मंगलवार, 11 मई 2021

कुछ दिनों के लिए

 अरुण चन्द्र रॉय की कविता - कुछ दिनों के लिए 

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मुद्रित कीजिए

अखबारों को श्वेत श्याम में 

संपादकीय पृष्ठ को कर दीजिए

पूरी तरह काला

स्थगित कर दीजिए 

खेल पृष्ठ

आर्थिक पृष्ठ पर 

कंपनियों के आंकड़े नहीं बल्कि

दीजिए आंकड़े

छूटे हुए काम वाले घरों के रसोई का 

बंद कर दीजिए रंगीन विज्ञापन भी अखबारों में

कुछ दिनों के लिए। 


कुछ दिनों के लिए

टीवी पर बंद कर दीजिए

रंगीन प्रसारण

ब्रेकिंग न्यूज के साथ चलने वाले 

सनसनीखेज संगीत प्रभाव को

कर दीजिए म्यूट

पैनलों की बहसों को कर दीजिए

स्थगित

प्राणवायु के बिना छटपटाती जनता का

सजीव प्रसारण पर भी 

लगा दीजिए रोक।


यदि छापना ही है

प्रसारित करना ही है 

तो कीजिए 

संविधान की प्रस्तावना

बार बार 

बार बार 

बार बार

कुछ दिनों के लिए। 

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शनिवार, 1 मई 2021

फोनबुक से वार्तालाप

 अरुण चन्द्र रॉय की कविता - फोनबुक से वार्तालाप

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महामारी से भयभीत होकर

इन दिनों मैं अपने फोन के कॉन्टैक्ट लिस्ट को 

खंगालता हूं बार बार 

करता हूं इससे वार्तालाप

सोचता हूं यदि गिर गया ऑक्सीजन लेवल मेरा तो 

किसे फोन करेगी मेरी पत्नी या बच्चे 

कौन दौड़ा आएगा सबसे पहले 

उठा ले जाएगा मुझे किसी अस्पताल के लिए 

कौन बच्चों को समझाएगा मेरी पत्नी या बच्चों को 

ढांढस देगा उन्हें 


कौन फोन नहीं उठाएगा जैसे

 मैं नहीं उठाता हूं फोन कई बार 

 देकर दफ्तर में व्यस्त रहने का हवाला 

कौन डर जायेगा कि कहीं मांग न लूं उधार 

इस महामारी में उधारी देना कितना जोखिम भरा है न 

जब देश की पूरी अर्थव्यवस्था उधारी में जा रही हो धंसी।


मैं अपने फोनबुक को ऊपर से नीचे तक 

करता हूं बार बार स्क्रॉल 

एक एक नंबर पर रुकता हूं सोचता हूं  

फिर याद आते हैं मुझे उनके साथ किया हुआ 

अच्छा बुरा व्यवहार  

अच्छे व्यवहार पर मुस्कुराता हूं 

और बुरे व्यवहार पर जतात हूं पश्चाताप 

खुद से करता हूं वादा कि यदि गुजर गया 

महामारी का यह बुरा दौर तो 

बदल लूंगा अपना व्यवहार 

हर फोन नंबर पर बदलता है 

मेरे चेहरे का रंग और हावभाव । 


यदि कोई अनहोनी घटित हो जाती है तो 

क्या चार कंधे मिल जाएगा मुझे 

ऐसे चार नाम ढूंढते ढूंढते मुझे याद आते है अपने रिश्तेदार 

जिनके शादी व्याह, मरनी हरनी में भी 

 शामिल नहीं हो पाया था मैं 

भेज दिया था नेग कूरियर से 

वे लोग भी याद आ रहे हैं जिन्हें टरका देता था मैं

मदद की मांग पर 

जबकि सोच रहा हूं कि यदि ये लोग पहुंच जाएं 

सुनकर मेरे नहीं रहने की खबर तो 

अन्त्येष्टि से क्रियाकर्म तक नहीं होगी 

मेरी पत्नी या बच्चों को कोई दिक्कत।


