शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

बसंत

1. 

जंगल काटकर  

बनाये जा रहे हैं राजमार्ग 

और भेजकर रंगबिरंगे सन्देश 

हम मना रहे हैं 

बसंत का उत्सव ! 


2


हमारी बालकनी में 

बसंत टंगा है 

और खेतों में पीली सरसों 

पड रही है पीली 

परदेशी पिया की प्रतीक्षा में ! 


3

झड़ने शुरू हो जायेंगे 

पत्ते 

फेंक दिए जायेंगे 

बुहार कर शहर के बाहर 

कूड़े के ढेर में 

मिटटी से मिलने की उनकी चाहत 

अधूरी रह जायेगी 

इस बार भी . 

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

गज़ल : छुपी है धूप

छुपी है धूप है भर गया कोहरा

बिना ज़ुर्म के मैं बन गया मोहरा 


जिम्मेदरियों ने मुझे झुकाया इतना 

पीठ मेरा देखो, ऐसे हो गया दोहरा 


नाराज हो जब, नदी बहाती भी है 

जब भी धार पर लगाया गया पहरा 


पहचानना कठिन है इन दिनों 

किसने चेहरे पे है लगाया चेहरा 


धर्म जाति का शोर हुआ इतना 

न्याय औ' संविधान बन गया बहरा 


शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सुबह मेरे जागने से पहले

 सुबह मेरे जागने से पहले

उठी होती है एक पूरी दुनियां

उठी होती वह स्त्री जो लगाने आती है

निगम की तरफ से मोहल्ले में झाड़ू लगाने, बिनने कूड़ा 

वह भी जाग चुका होता है

जो बांटने निकलता है दूध 

उसके पास पहले साइकिल हुआ करती है

जो अब मोटरसाइकिल हो गई है

फिर भी कहता है कि खुश नहीं है वह 


दूर कस्बे में स्कूल जाने वाले बच्चे और उनके पिता भी

जाग चुके होते हैं सूरज के जागने से पहले 

माएं बना चुकी होती है टिफिन झटपट

और झटपट ही बच्चियां भी रिबन बांध लेती हैं दो चोटियों में

बस्ता पीठ पर लाद बच्चे भाग रहे होते हैं 

सुनहरे भविष्य  की तरफ। 


खाली मैदान तो रहे नहीं अब कहीं भी

इंच इंच बिकने के बाद

इसलिए सड़कों पर दौड़ रहे हैं उत्साही युवा, अधेड़ और 

लपक कर चल रहे होते बूढ़े 

मेरे जागने से पहले सुबह सुबह। 


अब दुनियां सोती नहीं है

देश भी नहीं सोता है

दूसरे समय क्षेत्र की घड़ी से मिलान करते हुए

रातों को दिन सा व्यवहार करते हुए लोगों की

अलग ही दुनिया होती है और वे

लौट रहे होते हैं घरों को

जब मैं जागने को होता हूं सुबह सुबह। 


अब मुझे लगने लगा है कि 

रात अब नहीं रह गए हैं सोने के लिए

दिन अब नहीं रह गए हैं केवल काम के लिए

एक अजीब सी बेचैनी में जी रही होती है दुनियां

सुबह सुबह मेरे जागने से पहले ! 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

ग़ज़ल

 किसी की खुशबू बसी है इस रुमाल में 

कायनात में किसी की बातें हैं कमाल में


वह दिखे तो और देखने का जी करता है

नहीं देखूं तो आ जाती है वह खयाल में


नाम उसका लेती हैं मेरी धड़कने भी अब

क्या बताऊं कि वह नहीं किसी मिसाल में


जुगनू सी चमकती है हंसी उसकी 

बना हूं गुलाम मैं उसके दुमाल में


धर्मों ने बांट दिए आवाम को अब 

अजान अब शोर है, रंग नहीं गुलाल में

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

साल की आखिरी कविता

साल की आखिरी कविता में 

 होना चाहिए इस बात का जिक्र कि 
साल के बदल जाने के बाद 
क्या क्या बदलेगा 
और क्या क्या रह जायेगा 
पहले जैसा?  

रोटी की गोलाई
बढ़ेगी या वह छोटी हो जाएगी 
पिछले साल की तुलना में 
इस बात का जिक्र जरूर होना चाहिए 
साल की आखिरी कविता में ! 

अँधेरा कितना कम  हुआ 
या कितना बढ़ा 
किसके हिस्से आये 
रोशनी के टुकड़े 
किसके कोने रह गए अँधेरे 
कितने हाथों को मिला काम 
कितने हाथ करते रहे इन्तजार  
शहर के लेबर चौक पर, 
इस बात का हिसाब किताब 
लगाता कोई अपनी कविता में 
तो कितना अच्छा होता ! 

कितने पेड़ कटे 
नदियों का जल कितना हुआ कम 
मछलियां कितनी घटी 
और कितना बढ़ा हवा में जहर 
नहीं मालूम कि  
ये सब बातें कविता के विषय हैं या नहीं 
नहीं भी हों तब भी क्या गलत है 
इन बातों का जिक्र 
साल की आखिरी कविता में !