मंगलवार, 15 जून 2021

प्रार्थनाएं

 अरुण चन्द्र राय की कविता - प्रार्थनाएं 

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आदरणीय मां

उमर हो ही गई है तुम्हारी 

लेकिन अभी इस भीषण महामारी के दौर में 

न तो बीमार होना , न ही मरना 

अन्यथा मां 

न ही मिल पाएगा डॉक्टर, न ही अस्पताल 

न ही मिल पाएगी शमशान में स्थान 

मां अभी किसी तरह रुकना तुम 

मत मरना तुम 

इस महामारी के दौरान। 


बाबूजी 

वैसे तो आपने देख ली दुनियां 

जानता हूँ कि जाना तो होता ही है एक सबको 

फिर भी कहूंगा कि हो सके तो 

मृत्यु को टालना महामारी के बीत जाने तक 

क्योंकि देख ही रहें हैं आप कि 

कितनी मुश्किल है अभी अस्पतालों में 

न मिल रही है दवाइयां न ही प्राणवायु 

और चिता के लकड़ियां भी हो चली है महंगी 

इसलिए बाबूजी अभी रुकियेगा हमारे साथ , हमारे बीच ।  . 


प्रिय अनुज 

इस बीच यदि मैं पड जाऊं बीमार 

हो जाए साँसों को ऑक्सीजन की कमी 

न मिले कोई सरकारी अस्पताल 

तो बस ध्यान रखना हमारे बच्चों का 

भाव में लुटने से बचा लेना उनकी जमा पूँजी

मेरे अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं करना कोई विशेष यत्न 

निपटा देना किसी तरह बस 

हाँ लिख कर रख दिया हूँ 

बच्चों के स्कूल के लिए भावपूर्ण चिट्ठी 

ताकि माफ़ हो जाए उनकी फीस मेरे नहीं रहने के बाद

यदि वो न हो सके तो उन्हें दाखिला जरुर दिला देना 

घर के पीछे सरकारी स्कूल में 

वैसे समझा दिया है मैंने कि पढ़ाई सिमटा हुआ है 

किताब के उन दो चार सौ पन्नों में 

और वे समझ भी गए हैं ।


प्रिय जीवन संगिनी 

कुछ नहीं मालूम कब कौन है कब नहीं 

आखिर महामारी है यह

फिर भी यदि किसी को जाना पड़ा तो 

वादा करो कि निभाएंगे दुसरे के सपनों को हकीकत बनाने का 

आंसू बिलकुल भी जाया नहीं करेंगे 

न ही अवसाद को घर करने देंगे एक दूसरे के ह्रदय में 

कहो न करोगी ऐसा ही !








शनिवार, 12 जून 2021

वृक्ष

हर दिन पर्यावरण दिवस है . सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम करने का दिवस . पढ़िए अरुण चन्द्र रॉय की कविता वृक्ष 
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जिन्होंने पिता को नहीं देखा 
वे किसी वृक्ष के तने से लगकर गले 
महसूस कर सकते हैं 
पिता को . 

जिन्होंने मां के आँचल का सुकून 
नहीं किया महसूस कभी 
वे किसी वृक्ष के घने छाये से लिपट कर 
समझ सकते हैं मां को . 

फल फूलों से लकदक वृक्ष की शाखाओं से 
जाना जा सकता है किसी सच्चे दोस्त का 
निःस्वार्थ प्रेम . 

कटकर किसी चूल्हे का इंधन हो जाना 
वृक्ष का दधीचि हो जाना होता है 
कहाँ कोई है वृक्ष सा कोई संत ! 

शनिवार, 29 मई 2021

महामारी

अरुण चन्द्र रॉय की कविता - महामारी

1.

नहीं जो आई होती महामारी

 विश्वास करना कठिन होता कि

दोहराता है इतिहास 

स्वयं को। 


2.

नहीं जो आती होती महामारी

मृत्यु आती है करके मुनादी

कहां समझ पाते हम। 


3.

महामारी का कीजिए 

धन्यवाद 

जिसने बताया कि

सीमाएं हैं 

ज्ञान की, विज्ञान की

धन, वैभव, पद एवं प्रतिष्ठा  की

मनुष्यता है इन सबसे ऊपर। 


4.

महामारी का आभार 

यदि हम त्याग सकें 

अपना अहंकार। 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं

 रात हुई है तो सवेरा दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं 

थक कर रुक गए तो बात अलग 

चलते रहे तो समझो मंजिल दूर नहीं। 



मुश्किल में बेशक है मानव आज 

ठप्प पड़े हैं सब काम काज 

हार कर बैठ जाए तो बात अलग 

गिरकर उठ गया तो संभालना दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं 


खो दिए किसी ने मां किसी ने बाप

लगी किसी की नजर किसी का शाप 

दुनिया का अंत इसे समझ लो बात अलग 

वरना समय का पलटना दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं


ज़िन्दगी के दिन सीमित हैं सबने कहा 

गीता रामायण पुराण सबमें यह लिखा 

पंचतत्व का मोह मिटा नहीं तो बात अलग 

मृत्यु के भय का जाना अब दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं। 










गुरुवार, 27 मई 2021

सब ठीक है

 बहुत दिनों बाद मिले 

बीज बेचने वाले बाबा 

पूछा कि कैसे रहे पिछले दिन 

उन्होंने कहा सब ठीक है, 

लेकिन कहां है सब ठीक?


पेड़ के नीचे बैठ कर 

पुराने कपड़ों को ठीक करने वाले बाबा 

बहुत दिनों बाद दिखे 

थके हुए कदम और उदासी आंखों में भर कर 

वे उसी पेड़ के नीचे खाली बैठे मिले।

पूछने पर बताया कि 

वे भी ठीक है,

लेकिन कहां है सब ठीक? 


वो चौंक पर बैठता है एक चाबी बनाने वाला 

वह भी कहां दिखाई दिया साल भर से 

उसका बोर्ड अब भी टंगा था 

फोन मिलाया तो उसने भी कहा 

सब ठीक है 

लेकिन कहां है सब ठीक?


ऐसे ही ज़िन्दगी के आसपास 

रोज़ दिखने वाले जब नहीं दिख रहे 

या कमजोर या उदास दिख रहे हैं 

फिर भी कह रहे हैं सब ठीक है 

तो मत समझिए कि सब ठीक है। 


हां 

जब सब ठीक नहीं है 

तब भी सब ठीक कहना 

और कुछ नहीं बल्कि है

 आदमी के भीतर बसी 

जिजीविषा और आशा 

यही उसे खड़ा करता है 

हर बार गिरने पर 

संबल देता है 

लड़खड़ाने पर। 


ठीक है कि अभी 

सब ठीक नहीं लेकिन 

कल होगा सब ठीक ।