बुधवार, 29 अप्रैल 2026

सभ्यता को नष्ट करने की जिद्द

 सभ्यता को नष्ट करने की जिद्द पाले

वे लहराना चाहते हैं अपना झंडा

पहाड़ों पर

रेगिस्तानों में

समुद्रों में

जलडमरू मध्य में 

समुद्र की लहरों के नीचे

और आसमान में 

जो कि उनका है ही नहीं ! 


यह जो झंडा लहराना चाहते हैं

वह रंगा हुआ है 

बच्चो, महिलाओ के शोणित से 

झुलसा हुआ है 

स्कूलो, देवालयो  से धधकते  लपटों से 

फिर भी वे लहराना चाहते हैं अपना झंडा 

पहाड़ो पर, रेगिस्तान में, समन्दर में और आसमान पर !

वे घोषणा करते हैं कि उनका झंडा 

करता है प्रतिनिधित्व 

बुद्ध, मर्टिन लूथर किंग, गांधी और मंडेला का !


रविवार, 5 अप्रैल 2026

युद्ध में भूख

 जब दुनिया में चल रहा हो

युद्ध

भूख और प्यार का जिक्र करना है

देश को कमजोर करना ! 


जब आसमान में विचर रहे हों

बंबवर्षक विमान

खेतों में खड़ी फसल को बचाने की प्रार्थना करना है

देशद्रोह, जिसके लिए हो सकती है सजा भी !


सेना की भर्ती खुली है

बीच युद्ध के दौरान

और इसमें भर्ती होने से मना करना 

राष्ट्र के लिए कर्तव्य की अवहेलना है

जबकि रोजगार के अवसर भेंट चढ़ गए हैं

युद्ध के उन्माद के ! 


युद्ध लड़ती तो सेना है 

फिर भी इसके प्रभाव से कहां बचा रह सकता है

किसान, मजदूर, स्त्री और बच्चे ! 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

बसंत

1. 

जंगल काटकर  

बनाये जा रहे हैं राजमार्ग 

और भेजकर रंगबिरंगे सन्देश 

हम मना रहे हैं 

बसंत का उत्सव ! 


2


हमारी बालकनी में 

बसंत टंगा है 

और खेतों में पीली सरसों 

पड रही है पीली 

परदेशी पिया की प्रतीक्षा में ! 


3

झड़ने शुरू हो जायेंगे 

पत्ते 

फेंक दिए जायेंगे 

बुहार कर शहर के बाहर 

कूड़े के ढेर में 

मिटटी से मिलने की उनकी चाहत 

अधूरी रह जायेगी 

इस बार भी . 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

गज़ल : छुपी है धूप

छुपी है धूप है भर गया कोहरा

बिना ज़ुर्म के मैं बन गया मोहरा 


जिम्मेदरियों ने मुझे झुकाया इतना 

पीठ मेरा देखो, ऐसे हो गया दोहरा 


नाराज हो जब, नदी बहाती भी है 

जब भी धार पर लगाया गया पहरा 


पहचानना कठिन है इन दिनों 

किसने चेहरे पे है लगाया चेहरा 


धर्म जाति का शोर हुआ इतना 

न्याय औ' संविधान बन गया बहरा 


शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सुबह मेरे जागने से पहले

 सुबह मेरे जागने से पहले

उठी होती है एक पूरी दुनियां

उठी होती वह स्त्री जो लगाने आती है

निगम की तरफ से मोहल्ले में झाड़ू लगाने, बिनने कूड़ा 

वह भी जाग चुका होता है

जो बांटने निकलता है दूध 

उसके पास पहले साइकिल हुआ करती है

जो अब मोटरसाइकिल हो गई है

फिर भी कहता है कि खुश नहीं है वह 


दूर कस्बे में स्कूल जाने वाले बच्चे और उनके पिता भी

जाग चुके होते हैं सूरज के जागने से पहले 

माएं बना चुकी होती है टिफिन झटपट

और झटपट ही बच्चियां भी रिबन बांध लेती हैं दो चोटियों में

बस्ता पीठ पर लाद बच्चे भाग रहे होते हैं 

सुनहरे भविष्य  की तरफ। 


खाली मैदान तो रहे नहीं अब कहीं भी

इंच इंच बिकने के बाद

इसलिए सड़कों पर दौड़ रहे हैं उत्साही युवा, अधेड़ और 

लपक कर चल रहे होते बूढ़े 

मेरे जागने से पहले सुबह सुबह। 


अब दुनियां सोती नहीं है

देश भी नहीं सोता है

दूसरे समय क्षेत्र की घड़ी से मिलान करते हुए

रातों को दिन सा व्यवहार करते हुए लोगों की

अलग ही दुनिया होती है और वे

लौट रहे होते हैं घरों को

जब मैं जागने को होता हूं सुबह सुबह। 


अब मुझे लगने लगा है कि 

रात अब नहीं रह गए हैं सोने के लिए

दिन अब नहीं रह गए हैं केवल काम के लिए

एक अजीब सी बेचैनी में जी रही होती है दुनियां

सुबह सुबह मेरे जागने से पहले !