मन ही मन मैं सूची बनाने लगता हूं कि 

किस से मांगनी है माफी किसी अनजानी गलती के लिए

किसको कहना है धन्यवाद किसी छोटे बड़े उपकार के लिए 

किसको कह के जाना है कि बच्चों को रखे ध्यान थोड़ा 

और अंत में मैं अपनी पत्नी को भेजता हूं एक मैसेज -

" यह दुनिया तब भी थी, जब नहीं थे हम 

यह दुनिया तब भी रहेगी, जब नहीं रहेंगे हम 

हमारे होने या न होने से नहीं रुकता है 

पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना  

सूर्य का उदय और अस्त 

बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, हेमंत और शिशिर ऋतुओं का चक्र 

फूलों का मुरझाना और फिर से खिलना 

वृक्षों पर पतझड़ और नव पल्लव का आना।"


और गहरी सांस लेकर में बंद कर देता हूं 

अपने फोनबुक से वार्तालाप। 








शनिवार, 24 अप्रैल 2021

यह शोक का समय है

यह श्रद्धांजलि लिखने का
समय नहीं
यह है शोक का समय। 

नागरिक तो पहले मरे हैं
उनसे पहले मरी है
नैतिकता और मानवता
अस्पतालों में
दवाई की दुकानों पर 
गोदामों और 
धनकुबेरों के तहखानों में। 

कौन कहता है कि 
सांसे नहीं मिलने से मरे हैं लोग
वास्तव में मरी है
संवेदना सत्ता की, अधिकारियों की
या कहिए सम्पूर्ण प्रणाली की
नीतियों की और नियंताओं की। 

यह व्यक्तिगत नहीं 
सामूहिक शोक का समय है
अशेष संवेदनाओं के आत्महत्या का समय है यह। 

शनिवार, 13 मार्च 2021

सहानुभति

 सहानुभूति

पॉल लॉरेंस डनबर

 मुझे पता है कि कैसा महसूस करता है पिंजरे में बंद पक्षी !

     जब ऊपर पहाड़ियों की ढलान पर चमकता है सूरज उज्जवल;

जब हवा के झोंके मखमली घासों को झूलाती हैं हौले हौले,

और नदी बहती है पारदर्शी कांच की धारा की तरह धीमे धीमे;

     जब चिड़िया गाती है पहली बार और पहली कली खोल रही होती हैं अपनी आँखें,

और इसकी पंखुड़ियों से खुशबू चुरा रही होती है हृदय -

मुझे पता है कि कैसा महसूस करता है पिंजरे में बंद पक्षी !

 

 

मुझे पता है कि पिंजड़े में बंद पक्षी क्यों फड़फड़ाता रहता है अपने पंख

     जब तक कि पिंजरे की क्रूर सलाखें रक्तरंजित नहीं हो जातीं;

कि वह उड़कर पहुँचना चाहता है अपने घोसले में स्वतंत्र

खुश होने पर वह चाहता है शाखाओं पर झूलना;

     और पुराने जख्म बार बार उसके दिल उठाती हैं हुक

और वे उसकी धमनियों में चुभती हैं तेज और तेज -

मुझे पता है कि वह क्यों फड़फड़ाता रहता है अपने पंख

 

मुझे पता है कि पिंजरे में बंद पक्षी क्यों गाता है दर्द,

     जब उनके पंख काट दिये गए हों और छती में भरा हो गहरे जख्म, -

कि वह सलाखों को पीटता है बार बार और कि वह मुक्त हो जाएगा;

यह किसी आनंद या उल्लास का गीत नहीं होता

     बल्कि होती है प्रार्थना जो निकलती है उसके हृदय की अतल गहराइयों से बल्कि होती है जिरह ईश्वर से जो वह करता है बार बार -

मुझे पता है कि पिंजरे में बंद पक्षी क्यों गाता है!


