चचेरे भाई का फोन आया
बिलखते हुये - भाइया, बाबूजी नहीं रहे !
यानी काका नहीं रहे .
काका जो पिता के छोटे भाई थे
जो बाबूजी के नहीं रहने के बाद
पिता जैसे ही हो गये थे
जबकि पिताजी के रहने तक
उनसे रहा सम्बंध दियादी ही
काका ने कभी खडी कर ली थी
आंगन मे दीवार
दालान पर दीवार
फिर सालों बाद उन्हें एह्सास भी हुआ कि
खराब कर लिया अपना आंगन
लेकिन जब एहसास हआ तब कुछ किया भी नहीं जा सकता था
और मैने सांत्वना दी कि
दुनियां भर में घर, आंगन, खेत, खलिहान छोडिये,
देश भी बंटे हैं ऐसे ही !
तब जाकर अपराधबोध से मुक्त हुये थे काका !
काका के पास थी साइकिल
उनके ससुराल से मिली थी जिसका
बहुत ध्यान रखते थे वे
मां कहती थी कि उतना ध्यान तो उन्होने नहीं रखा
काकी का भी
लेकिन मुझे दी वह साइकिल सीखने के
पहले कैंची फिर हाफ पैडल फिर फुल पैडल
सीखी मैंने साइकिल चलानी
और काका कहते थे दालान पर हंस कर -
भाई जी नहीं सीख पाये साइकिल चलानी
बाबूजी यह सुनकर थोडे उदास हो जाते थे
और काका की सीना हो जाता था थोडा चौडा
काका जानते थे आम की गाछी का पता
उंगलियों पर गिनी थी उनके
कहाँ किस बीट मे है कितनी बांसें
कोई चोरी से काट जाये तो गांव उठा लेते थे सिर पर
मांग ले जाये तो वे एक के बद्ले दो बांस दे देते थे
बनाने के घर, ब्याह जनेउ में मड्वा बनाने के लिये !
काका एक बार गये बंबई कमाने
बाबूजी से गुस्सा होकर
काकी से रूस कर
छह महीने मे लौट आयेंगे कहती थी मां और
उसकी कही बात सच हो गई
काकी को लगा था बंबई से लेकर आएंगे फैशन का सामान
लेकिन वे लेकर आये मेरे लिये कोट का कपडा
जिसे मेरे गांव का कोई दर्जी सिलने के लिये तैयार नहीं हुआ
और चालीस किलोमीटर दूर शहर मे सिलाया गया मेरा पहला कोट !
आज जब काका नहीं हैं
मेरे पास जब हैं दर्जनों कोट अलग अलग मौकों के लिये
आज जब बंटा हुआ आंगान सूना पडा है
साइकिल का क्या है
चला लिया है मैंने लाखों किलोमीटर कार
मुझे याद आ रहा है पहला कोट, हाफ पैडल साइकिल !
काका रहेंगे मेरी स्मृतियों में
जब भी पहनुंगा कोट
जब भी चलाउंगा साइकिल, बाइक या कार
जब भी आयेगा त्योहार इंतजार करुंगा उनके फोन का !
काश ! काका के रहते लौट पाता मैं अपने गांव !
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