गुरुवार, 19 मई 2022

छूटना



1.

छूटना 

कुछ और पाने की ओर 

होता है चलना


2.

हर चीज जो है

ठीक है छूट जाएगी

इसको समझने में 

ठीक नहीं

जिंदगी गंवाना 


3.

पानी से 

उसका रंग

उसका स्वाद

उसकी तासीर

कब छूटती है!


(बीज शब्द  "छूटना": श्वेता कसाना, अनुवादक साथी )

शनिवार, 7 मई 2022

मां को अब

 मां को अब 

छोड़ देनी चाहिए सबसे अंत में 

खाने की आदत 


मां को  अब 

नहीं छिपानी चाहिए अपनी बीमारी 

असह्य हो जाने तक 


मां को अब 

नहीं रोना चाहिए 

अकेले में चुपचाप 


मां को अब 

मनुष्य हो जाना चाहिए 

हाड़ मांस वाला मनुष्य 

जिसे भूख लगे, चोट लगे, पीड़ा हो, दर्द हो 


हे दुनियां भर की माएं 

उतर जाओ देवी के सिंहासन से । 






शनिवार, 30 अप्रैल 2022

राजा और मंत्रियों की यात्राएं

 राजाओं और उनके मंत्रियों के लिए 

आवश्यक होना चाहिए यात्राएं अस्पतालों की 

दुख और पीड़ा को अनुभव करने का यह सहज स्थान 

मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने का सबसे प्रभावशाली साधन है। 


उन्हें नियमित रूप से जाना चाहिए 

शमशान घाट और कब्रिस्तान भी 

ताकि उन्हें सनद रहे आदमी की हदों के बारे में । 


किसी किसान के घर भी 

मंत्रियों और राजाओं को जाना चाहिए 

जिससे कि उन्हें भान हो जाए कि 

दुनिया की सत्ता के सच्चे हकदार कौन हैं । 


बुरा नहीं लगेगा किसी को यदि राजा या मंत्री 

उस छोटे बच्चे से मिल आएं जिसने खोया है अपना पिता 

सीमा पर हुई गोलीबारी में 

जबकि दोनों तरफ के अफसरान कर रहे वार्ता 

बड़ी गर्मजीशी से और अंत में मिला रहे थे हाथ 

कर रहे थे गलबहियां। 


लेकिन राजाओं और उनके मंत्रियों के पास 

इन दिनों वक्त नहीं है 

वे कर रहे हैं अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर 

नए व्यापार के लिए कर रहे हैं करार,

खरीदे जाने हैं नए नए हथियार 

उन्हें क्या ही फर्क पड़ता है कि

पड़ रहे हैं पहाड़ों में दरार, 

बढ़ गया है  गांवों और शहरों का तापमान 

या झीलों में नहीं आ रहे हैं चिड़िया के रूप में 

विदेशी मेहमान। 










शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

संभव

 सड़क होने का अर्थ 

मंजिल का होना नहीं होता है 

पानी होने से बुझ जाए प्यास 

कब होता है ऐसा। 


बादल घूमडेंगे तो बरसेंगे भी 

हर बार ऐसा नहीं होता है 

रोपे गए हर बीज से प्रस्फुटित हो पौध ही 

ऐसा भी कब हुआ है । 


आपके पास शब्द हैं 

और आप लिख सकें कविता  

हो जाए क्रांति 

कर सकें प्रतिरोध 

कहां होता है संभव ऐसा भी। 


आप प्रेम करें और 

मिले बदले में प्रेम 

आप समर्पित रहें और 

मिले आपको भी समर्पण 

यह भी कहां हुआ है संभव ! 






शनिवार, 2 अप्रैल 2022

चैत

 इधर चैत जल रहा है 

और दुनिया गा रही है 

बसंत के गीत 

खड़ी फसलों के बेमौसम बरसात में 

गिर जाने के खतरे के बीच 

लोग शोक मना रहे हैं गिरे हुए पत्तों पर 

और ये ऐसे लोग हैं जिन्हें 

शाख से  गिरे हुए पत्तों एवं 

पके हुए फसलों के बेमौसम बारिश में गिरने के बीच का फर्क 

नहीं है मालूम। 


नदियां और पोखर गए हैं सूख 

बढ़ती ही जा रही है लोगों की भूख 

जबकि पेट की भूख जस की तस बनी हुई है 

एक भूख को श्रेष्ठ बताने के लिए चलाए जा रहे हैं 

संगठित अभियान 

और एक भूख को लगातार किया जा रहा है 

मुख्यधारा से ओझल 

भूख और भूख के बीच के फर्क के प्रति अज्ञानता ही 

सुखा रही है नदियां और पोखर 

काश कभी जान पाते आप और हम।


चैत को नहीं जलना चाहिए 

नदियों को नहीं सूखना चाहिए 

पोखरों को जिंदा रहना चाहिए 

और भूख पर लगाम लगानी चाहिए 

यह केवल नारा भर है जिसे एक साथ पोस्ट किया जाना है 

विभिन्न मीडिया मंचों पर। 



















रविवार, 20 मार्च 2022

गौरैया

विश्व गौरैया दिवस की 
आपको हार्दिक शुभकामनाएं
शुभकामनाएं इसलिए भी कि
गौरैया विलुप्त हो रही है
और इसे बचाने के लिए 
आप लिख रहे हैं नारे
बना रहे हैं विज्ञापन 
जैसे कि आप करते हैं छद्म, प्रपंच 
जल बचाने के लिए
वृक्ष बचाने के लिए
बेटी बचाने के लिए
नदी बचाने के लिए 
मिट्टी बचाने के लिए
हवा बचाने के लिए 
ओजोन परत बचाने के लिए
डॉल्फिन और घड़ियाल बचाने के लिए
बाघ, सिंह, गैंडा बचाने के लिए । 

