को सादर प्रणाम - जिनके सही मूल्यांकन के लिए भी वही गुण चाहिए - आभार

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  6. Nice thoughts. Brilliantly woven...Kudos.!Nice thoughts. Brilliantly woven...Kudos.!

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  7. आज सब खिड़कियाँ बंद है
    Aah!

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  8. हंसती हुई गौरैया अच्छी लगती है
    ...
    जिस गोरैये को हंसते हुए आपके कवि मन ने देखा, उसकी हंसी बरकरार रहे, कोई छीन न ले, यही कामना है।

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  9. रहने दीजिए शीशे को यूँ ही एक सजीव वातावरण तों मिलता है हँसती हुई गौरैया जिसकी चहक से आत्माएं जाग उठी हैं उसे यहीं आसपास रहने दीजिए

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  10. क़िताबों कि आलमारी पर गौरैया - बहुत ख़ूब

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  11. गौरैया डर जाती है
    जैसे डरती हैं लडकियां
    अचानक कुछ हिलने से

    बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  12. बहुत गहन चिंतन...बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..

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  13. मेरे शहर का रिक्शेवाला
    लेकिन उस से पहले
    याद आती है माँ
    पसीने से तर छौंकती सब्जी
    बेलती रोटी

    यादे अतीत की ..और माँ की वो छवि ...किसी भी रूप में प्यारी लगती है

    गोरैया हंसती है
    हंसती हुई गोरैया अच्छी लगती है
    गोरैया....के माध्यम से खुद का अतीत याद करना .......छू गया मन को....बहुत खूब



    --

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  14. आपकी कृतियाँ सदैव ही पठ्नोपरांत निःशब्दता की स्थिति में पहुंचा दिया करती हैं...

    क्या कहूँ...

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  15. बेहद उम्दा रचना ... बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  16. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!

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  17. बहुत सुन्दर ... गौरईया के लिए चिन्ता जायज़ है

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  18. खिड़कियाँ बन्द होंगी तो गौरैया कहाँ से आ पायेगी.

    अत्यंत प्रभावी और भावनात्मक रचना

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  19. वास्तव में आजकल जैसी लोगों की जीवन शैली हो गयी है उसने हमें प्रकृति की खूबसूरती और उसकी अनुपम सौगातों से वंचित कर दिया है ! आपकी बेहद सुन्दर रचना ने बहुत प्रभावी तरीके से इस बात की ओर संकेत किया है ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

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  20. बहुत संवेदनशील ... कितना एकाकी होना चाहते हैं हम ... सब दरवाजों को बंद कर के .. गौरैया के माध्यम से बहुत कुछ कह गयी रचना ...

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  21. गौरैया का हंसना और कहानियों का उदास हो जाना एक संवेदनशील कविमन को ही दिख सकता है।
    ठूंठ हो रही मानवीय संवेदना की ओर ध्यान आकर्षित कराती एक अच्छी कविता।

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  22. आज बरसात हो रही थी, इंसान जहाँ किसी शेड के नीचे या किसी ओट में खड़े थे वहीं एक छोटी सी गोरैया बड़ी शान से घास में ठुमक रही थी। मोटर साईकिल रोककर काफ़ी देर देखता रहा उसे, खिड़की थोड़ी सी खुल जाये तो किताबें तक जाग उठेंगी।
    बहुत खूब अरुण जी।

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  23. गौरेया का हंसना ...

    किताबों में कविताओं का आत्‍मकथाओं

    का सजीव होना
    कितनी गहनता से एक-एक पल
    का

    सजीव चित्रण किया है आपने इस अभिव्‍यक्ति में
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने, आभार ।

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  24. चली आती हैगोरैए कभी कभी
    बैठ जाती हैं
    किताबो के आलमीरे पर
    किताबें खुश हो जाती हैं
    कवितायेँ कसमसाने लगती हैं
    पढ़े जाने को
    कहानियों के भीतर
    एक लहर उठ जाती है
    आत्मकथाओं की आत्माएं
    फिर जीवित हो उठती हैं
    गोरैए की चहक से...
    ...
    मैं तो पाठन का अनद ले रहा हूँ...और इक गौरैया आकर ना जाने कब मेरे सामने फुदकने लगी मुझे पता ही नहि चला ...बहुत खूब भाई.

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