बुधवार, 23 जून 2021

मायके लौटी स्त्री


मायके लौटी स्त्री

फिर से बच्ची बन जाती है

लौट जाती है वह 

गुड़ियों के खेल में 

दो चोटियों और 

उनमें लगे लाल रिबन के फूल में


वह उचक उचक कर दौड़ती है

जैसे पैरों में लग गए हो पर

 घर के दीवारों को छू कर 

अपने अस्तित्व का करती है एहसास

मायके लौटी स्त्री। 


मायके लौटी स्त्री

वह सब खा लेना चाहती है

जिनका स्वाद भूल चुकी थी

जीवन की आपाधापी में 

घूम आती है अड़ोस पड़ोस

ढूंढ आती है

पुराने लोग, सखी सहेली

अनायास ही मुस्कुरा उठती है

मायके लौटी स्त्री। 


मायके लौटी स्त्री

दरअसल मायके नहीं आती

बल्कि समय का पहिए को रोककर वह

अपने अतीत को जी लेती है

फिर से एक बार। 


मायके लौटी स्त्री

भूल जाती है 

राग द्वेष

दुख सुख

क्लेश कांत

पानी हो जाती है

किसी नदी की । 


हे ईश्वर ! 

छीन लेना 

फूलों से रंग और गंध

लेकिन मत छीनना 

किसी स्त्री से उसका मायका।



मंगलवार, 15 जून 2021

प्रार्थनाएं

 अरुण चन्द्र राय की कविता - प्रार्थनाएं 

-------------------------


आदरणीय मां

उमर हो ही गई है तुम्हारी 

लेकिन अभी इस भीषण महामारी के दौर में 

न तो बीमार होना , न ही मरना 

अन्यथा मां 

न ही मिल पाएगा डॉक्टर, न ही अस्पताल 

न ही मिल पाएगी शमशान में स्थान 

मां अभी किसी तरह रुकना तुम 

मत मरना तुम 

इस महामारी के दौरान। 


बाबूजी 

वैसे तो आपने देख ली दुनियां 

जानता हूँ कि जाना तो होता ही है एक सबको 

फिर भी कहूंगा कि हो सके तो 

मृत्यु को टालना महामारी के बीत जाने तक 

क्योंकि देख ही रहें हैं आप कि 

कितनी मुश्किल है अभी अस्पतालों में 

न मिल रही है दवाइयां न ही प्राणवायु 

और चिता के लकड़ियां भी हो चली है महंगी 

इसलिए बाबूजी अभी रुकियेगा हमारे साथ , हमारे बीच ।  . 


प्रिय अनुज 

इस बीच यदि मैं पड जाऊं बीमार 

हो जाए साँसों को ऑक्सीजन की कमी 

न मिले कोई सरकारी अस्पताल 

तो बस ध्यान रखना हमारे बच्चों का 

भाव में लुटने से बचा लेना उनकी जमा पूँजी

मेरे अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं करना कोई विशेष यत्न 

निपटा देना किसी तरह बस 

हाँ लिख कर रख दिया हूँ 

बच्चों के स्कूल के लिए भावपूर्ण चिट्ठी 

ताकि माफ़ हो जाए उनकी फीस मेरे नहीं रहने के बाद

यदि वो न हो सके तो उन्हें दाखिला जरुर दिला देना 

घर के पीछे सरकारी स्कूल में 

वैसे समझा दिया है मैंने कि पढ़ाई सिमटा हुआ है 

किताब के उन दो चार सौ पन्नों में 

और वे समझ भी गए हैं ।


प्रिय जीवन संगिनी 

कुछ नहीं मालूम कब कौन है कब नहीं 

आखिर महामारी है यह

फिर भी यदि किसी को जाना पड़ा तो 

वादा करो कि निभाएंगे दुसरे के सपनों को हकीकत बनाने का 

आंसू बिलकुल भी जाया नहीं करेंगे 

न ही अवसाद को घर करने देंगे एक दूसरे के ह्रदय में 

कहो न करोगी ऐसा ही !








शनिवार, 12 जून 2021

वृक्ष

हर दिन पर्यावरण दिवस है . सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम करने का दिवस . पढ़िए अरुण चन्द्र रॉय की कविता वृक्ष 
-------------------------------

जिन्होंने पिता को नहीं देखा 
वे किसी वृक्ष के तने से लगकर गले 
महसूस कर सकते हैं 
पिता को . 