अनुवाद - अरुण चन्द्र रॉय

गुरुवार, 4 मार्च 2021

विवाह के इक्कीसवीं वर्षगाँठ पर

इक्कीस साल पूरे हो गए 

अपने विवाह को 

बच्चे  भी हो रहे हैं बड़े 

लेकिन एक तुम हो कि हर दिन 

ऐसे पेश आती हो कि 

लगता है आज पहला दिन हो 

अपने साथ का । 


तुम और मैं 

दोनों ही हो गए हैं 

धीरे धीरे मोटे 

और हमे पता ही नहीं चला 

लेकिन हमारी मोटाई का 

कहाँ कोई असर पड़ा 

अपने प्रेम पर 

अपने खानपान पर  . 


डॉक्टर कहते रहते हैं कि 

कम खाओ चीनी 

जिसे मैं याद भर करता हूँ 

बनाते हुये सुबह की चाय 

डॉक्टर की सलाह कि 

कम खाओ नमक 

तुम अनदेखी करते हुये 

देती हो  जरूरत और स्वाद भर नमक 

दाल, सब्जी, भरता , पकोड़े आदि में 

हंस कर कहती हो - जीवन में स्वाद न हो तो क्या जीवन ! 


डॉक्टरों ने चेताया है कि 

आने वाले समय में कमी हो जाएगी कैल्सियम की 

तुम्हारी हड्डियों में 

लेकिन सुबह से शाम तक 

घिरनी की तरह नाचते देख तुम्हें 

झूठा लगता है डॉक्टर 

मुझे भी तो कहा है कि ध्यान रखूँ अपना 

चढ़ते उतरते सीढ़ियाँ 

मापते रहूँ अपना रक्तचाप नियमित रूप से 

लेकिन ये सब कोरी बातें रह जाती हैं 

जिंदगी के चक्रव्यूह में । 


बढ़ गया है तुम्हारी एड़ियों का खुरदुरापन 

तुम्हारे नाखून अब बढ्ने से पहले टूट जाते हैं 

और जिस दिन धो लेती हो चद्दरें, पर्दे 

बढ़ जाता है तुम्हारे हाथों का दर्द 

लेकिन दबाते हुये तुम्हारे हाथ

सहलाते हुये तुम्हारी एड़ियाँ 

प्यार के उन पलों से अधिक कोमल होते हैं 

उसी तरह जिस तरह मेरे झड़ते बालों पर भी 

रीझी रहने लगी तो तुम । 


अचानक हम सोचने लगे हैं 

बच्चों के दूर रहने पर होने वाले अकेलेपन के बारे में 

उनके साथ सहजता से रहने के बारे में 

उन आदतों को छोडने के बारे में 

जो हमारे माता-पिता में थे और जिनसे असहज हुआ करते थे हम 

हम सोचने लगे हैं 

नई पीढ़ी से तारतम्य बिठाने के बारे में । 


जबकि बहुत समय है अभी हम दोनों के पास 

फिर भी अब बातें करने लगे हैं 

कौन छोड़ जायेगा दुनिया को पहले 

कई बार योजना भी बनाते हैं कि क्यों न साथ कूच करने हम 

इस दुनिया से 

भगवान् को याद किये बिना भी 

हम कई बार आध्यात्मिक हो जाते हैं . 


न जाने क्यों तुम 

अब मेरी सब गलतियों को माफ़ करना शुरू कर दिया 

और मैं तो कभी गलती निकाल ही नहीं पाता तुममे .


हाँ तुम से बातें करते हुए 

कभी समय का अंदाजा ही लगता 

इसी लिए तो इक्कीस साल कैसे बीत गए 

इसका भान तक नहीं हुआ 

और कब ये साथ पच्चीस का या तीस का 

या फिर पचास का होगा 

हमें पता भी नहीं चलेगा 

हाँ एक बात कहे देता हूँ कि 

झुर्रियों भरे तुम्हारे हाथ 

पहले से अधिक कोमल लगेंगे मुझे 


स्पर्श की भाषा 

शब्दों से कहीं अधिक प्रभावी होती हैं 

तुम्ही कहा करती हो पढ़ती हुई मेरी कविता.