दरअसल आप जो मनुष्य हैं 
पृथ्वी के श्राप हैं 
बचाना है पृथ्वी को इस मनुष्य से । 


सोमवार, 14 मार्च 2022

सुखद हरा रंग


पत्तों पर
कभी देखा है
धूप को टिकते हुए..
पत्तों का रंग
कितना सुखद हरा
होता है ।

ये हरीतिमा
प्रतीक है
जीवन की
सुख और
शांति की
वैभव और
समृद्धि की ।

हरियाली लाती है
सन्देश
भरपूर है चराचर
और अपनी सृष्टि
साँसे ले रही
तरुणाई
हो रही
पतझड़ की भरपाई ।

इसी हरे रंग में
समाई है
जीवन की उर्जा
ऊष्मा और
इसमें ही
रमी
रिश्तों की नमी ।

कभी देखना
मेरा चेहरा भी
तुम्हारी आभा से
कैसे खिल जाता है
और हो जाता है
सुखद हरे रंग जैसा ।

वही हरा रंग
जो ओढती हो तुम
पहनती हो
वही हरा रंग
जो जीवंत है
तुममें ।

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

महानगर में बसंत

महानगर में बसंत 

सड़कों के किनारे लगे

बबूर, कीकर के वृक्षों  के काले पत्तों के बीच 

अपुष्ट खिले बेगनबेलिया से 

झाँकता है और 

घुल जाता है झूलते अमलताश की यादों से जुड़ी 

गांवों की स्मृतियों में ।  


महानगर में बसंत 

दस इंच के गमलों में माली द्वारा लगाए गए 

अकेली गुलदाउदी के अलग अलग कोणोंसे 

खींचे गए फोटो और सेलफियों को सोशल मीडिया के 

विभिन्न प्लेटफॉर्मों  पर किए गए अपडेट से 

झाँकता है और 

घुल जाता है आमों की नई मंजरियों की गंध से जुड़ी 

गांवों की स्मृतियों में । 


महानगर में बसंत 

वास्तव में उन्हीं के हिस्से आता है 

जो सुबह होने से पहले पार्कों की सफाई करते हुये 

गिरे हुये फूलों को देख हिलस उठते हैं 

जो शहर की नर्सरियों में भांति भांति के नन्हें नन्हें पौधों  को

नहाते हैं, धुलाते और सजाते हैं 


महानगर में बसंत 

पौधे बेचने वालों के ठेले पर रखे गमलों के समूह में 

होता है अपने उन्मान पर । 

सोमवार, 31 जनवरी 2022

जादुई भविष्यवक्ता

अमरीकी कवयित्री  सारा ट्रेवर टीसडेल  (1884-1933) की कविता द क्रिस्टल गेजर का हिन्दी अनुवाद अरुण चन्द्र राय द्वारा । 


मैं स्वयं को फिर से स्वयं में  लूँगी समेट 

मैं अपने बिखराव को एक कर दूँगी खुद को  भेंट 

उन्हें  मिलाकर गढ़ लूँगी एक अद्भुद प्रकाश पुंज  

 जहां से निहारूंगी मैं चांद और  सूरज का कुंज 


घंटों निहारूंगी समय को जैसे कोई जादूगरनी 

भविष्य  और वर्तमान की घूमती हो जैसे घिरनी 

और बेचैन लोगों की उतरूँगी मैं तस्वीर 

आत्ममुग्ध होकर फिर रहे  होकर जो अधीर 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

जन गण मन  का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 


जाति की बंधन तोड़ो 

धर्म का भेद छोड़ो 

अपने मुद्दों को पहचानो 

मत छोड़ो मजधार में नाव  

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


लोक लुभावन वादों को छोड़ो 

असली मुद्दों से नाता जोड़ो 

रोजी रोटी का न हो तनाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


अमीर गरीब को समान अधिकार 

सबको धंधा सबको रोजगार 

न हो किसी को कोई अभाव 

लोकतन्त्र का पर्व चुनाव 

गणतन्त्र का मर्म चुनाव 


सोमवार, 17 जनवरी 2022

अमेरिकन कवयित्री ग्वेन्डोलिन ब्रूक्स की कविता "द क्रेज़ी वुमेन" का अनुवाद

अमेरिकन कवयित्री  ग्वेन्डोलिन ब्रूक्स की कविता "द क्रेज़ी वुमेन" का  मूल अँग्रेजी से अनुवाद अरुण चन्द्र रॉय द्वारा 


मैं नहीं गाऊँगी मई का गीत 

मई के गीत मे होना चाहिए मनमीत 

मैं करूंगी नवम्बर के आने का इंतजार 

और गाकर करूंगी उदासी का इज़हार 


मैं करूंगी नवम्बर तक प्रतीक्षा 

तभी पूरी होगी मेरी आंकक्षा 

मैं धुंध अंधेरे में बाहर जाऊँगी 

और ज़ोर ज़ोर से गाऊँगी 


और दुनिया मुझे घूरेगी 

मुझपर फब्तियाँ कसेगी 

"कहेगी  है यह औरत पागल, है पागल इसकी रीत " 

जो नहीं गाती है मई  में खुशी के गीत। "