जिन्होंने मां के आँचल का सुकून 
नहीं किया महसूस कभी 
वे किसी वृक्ष के घने छाये से लिपट कर 
समझ सकते हैं मां को . 

फल फूलों से लकदक वृक्ष की शाखाओं से 
जाना जा सकता है किसी सच्चे दोस्त का 
निःस्वार्थ प्रेम . 

कटकर किसी चूल्हे का इंधन हो जाना 
वृक्ष का दधीचि हो जाना होता है 
कहाँ कोई है वृक्ष सा कोई संत ! 

शनिवार, 29 मई 2021

महामारी

अरुण चन्द्र रॉय की कविता - महामारी

1.

नहीं जो आई होती महामारी

 विश्वास करना कठिन होता कि

दोहराता है इतिहास 

स्वयं को। 


2.

नहीं जो आती होती महामारी

मृत्यु आती है करके मुनादी

कहां समझ पाते हम। 


3.

महामारी का कीजिए 

धन्यवाद 

जिसने बताया कि

सीमाएं हैं 

ज्ञान की, विज्ञान की

धन, वैभव, पद एवं प्रतिष्ठा  की

मनुष्यता है इन सबसे ऊपर। 


4.

महामारी का आभार 

यदि हम त्याग सकें 

अपना अहंकार। 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं

 रात हुई है तो सवेरा दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं 

थक कर रुक गए तो बात अलग 

चलते रहे तो समझो मंजिल दूर नहीं। 



मुश्किल में बेशक है मानव आज 

ठप्प पड़े हैं सब काम काज 

हार कर बैठ जाए तो बात अलग 

गिरकर उठ गया तो संभालना दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं 


खो दिए किसी ने मां किसी ने बाप

लगी किसी की नजर किसी का शाप 

दुनिया का अंत इसे समझ लो बात अलग 

वरना समय का पलटना दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं


ज़िन्दगी के दिन सीमित हैं सबने कहा 

गीता रामायण पुराण सबमें यह लिखा 

पंचतत्व का मोह मिटा नहीं तो बात अलग 

मृत्यु के भय का जाना अब दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं। 










गुरुवार, 27 मई 2021

सब ठीक है

 बहुत दिनों बाद मिले 

बीज बेचने वाले बाबा 

पूछा कि कैसे रहे पिछले दिन 

उन्होंने कहा सब ठीक है, 

लेकिन कहां है सब ठीक?


पेड़ के नीचे बैठ कर 

पुराने कपड़ों को ठीक करने वाले बाबा 

बहुत दिनों बाद दिखे 

थके हुए कदम और उदासी आंखों में भर कर 

वे उसी पेड़ के नीचे खाली बैठे मिले।

पूछने पर बताया कि 

वे भी ठीक है,

लेकिन कहां है सब ठीक? 


वो चौंक पर बैठता है एक चाबी बनाने वाला 

वह भी कहां दिखाई दिया साल भर से 

उसका बोर्ड अब भी टंगा था 

फोन मिलाया तो उसने भी कहा 

सब ठीक है 

लेकिन कहां है सब ठीक?


