सेंकते हुए रोटी
अक्सर जल जाती है
तुम्हारी उंगलियाँ
तुम उफ़ भी नहीं कहती
कड़ाही का गरम तेल
अक्सर छिटक कर
पड़ जाता है
तुम्हारी बाहों पर
फफोले उग आते हैं
तुम चुप ही रहती हो
पानी लग जाता हैं
तुम्हारे पैरों की उँगलियों में
बिल्कुल भी
रूकती नहीं तुम
हर पर्व त्यौहार पर
तुम्हारी व्यस्तता
बढ़ जाती है
कई गुणा
इन सबके बीच
तुम बालों में लगा लेती हो
सुगन्धित तेल
भर लेती हो मांग
बालों में गूंथ लेती हो
एक फूल
प्रतीत होती हो
रिझाती सी
पैरों में
घिरनी बांधे तुम
सदियों से
कर रही हो प्रेम
(एकतरफा प्रेम !)