ऐसे ही ज़िन्दगी के आसपास 

रोज़ दिखने वाले जब नहीं दिख रहे 

या कमजोर या उदास दिख रहे हैं 

फिर भी कह रहे हैं सब ठीक है 

तो मत समझिए कि सब ठीक है। 


हां 

जब सब ठीक नहीं है 

तब भी सब ठीक कहना 

और कुछ नहीं बल्कि है

 आदमी के भीतर बसी 

जिजीविषा और आशा 

यही उसे खड़ा करता है 

हर बार गिरने पर 

संबल देता है 

लड़खड़ाने पर। 


ठीक है कि अभी 

सब ठीक नहीं लेकिन 

कल होगा सब ठीक ।











रविवार, 23 मई 2021

वापसी डाक से

 प्रिय

तुम्हारे भीतर जो

बसी है 

उदासियां, पीड़ा

दुख  और अकेलापन

स्पीड पोस्ट कर दो मुझे

मैं उन्हें सहेज रखूंगा 

अपने भीतर किसी उपहार की तरह

वापसी डाक से भेज दूंगा 

थोड़ी सी ताजी रोशनी,

खुशी के कुछ पल

और ढेर सारी दुआएं

एक डिब्बी में भर कर। 


यहां बताना जरूरी है कि 

इस भयावह और अवसाद भरे दौर में 

अस्पतालों के साथ साथ 

खुले हैं डाकखाने भी। 


- अरुण चन्द्र रॉय

मंगलवार, 11 मई 2021

कुछ दिनों के लिए

 अरुण चन्द्र रॉय की कविता - कुछ दिनों के लिए 

-------------------------------------------------------

मुद्रित कीजिए

अखबारों को श्वेत श्याम में 

संपादकीय पृष्ठ को कर दीजिए

पूरी तरह काला

स्थगित कर दीजिए 

खेल पृष्ठ

आर्थिक पृष्ठ पर 

कंपनियों के आंकड़े नहीं बल्कि

दीजिए आंकड़े

छूटे हुए काम वाले घरों के रसोई का 

बंद कर दीजिए रंगीन विज्ञापन भी अखबारों में

कुछ दिनों के लिए। 


कुछ दिनों के लिए

टीवी पर बंद कर दीजिए

रंगीन प्रसारण

ब्रेकिंग न्यूज के साथ चलने वाले 

सनसनीखेज संगीत प्रभाव को

कर दीजिए म्यूट

पैनलों की बहसों को कर दीजिए

स्थगित

प्राणवायु के बिना छटपटाती जनता का

सजीव प्रसारण पर भी 

लगा दीजिए रोक।


यदि छापना ही है

प्रसारित करना ही है 

तो कीजिए 

संविधान की प्रस्तावना

बार बार 

बार बार 

बार बार

कुछ दिनों के लिए। 

--------


शनिवार, 1 मई 2021

फोनबुक से वार्तालाप

 अरुण चन्द्र रॉय की कविता - फोनबुक से वार्तालाप

----------------------------------------------------------

महामारी से भयभीत होकर

इन दिनों मैं अपने फोन के कॉन्टैक्ट लिस्ट को 

खंगालता हूं बार बार 

करता हूं इससे वार्तालाप

सोचता हूं यदि गिर गया ऑक्सीजन लेवल मेरा तो 

किसे फोन करेगी मेरी पत्नी या बच्चे 

कौन दौड़ा आएगा सबसे पहले 

उठा ले जाएगा मुझे किसी अस्पताल के लिए 

कौन बच्चों को समझाएगा मेरी पत्नी या बच्चों को 

ढांढस देगा उन्हें 


कौन फोन नहीं उठाएगा जैसे

 मैं नहीं उठाता हूं फोन कई बार 

 देकर दफ्तर में व्यस्त रहने का हवाला 

कौन डर जायेगा कि कहीं मांग न लूं उधार 

इस महामारी में उधारी देना कितना जोखिम भरा है न 

जब देश की पूरी अर्थव्यवस्था उधारी में जा रही हो धंसी।


मैं अपने फोनबुक को ऊपर से नीचे तक 

करता हूं बार बार स्क्रॉल 

एक एक नंबर पर रुकता हूं सोचता हूं  

फिर याद आते हैं मुझे उनके साथ किया हुआ 

अच्छा बुरा व्यवहार  

अच्छे व्यवहार पर मुस्कुराता हूं 

और बुरे व्यवहार पर जतात हूं पश्चाताप 

खुद से करता हूं वादा कि यदि गुजर गया 

महामारी का यह बुरा दौर तो 

बदल लूंगा अपना व्यवहार 

हर फोन नंबर पर बदलता है 

मेरे चेहरे का रंग और हावभाव । 


यदि कोई अनहोनी घटित हो जाती है तो 

क्या चार कंधे मिल जाएगा मुझे 

ऐसे चार नाम ढूंढते ढूंढते मुझे याद आते है अपने रिश्तेदार 

जिनके शादी व्याह, मरनी हरनी में भी 

 शामिल नहीं हो पाया था मैं 

भेज दिया था नेग कूरियर से 

वे लोग भी याद आ रहे हैं जिन्हें टरका देता था मैं

मदद की मांग पर 

जबकि सोच रहा हूं कि यदि ये लोग पहुंच जाएं 

सुनकर मेरे नहीं रहने की खबर तो 

अन्त्येष्टि से क्रियाकर्म तक नहीं होगी 

मेरी पत्नी या बच्चों को कोई दिक्कत।


मन ही मन मैं सूची बनाने लगता हूं कि 

किस से मांगनी है माफी किसी अनजानी गलती के लिए

किसको कहना है धन्यवाद किसी छोटे बड़े उपकार के लिए 

किसको कह के जाना है कि बच्चों को रखे ध्यान थोड़ा 

और अंत में मैं अपनी पत्नी को भेजता हूं एक मैसेज -

" यह दुनिया तब भी थी, जब नहीं थे हम 

यह दुनिया तब भी रहेगी, जब नहीं रहेंगे हम 

हमारे होने या न होने से नहीं रुकता है 

पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना  

सूर्य का उदय और अस्त 

बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, हेमंत और शिशिर ऋतुओं का चक्र 

फूलों का मुरझाना और फिर से खिलना 

वृक्षों पर पतझड़ और नव पल्लव का आना।"


और गहरी सांस लेकर में बंद कर देता हूं 

अपने फोनबुक से वार्तालाप। 








शनिवार, 24 अप्रैल 2021

यह शोक का समय है

यह श्रद्धांजलि लिखने का
समय नहीं
यह है शोक का समय। 

नागरिक तो पहले मरे हैं
उनसे पहले मरी है
नैतिकता और मानवता
अस्पतालों में
दवाई की दुकानों पर 
गोदामों और 
धनकुबेरों के तहखानों में। 

कौन कहता है कि 
सांसे नहीं मिलने से मरे हैं लोग
वास्तव में मरी है
संवेदना सत्ता की, अधिकारियों की
या कहिए सम्पूर्ण प्रणाली की
नीतियों की और नियंताओं की। 

यह व्यक्तिगत नहीं 
सामूहिक शोक का समय है
अशेष संवेदनाओं के आत्महत्या का समय है यह। 

शनिवार, 13 मार्च 2021

सहानुभति

 सहानुभूति

पॉल लॉरेंस डनबर

 मुझे पता है कि कैसा महसूस करता है पिंजरे में बंद पक्षी !

     जब ऊपर पहाड़ियों की ढलान पर चमकता है सूरज उज्जवल;

जब हवा के झोंके मखमली घासों को झूलाती हैं हौले हौले,

और नदी बहती है पारदर्शी कांच की धारा की तरह धीमे धीमे;

     जब चिड़िया गाती है पहली बार और पहली कली खोल रही होती हैं अपनी आँखें,

और इसकी पंखुड़ियों से खुशबू चुरा रही होती है हृदय -

मुझे पता है कि कैसा महसूस करता है पिंजरे में बंद पक्षी !

 

 

मुझे पता है कि पिंजड़े में बंद पक्षी क्यों फड़फड़ाता रहता है अपने पंख

     जब तक कि पिंजरे की क्रूर सलाखें रक्तरंजित नहीं हो जातीं;

कि वह उड़कर पहुँचना चाहता है अपने घोसले में स्वतंत्र

खुश होने पर वह चाहता है शाखाओं पर झूलना;

     और पुराने जख्म बार बार उसके दिल उठाती हैं हुक

और वे उसकी धमनियों में चुभती हैं तेज और तेज -

मुझे पता है कि वह क्यों फड़फड़ाता रहता है अपने पंख

 

मुझे पता है कि पिंजरे में बंद पक्षी क्यों गाता है दर्द,

     जब उनके पंख काट दिये गए हों और छती में भरा हो गहरे जख्म, -

कि वह सलाखों को पीटता है बार बार और कि वह मुक्त हो जाएगा;

यह किसी आनंद या उल्लास का गीत नहीं होता

     बल्कि होती है प्रार्थना जो निकलती है उसके हृदय की अतल गहराइयों से बल्कि होती है जिरह ईश्वर से जो वह करता है बार बार -

मुझे पता है कि पिंजरे में बंद पक्षी क्यों गाता है!


अनुवाद - अरुण चन्द्र रॉय

गुरुवार, 4 मार्च 2021

विवाह के इक्कीसवीं वर्षगाँठ पर

इक्कीस साल पूरे हो गए 

अपने विवाह को 

बच्चे  भी हो रहे हैं बड़े 

लेकिन एक तुम हो कि हर दिन 

ऐसे पेश आती हो कि 

लगता है आज पहला दिन हो 

अपने साथ का । 


तुम और मैं 

दोनों ही हो गए हैं 

धीरे धीरे मोटे 

और हमे पता ही नहीं चला 

लेकिन हमारी मोटाई का 

कहाँ कोई असर पड़ा 

अपने प्रेम पर 

अपने खानपान पर  . 


डॉक्टर कहते रहते हैं कि 

कम खाओ चीनी 

जिसे मैं याद भर करता हूँ 

बनाते हुये सुबह की चाय 

डॉक्टर की सलाह कि 

कम खाओ नमक 

तुम अनदेखी करते हुये 

देती हो  जरूरत और स्वाद भर नमक 

दाल, सब्जी, भरता , पकोड़े आदि में 

हंस कर कहती हो - जीवन में स्वाद न हो तो क्या जीवन ! 


डॉक्टरों ने चेताया है कि 

आने वाले समय में कमी हो जाएगी कैल्सियम की 

तुम्हारी हड्डियों में 

लेकिन सुबह से शाम तक 

घिरनी की तरह नाचते देख तुम्हें 

झूठा लगता है डॉक्टर 

मुझे भी तो कहा है कि ध्यान रखूँ अपना 

चढ़ते उतरते सीढ़ियाँ 

मापते रहूँ अपना रक्तचाप नियमित रूप से 

लेकिन ये सब कोरी बातें रह जाती हैं 

जिंदगी के चक्रव्यूह में । 


बढ़ गया है तुम्हारी एड़ियों का खुरदुरापन 

तुम्हारे नाखून अब बढ्ने से पहले टूट जाते हैं 

और जिस दिन धो लेती हो चद्दरें, पर्दे 

बढ़ जाता है तुम्हारे हाथों का दर्द 

लेकिन दबाते हुये तुम्हारे हाथ

सहलाते हुये तुम्हारी एड़ियाँ 

प्यार के उन पलों से अधिक कोमल होते हैं 

उसी तरह जिस तरह मेरे झड़ते बालों पर भी 

रीझी रहने लगी तो तुम । 


अचानक हम सोचने लगे हैं 

बच्चों के दूर रहने पर होने वाले अकेलेपन के बारे में 

उनके साथ सहजता से रहने के बारे में 

उन आदतों को छोडने के बारे में 

जो हमारे माता-पिता में थे और जिनसे असहज हुआ करते थे हम 

हम सोचने लगे हैं 

नई पीढ़ी से तारतम्य बिठाने के बारे में । 


जबकि बहुत समय है अभी हम दोनों के पास 

फिर भी अब बातें करने लगे हैं 

कौन छोड़ जायेगा दुनिया को पहले 

कई बार योजना भी बनाते हैं कि क्यों न साथ कूच करने हम 

इस दुनिया से 

भगवान् को याद किये बिना भी 

हम कई बार आध्यात्मिक हो जाते हैं . 


न जाने क्यों तुम 

अब मेरी सब गलतियों को माफ़ करना शुरू कर दिया 

और मैं तो कभी गलती निकाल ही नहीं पाता तुममे .


हाँ तुम से बातें करते हुए 

कभी समय का अंदाजा ही लगता 

इसी लिए तो इक्कीस साल कैसे बीत गए 

इसका भान तक नहीं हुआ 

और कब ये साथ पच्चीस का या तीस का 

या फिर पचास का होगा 

हमें पता भी नहीं चलेगा 

हाँ एक बात कहे देता हूँ कि 

झुर्रियों भरे तुम्हारे हाथ 

पहले से अधिक कोमल लगेंगे मुझे 


स्पर्श की भाषा 

शब्दों से कहीं अधिक प्रभावी होती हैं 

तुम्ही कहा करती हो पढ़ती हुई मेरी कविता. 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

मातृभाषा

 अरुण चन्द्र रॉय की कविता - मातृभाषा 

-----------

मेरी मातृभाषा में 

नहीं है

सॉरी, थैंक यू

धन्यवाद, आभार जैसे 

शब्द। 


मातृभाषा में बोलना 

होता है जैसे 

मां  छाती से लिपट जाना

माटी में 

लोट जाना


जब छूट  रही है मिट्टी, मां

और मातृभाषा 

हर बात के लिए

जताने लगा हूं आभार

कहने लगा हूं धन्यवाद

औपचारिक सा हो गया हूं। 


- अरुण चन्द्र रॉय

बुधवार, 6 जनवरी 2021

राजा के लिए एक कविता

अरुण चन्द्र रॉय की कविता - राजा के लिए
---------------------------------


यदि राजा को 
सैकड़ों सैनिकों के पहरे में 
नींद नहीं आये तो 
उसे आ जाना चाहिए फुटपाथ पर 
सो जाना चाहिए किसी बेघर के पास 
यकीन मानिये 
वर्षों बाद आएगी राजा को ऐसी नींद  

यदि राजा को 
नहीं पचता हो खाना 
बनता हो पेट में गैस 
आती हो खट्टी डकारें 
उसे पैदल बाजार में निकल जाना चाहिए 
बिना किसी तामझाम के 
देख आना चाहिए कैसे मशक्क्रकत करती है 
उसकी जनता 
यकीन मानिये 
राजा को पचेगा खाना . 

यदि राजा को लगता हो कभी 
अकेलापन 
उसे बिना किसी झिझक के 
बैठ जाना चाहिए किसी रेल डिब्बे में 
बिना किसी आरक्षण के 
कर लेनी चाहिए अपने दिल की बात 
किसी अनजान से 
जो उससे पहले कभी नहीं मिला 
जो उससे बाद में शायद ही कभी मिले 
यकीन मानिये 
राजा फिर कभी महसूस नहीं करेगा 
अकेलापन . 

राजा 
बेहतर राजा बन सकता है 
यदि बन जाए वह
हाड-मांस का आम आदमी 
जैसा था कभी वह राजा बनने से पहले . 

रविवार, 3 जनवरी 2021

किसान

मिट्टी से खेलता हूं
मिट्टी में पलता हूं
किसान हूं मैं
मिट्टी में मिल जाता हूं। 

मिट्टी से शुरू कहानी
मिट्टी में खत्म होती है
किसान हूं मैं
मिट्टी के गीत गाता हूं
मिट्टी में मिल जाता हूं। 

मिट्टी मेरे खून में
मिट्टी मेरी धमनियों में
किसान हूं मैं
मिट्टी की सांसें लेता हूं
मिट्टी में मिल जाता हूं। 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

मेरी रनिंग डायरी

 नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें . 

यह साल सबके लिए बेहतर स्वास्थ्य लाये . सब स्वस्थ रहें . खुश रहें . पिछले साल कोरोना ने बता दिया कि सेहत बड़ी नेमत कुछ और नहीं है . स्वास्थ्य सबसे मूल्यवान संपत्ति है . ऐसा इसलिए भी हुआ कि जब लाखों मजदूर शहर से गाँव की तरफ पलायन कर रहे थे तब कोरोना का संक्रमण सबसे अधिक तेजी से फ़ैल रहा था और पूरा देश अपने घरों में दुबका पड़ा हुआ था . इसने यह भी साबित किया कि गरीब और मजदूर को हम जितना कमजोर और कुपोषित समझते हैं , वे वास्तव में उससे कहीं अधिक मज़बूत हैं . मजदूरों ने हजारों किलोमीटर पैदल चलने का जज्बा दिखा कर देश के उच्च वर्ग को शर्मिंदा कर दिया जो बिना सुविधाओं के रहना भूल चुके हैं . 

यह वह समय था जब अपने खराब सेहत को सुधारने के लिए रनिंग को अपनाए हुए साल भर भी नहीं हुआ था . लेकिन मैंने कोरोना के भर को एक तरफ रखते हुए पूरे लॉक डाउन के दौरान खाली सड़कों पर रनिंग की, पैदल चला और खुद को फिट रखने की कोशिश की . 

बीता हुआ साल यानी 2020 इस लिहाज से मेरे लिए एक बेहतर साल रहा क्योंकि इस साल भर में मैं लगभग 2100 किलोमीटर दौड़ा . 365 दिनों में से मेरी एक्टिविटी लगभग 250 दिनों की रही . इस पूरे साल में मैं 13 हाफ मैराथन और 1 फुल मैराथन रेस दौड़ा . 

फुल मैराथन की कहानी फिर कभी अलग से . लेकिन जिस तरह मजदूरों ने विषम परिस्थिति में हजारों किलोमीटर की यात्रा करके अपने गाँवों को लौटे, उसके सामने मेरी मैराथन दौड़ कुछ भी नहीं है . 

अपने रनिंग डायरी के पन्ने से कहानियां लेकर बीच बीच में आऊंगा , इसी ब्लॉग पर . 

आप भी दौडिए और खुद को फिट रखिये . क्योंकि स्वस्थ शरीर से बड़ी कोई संपत्ति नहीं . जब प्रलय आएगा तो केवल शरीर ही आपको बचाएगा . 

 आज नए साल में २०२१ किमी दौड़ने के संकल्प के साथ पहले दिन शीतलहर के बीच दौड़ा और चौदह किलोमीटर दौड़ा . आप भी मेरे साथ दौडिए ! 

चल दौड़ दौड़ तू दौड़ दौड़ 

गाँव शहर या को भी ठौर 

चल दौड़ दौड़ तू दौड़ दौड़ .